‘इस्लाम की विशेषताएं’ LaLa-ranjendra-LaL-said

islam राजेन्द्र नारायण लाल अपनी पुस्तक ‘इस्लाम एक स्वयं सिद्ध ईश्वरीय जीवन व्यवस्था‘ में मुहम्मद, मदिरापान ,सूद (ब्याज),विधवा स्त्री एवं स्त्री अधिकार आदि बारे में अपने लेख ‘इस्लाम की विशेषताऐं’ में लिखते हैं-
(1) इस्लाम की सबसे प्रधान विशेषता उसका विशुद्ध एकेश्वरवाद है। हिन्दू धर्म के ईश्वर-कृत वेदों का एकेश्वरवाद कालान्तर से बहुदेववाद में खोया तो नहीं तथापि बहुदेववाद और अवतारवाद के बाद ईश्वर को मुख्य से गौण बना दिया गया है। इसी प्रकार ईसाइयों की त्रिमूर्ति अर्थात ईश्वर, पुत्र और आत्मा की कल्पना ने हिन्दुओं के अवतारवाद के समान ईसाई धर्म में भी ईश्वर मुख्य न रहकर गौण हो गयां इसके विपरीत इस्लाम के एकेश्वरवाद में न किसी प्रकार का परिवर्तन हुआ और न विकार उत्पन्न हुआ। इसकी नींव इतनी सुदृढ़ है कि इसमें मिश्रण का प्रवेश असंभव है। इसका कारण इस्लाम का यह आधारभूत कलिमा है- ‘‘मैं स्वीकार करता हूँ कि ईश्वर के अतिरिक्त कोई पूज्य और उपास्य नहीं और मुहम्मद ईश्वर के दास और उसके दूत हैं। मुहम्मद साहब को ईश्वर ने कुरआन में अधिकतर ‘अब्द’ कहा है जिसका अर्थ आज्ञाकारी दास है, अतएव ईश्वर का दास न ईश्वर का अवतार हो सकता है और न उपास्य हो सकता है।
(2) इस्लाम ने मदिरा को हर प्रकार के पापों की जननी कहा है। अतः इस्लाम में केवल नैतिकता के आधार पर मदिरापान निषेघ नहीं है अपितु घोर दंडनीय अपराध भी है। अर्थात कोड़े की सज़ा। इस्लाम में सिदधंततः ताड़ी, भंग आदि सभी मादक वस्तुएँ निषिद्ध है। जबकि हिन्दू धर्म में इसकी मनाही भी है और नहीं भी है। विष्णु के उपासक मदिरा को वर्जित मानते हैं और काली के उपासक धार्मिक, शिव जैसे देवता को भंग-धतुरा का सेवनकर्ता बताया जाता है तथा शैव भी भंग, गाँजा आद का सेवन करते हैं।
(3) ज़कात अर्थात अनिवार्य दान । यह श्रेय केवल इस्लाम को प्राप्त है कि उसके पाँच आधारभूत कृत्यों-नमाज़ (उपासना) , रोज़ा (ब्रत) हज (काबा की तीर्थ की यात्रा), में एक मुख्य कृत्य ज़कात भी है। इस दान को प्राप्त करने के पात्रों में निर्धन भी हैं और ऐसे कर्जदार भी हैं ‘जो कर्ज़ अदा करने में असमर्थ हों या इतना धन न रखते हों कि कोई कारोबार कर सकें। नियमित रूप से धनवानों के धन में इस्लाम ने मूलतः धनहीनों का अधिकार है उनके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वे ज़कात लेने के वास्ते भिक्षुक बनकर धनवानों के पास जाएँ। यह शासन का कर्तव्य है कि वह धनवानों से ज़कात वसूल करे और उसके अधिकारियों को दे। धनहीनों का ऐसा आदर किसी धर्म में नहीं है।
(4) इस्लाम में हर प्रकार का जुआ निषिद्ध है जबकि हिन्दू धर्म में दीपावली में जुआ खेलना धार्मिक कार्य है। ईसाई। धर्म में भी जुआ पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।
(5) सूद (ब्याज) एक ऐसा व्यवहार है जो धनवानों को और धनवान तथा धनहीनों को और धनहीन बना देता है। समाज को इस पतन से सुरक्षित रखने के लिए किसी धर्म ने सूद पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई है। इस्लाम ही ऐसा धर्म है जिसने सूद को अति वर्जित ठहराया है। सूद को निषिद्ध घोषित करते हुए क़ुरआन में बाकी सूद को छोड देने की आज्ञा दी गई है और न छोडने पर ईश्वर और उसके संदेष्टा से युद्ध् की धमकी दी गई है। (कुरआन 2 : 279) islam
(6) इस्लाम ही को यह श्रेय भी प्राप्त है कि उसने धार्मिक रूप से रिश्वत (घूस) को निषिद्ध् ठहराया है (कुरआन 2:188) हज़रत मुहम्मद साहब ने रिश्वत देनेवाले और लेनेवाले दोनों पर खुदा की लानत भेजी है।
(7) इस्लाम ही ने सबसे प्रथम स्त्रियों को सम्पति का अधिकार प्रदान किया, उसने मृतक की सम्पति में भी स्त्रियों को भाग दिया। हिन्दू धर्म में विधवा स्त्री के पुनर्विवाह का नियम नहीं है, इतना ही नहीं मृत पति के शव के साथ विधवा का जीवित जलाने की प्रथा थी। जो नहीं जलाई जाती थी वह न अच्छा भोजन कर सकती थी, न अच्छा वस्त्र पहन सकती थी और न शुभ कार्यों में भाग ले सकती थी। वह सर्वथा तिरस्कृत हो जाती थी, उसका जीवन भारस्वरूप हो जाता था। इस्लाम में विधवा के लिए कोई कठोर नियम नहीं है। पति की मृत्यू के चार महीने दस दिन बाद वह अपना विवाह कर सकती है।
(8) इस्लाम ही ने अनिर्वा परिस्थिति में स्त्रियों को पति त्याग का अधिकार प्रदान किया है, हिन्दू धर्म में स्त्री को यह अधिकार नहीं है। हमारे देश में संविधान द्वारा अब स्त्रियों को अनेक अधिकार मिले हैं।
(9) यह इस्लाम ही है जिसने किसी स्त्री के सतीत्व पर लांछना लगाने वाले के लिए चार साक्ष्य उपस्थित करना अनिवार्य ठहराया है और यदि वह चार उपस्थित न कर सके तो उसके लिए अस्सी कोडों की सज़ा नियत की है। इस संदर्भ में श्री रामचन्द्र और हज़रत मुहम्मद साहब का आचरण विचारणीय है। मुहम्मद साहब की पत्नी सुश्री आइशा के सतीत्व पर लांछना लगाई गई थी जो मिथ्या सिद्ध हुई, श्रीमति आइशा निर्दोष सिद्ध हुई। परन्तु रामचन्द्र जी ने केवल संशय के कारण श्रीमती सीता देवी का परित्याग कर दिया जबकि वे अग्नि परीक्षा द्वारा अपना सतीत्व सिद्ध कर चुकी थीं। यदि पुरूष रामचंद्र जी के इस आचार का अनुसरण करने लगें तो कितनी निर्दाष सिद्ध् की जीवन नष्ट हो जाए। स्त्रियों को इस्लाम का कृतज्ञ होना चाहिए कि उसने निर्दोष स्त्रियों पर दोषारोपण को वैधानिक अपराध ठहराया।
(10) इस्लाम ही है जिसे कम नापने और कम तौलने को वैधानिक अपराध के साथ धार्मिक पाप भी ठहराया और बताया कि परलोक में भी इसकी पूछ होगी।
(11) इस्लाम ने अनाथों के सम्पत्तिहरण को धार्मिक पाप ठहराया है। (कुरआनः 4:10, 4:127)
(12) इस्लाम कहता है कि यदि तुम ईश्वर से प्रेम करते हो तो उसकी सृष्टि से प्रेम करो।
(13) इस्लाम कहता है कि ईश्वर उससे प्रेम करता है जो उसके बन्दों के साथ अधिक से अधिक भलाई करता है।
(14) इस्लाम कहता है कि जो प्राणियों पर दया करता है, ईश्वर उसपर दया करता है।
(15) दया ईमान की निशानी है। जिसमें दया नहीं उसमें ईमान नहीं
(16) किसी का ईमान पूर्ण नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने साथी को अपने समान न समझे।
(17) इस्लाम के अनुसार इस्लामी राज्य कुफ्र (अधर्म) को सहन कर सकता है, परन्तु अत्याचार और अन्याय को सहन नहीं कर सकता।
(18) इस्लाम कहता है कि जिसका पडोसी उसकी बुराई से सुरक्षित न हो वह ईमान नहीं लाया।
(19) जो व्यक्ति किसी व्यक्ति की एक बालिश्त भूमि भी अनधिकार रूप से लेगा वह क़ियामत के दिन सात तह तक पृथ्वी में धॅसा दिया जाएगा। islam
(20) इस्लाम में जो समता और बंधुत्व है वह संसार के किसी धर्म में नहीं है। हिन्दू धर्म में हरिजन घृणित और अपमानित माने जाते हैं। इस भावना के विरूद्ध 2500 वर्ष पूर्व महात्मा बुदद्ध ने आवाज़ उठाई और तब से अब तक अनेक सुधारकों ने इस भावना को बदलने का प्रयास किया। आधुनिक काल में महात्मा गाँधी ने अथक प्रयास किया किन्तु वे भी हिन्दुओं की इस भावना को बदलने में सफल नहीं हो सके। इसी प्रकार ईसाइयों भी गोरे-काले का भेद है। गोरों का गिरजाघर अलग और कालों का गिरजाघर अलग होता है। गोरों के गिरजाघर में काले उपासना के लिए प्रवेश नहीं कर सकते। दक्षिणी अफ्रीका में इस युग में भी गोर ईसाई का नारा व्याप्त है और राष्टसंघ का नियंत्रण है। इस भेद-भाव को इस्लाम ने ऐसा जड से मिटाया कि इसी दक्षिणी अफ्रीका में ही एक जुलू के मुसलमान होते ही उसे मुस्लिम समाज में समानता प्राप्त हो जाती है, जबकि ईसाई होने पर ईसाई समाज में उसको यह पद प्राप्त नहीं होता। गाँधी जी ने इस्लाम की इस प्रेरक शक्ति के प्रति हार्दिद उदगार व्यक्त किया है।।''
हम आभारी हैं मधुर संदेश संगम के जिन्होंने इस लेख को ‘इस्लाम की विशेषताऐं’ नामक पुस्तिका में छापा।
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इस्लाम, मुहम्‍मद और कुरआन पर महापुरूषों के विचार-islam-quran-comments-non-muslims

इन्सानी भाईचारा और इस्लाम पर महात्मा गाधी का ब्यानः ‘‘कहा जाता है कि यूरोप वाले दक्षिणी अफ्रीका में इस्लाम के प्रसार से भयभीत हैं, उस इस्लाम से जिसने स्पेन को सभ्य बनाया, उस इस्लाम से जिसने मराकश तक रोशनी पहुँचाई और संसार को भाईचारे की इंजील पढाई। दक्षिणी अफ्रीका के यूरोपियन इस्लाम के फैलाव से बस इसलिए भयभीत हैं कि उनके अनुयायी गोरों के साथ कहीं समानता की माँग न कर बैठें। अगर ऐसा है तो उनका डरना ठीक ही है। यदि भाईचारा एक पाप है, यदि काली नस्लों की गोरों से बराबरी ही वह चीज है, जिससे वे डर रहे हैं, तो फिर (इस्लाम के प्रसार से) उनके डरने का कारण भी समझ में आ जाता है।’’
पृष्ठ 13, प्रो. के. एस. रामाकृष्णा राव की मधुर संदेश संगम, दिल्ली से छपी पुस्तक ‘‘इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) में

खुदा के समक्ष रंक और राजा सब एक समान
इस्लाम के इस पहलू पर विचार व्यकत करते हुए सरोजनी नायडू कहती हैं-
‘‘यह पहला धर्म था जिसने जम्हूरियत (लोकतंत्र) की शिक्षा दी और उसे एक व्यावहारिक रूप दिया। क्योंकि जब मीनारों से अज़ाद दी जाती है और इबादत करने वाले मस्जिदों में जमा होते हैं तो इस्लाम की जम्हूरियत (जनतंत्र) एक दिन में पाँच बार साकार होती है, जब रंक और राजा एक-दूसरे से कंधे से कंधा मिला कर खडे होते हैं और पुकारते हैं, ‘अल्लाहु अकबर’ यानी अल्लाह ही बडा है। मैं इस्लाम की इस अविभाज्य एकता को देख कर बहुत प्रभावित हुई हूँ, जो लोगों को सहज रूप में एक-दूसरे का भाई बना देती है। जब आप एक मिस्री, एक अलजीरियाई, एक हिन्दुस्तानी और एक तुर्क (मुसलमान) से लंदन में मिलते हैं तो आप महसूस करेंगे कि उनकी निगाह में इस चीज़ का कोई महत्व नहीं है कि एक का संबंध मिस्र से है और एक का वतन हिन्दूस्तान आदि है।’’ पृष्ठ 12

विश्व प्रसिद्ध शायर गोयटे ने पवित्र कुरआन के बारे में एलान किया थाः ‘‘यह पुस्तक हर युग में लोगों पर अपना अत्यधिक प्रभाव डालती रहेगी।’’ पृष्ठ 16

जार्ज बर्नाड शा का भी कहना हैः
‘‘अगर अगले सौ सालों में इंग्लैंड ही नहीं, बल्कि पूरे यूरोप परकिसी धर्म के शासन करने की संभावना है तो वह इस्लाम है।’’
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'बर्नार्ड शा' अपनी किताब 'इस्लाम सौ साल के बाद' में कहता हैः पूरी दुनिया शीघ्र ही इस्लाम को स्वीकार कर लेगी। अगर वह उसे उसके स्पष्ट नाम के साथ स्वीकार न करेतो उसे ( किसी दूसरे) नाम से अवश्य स्वीकार करेगी। एक दिन ऎसा आएगा कि पश्चिम केलोग इस्लाम धर्म को गले से लगाएंगे। पश्चिम पर कई सदियाँ गुज़र चुकी हैं और वह इस्लामके संबंध में झूठ से भरी हुई किताबें पढ़ता चला आ रहा है। मैं ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में एक किताब लिखी थी किन्तु अंग्रेज कीरीतियों और परम्पराओं से हट कर होने के कारण वह ज़ब्त कर ली गई।
प्रोफेसर 'कीथ मोरे' अपनी किताब (The developing human)में कहते हैं: मुझे यह बात स्वीकारने में कोई कठिनाई नहीं होती किक़ुरआन अल्लाह का कलाम (कथन) है,क्योंकि क़ुरआन में जनीन (गर्भस्थ) के जो विश्वरण दियेगए हैं उनका सातवीं शताब्दी की वैज्ञानिक जानकारी पर आधारित होना असम्भव है। एकमात्र उचित परिणाम (निष्कर्ष) यह है कि यह विवरण मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम को अल्लाह की ओर से व (ईश्वाणी) किये गये थे।
इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ में उल्लिखित है -‘‘समस्त पैग़म्बरों और धार्मिक क्षेत्र के महान व्यक्तित्वों में मुहम्मद सबसे ज़्यादा सफल हुए हैं।’’ पृष्ठ 21

प्रेमचंद जी ‘‘इस्लामी सभ्यता’’ पुस्तिका जो मधुर संदेश संगम, दिल्ली से भी छपी है, में लिखते हैं:
‘‘जहां तक हम जानते हैं कि किसी धर्म ने न्याय को इतनी महानता नहीं दी जितनी इस्लाम ने।’’ पृष्ठ 5
‘संसार की किसी सभ्य से सभ्य जाति की न्याय-नीति की इस्लामी न्याय-नीति से तुलना कीजिए, आप इस्लाम का पल्ला झुकता हुआ पाएँगे।’’ पृष्ठ 7
‘‘हिन्दू-समाज ने भी शूद्रों की रचना करके अपने सिर कलंक का टीका लगा लिया। पर इस्लाम पर इसका धब्बा तक नहीं। गुलामी की प्रथा तो उस समस्त संसार में भी, लेकिन इस्लाम ने गुलामों के साथ जितना अच्छा सलूक किया उस पर उसे गर्व हो सकता है।’’ पृष्ठ 10
‘‘हमारे विचार में वही सभ्यता श्रेष्ठ होने का दावा कर सकती है जो व्यक्ति को अधिक से अधिक उठने का अवसर दे। इस लिहाज से भी इस्लामी सभ्यता को कोई दूषित नहीं ठहरा सकता।’’ पृष्ठ 11
‘‘हम तो याहं तक कहने को तैयार हैं कि इस्लाम में जनता को आकर्षित करने की जितनी बडी शक्ति है उतनी और किसी सस्था में नही है। जब नमाज़ पढते समय एक मेहतर अपने को शहर के बडे से बडे रईस के साथ एक ही कतार में खडा पाता है तो क्या उसके हृदय में गर्व की तरंगे न उठने लगती होंगी। उसके विरूद्ध हिन्दू समाज न जिन लोगों को नीच बना दिया है उनको कुएं की जगत पर भी नहीं चढने देता, उन्हें मंदिरों में घुसने नहीं देता।’’ पृष्ठ 14

स्नेह और सहिष्णुता के प्रचारक स्वामी विवेकानन्द कहते हैं ‘‘पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम संसार मे समानता के संदेशवाहक थे। वे मानवजाति में स्नेह और सहिष्णुता के प्रचारक थे। उनके धर्म में जाति-बिरादरी, समूह, नस्ल आदि का कोई स्थान नहीं है।’’
स्वामी विवेकानन्द इस्लाम के बड़े प्रशंसक और इसके भाईचारा के सिद्धांत से अभिभूत थे। वेदान्ती मस्तिष्क और इस्लामी शरीर को वह भारत की मुक्ति का मार्ग मानते थे। अल्मोड़ा से दिनांक 10 जून 1898 को अपने एक मित्र नैनीताल के मुहम्मद सरफ़राज़ हुसैन को भेजे पत्र में उन्होंने लिखा कि
‘‘अपने अनुभव से हमने यह जाना है कि व्यावहारिक दैनिक जीवन के स्तर पर यदि किसी धर्म के अनुयायियों ने समानता के सिद्धांत को प्रशंसनीय मात्र में अपनाया है तो वह केवल इस्लाम है। इस्लाम समस्त मनुष्य जाति को एक समान देखता और बर्ताव करता है। यही अद्वैत है। इसलिए हमारा यह विश्वास है कि व्यावहारिक इस्लाम की सहायता के बिना, अद्वैत का सिद्धांत चाहे वह कितना ही उत्तम और चमत्कारी हो विशाल मानव-समाज के लए बिल्कुल अर्थहीन है।’’विवेकानन्द साहित्य, जिल्द 5, पेज 415
स्वामी जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि
‘‘भारत में इस्लाम की ओर धर्म परिवर्तन तलवार (बल प्रयोग) या धोखाधड़ी या भौतिक साधन देकर नहीं हुआ था।’’विवेकानन्द साहित्य, जिल्द 8, पेज 330

सी एस श्रीनिवास ‘‘हिस्ट्री आफ़ इंडिया’’ में, जो मद्रास से 1937 मे प्रकाशित हुई थी, लिखते हैं
‘‘इस्लाम के पैग़बर ने जब एक शासक का स्थान प्राप्त किया तो भी आपका जीवन पूर्व की भांति सादा रहा। आप सुधारक भी थे और विजेता भी। आपने लोगों के अख़्लाकष् को बुलंद किया। प्रतिशोध लेने को अनुचित ठहराया और खोज-बीन के बिना रक्तपात से रोका, विखंडित कष्बीलों को एक कषैम बना दिया और एक ऐसा रिश्ता दिया जो ख़ानदानी रिश्तों से ज़्यादा टिकाऊ था।आपने लोगों को पस्ती, द्वेष और पक्षपात में ग़र्क पाया, लेकिन उनको सदाकत का संदेश देकर बुलंद कर दिया। उनको आपसी ख़ानदानी झगड़े में लिप्त पाया, मगर सहिष्णुता और भ्रातृत्व के रिश्ते में जोड़ दिया। आप एक फ़रिश्ता-ए-रहमत बनकर दुनिया में तशरीफ़ लाए।’’भारतीय सभ्यता पर मुसलमानों के उपकार, पृष्ठ 31

आदर्श जीवनजगत महर्षि पै़ग़म्बरे-इस्लाम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के विषय में महात्मा गांधी के विचार इस तरह हैं
'‘मैं पैग़म्बरे-इस्लाम की जीवनी का अध्ययन कर रहा था। जब मैंने किताब का दूसरा भाग भी ख़त्म कर लिया तो मुझे दुख हुआ कि इस महान प्रतिभाशाली जीवन का अध्ययन करने के लिए अब मेरे पास कोई और किताब बाकी नहीं। अब मुझे पहले से भी ज़्यादा विश्वास हो गया है कि यह तलवार की शक्ति न थी जिसने इस्लाम के लिए विश्व क्षेत्रा में विजय प्राप्त की, बल्कि यह इस्लाम के पैग़म्बर का अत्यन्त सादा जीवन, आपकी निःस्वार्थता, प्रतिज्ञा-पालन और निर्भयता थी, आपका अपने मित्रों और अनुयायियों से प्रेम करना और ईश्वर पर भरोसा रखना था। यह तलवार की शक्ति नहीं थी, बल्कि ये सब विशेषताएं और गुण थे जिनसे सारी बाधाएं दूर हो गयीं और आपने समस्त कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर ली।मुझसे किसी ने कहा था कि दक्षिण अफ्ऱीकष में जो यूरोपियन आबाद हैं, इस्लाम के प्रचार से कांप रहे हैं, उसी इस्लाम से जिसने मोरक्को में रौशनी फैलायी और संसार-निवासियों को भाई-भाई बन जाने का सुखद संवाद सुनाया। निःसन्देह दक्षिण अफ्ऱीका के यूरोपियन इस्लाम से नहीं डरते हैं, लेकिन वास्तव में वह इस बात से डरते हैं कि अगर इस्लाम कुबूल कर लिया तो वह श्वेत जातियों से बराबरी का अधिकार मांगने लगेंगे।आप उनको डरने दीजिए। अगर भाइ-भाई बनना पाप है, यदि वे इस बात से परेशान हैं कि उनका नस्ली बड़प्पन कायम न रह सके तो उनका डरना उचित है, क्योंकि मैंने देखा है कि अगर एक जूलो ईसाई हो जाता है तो वह सफ़ेद रंग के ईसाइयों के बराबर नहीं हो सकता। किन्तु जैसे ही वह इस्लाम ग्रहण करता है, बिल्कुल उसी वक्त वह उसी प्याले में पानी पीता है और उसी तश्तरी में खाना खाता है जिसमें कोई और मुसलमान पानी पीता और खाना खाता है, तो वास्तविक बात यह है जिससे यूरोपियन कांप रहे हैं।’’जगत महर्षि, पृष्ठ 2इन्सानियत फिर ज़िन्दा हुई

स्वामी लक्ष्मण प्रसाद लिखते हैं‘‘आस्था, विश्वास, पूजा-अर्चना, नैतिकता, सामाजिकता के सम्पूर्ण आवाहक हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के आगमन से पहले दुनिया में कहीं कोई आशा की किरन दिखाई नहीं देती थी, विश्वव्यापी गुमराहियों और भयंकर अंधकार में कहीं सभ्यता और संस्कृति की रौशनी नज़र नहीं आती थी। जब शराफ़त का नामो-निशान मिट चुका था, जब प्रकृति का वास्तविक सौंदर्य और आध्यात्मिकता की सुन्दरता ईश्वर के इन्कार मिथ्याकर्म के अंधकारों में छिप गई थी, इन्सान ख़ुदा की कष्द्र और महत्ता को भूलकर अपने गले में कुकर्म और मूर्तिपूजा की लानत की ज़ंजीर पहन चुका था, एक बार इन्सानियत मरकर फिर ज़िन्दा हुई। एशिया महाद्वीप के दक्षिण-पश्चिम में एक बड़ा प्रायद्वीप है जो अरब के नाम से मशहूर है। इसी अज्ञानता और बुराई के केन्द्र अरब के फ़ारान पर्वत की चोटियों से एक नूर चमका जिसने दुनिया के हालात को आमूल रूप से बदल दिया। गोशा-गोशा नूरे-हिदायत से जगमगा दिया।आज से तेरह सौ सदियां पहले इसी गुमराह देश मक्का की गलियों से एक क्रान्तिकारी आवाज़ उठी जिसने जुल्म-सितम के वातावरण में तहलका मचा दिया। यहीं से मार्गदर्शन का वह स्रोत फूटा जिसने दिलों की मुरझाई हुई खेतियां सरसब्ज़ कर दीं। इसी रेगिस्तानी, चमनिस्तान में रूहानियत का वह फूल खिला जिसकी रूहपर्वर महक ने नास्तिकता की दुर्गन्ध से घिरे इन्सानों के दिल व दिमाग़ों को सुगन्धित कर दिया।’’अरब का चाँद, पुस्तक से एकेश्वरवाद का सदुपयोग

हिन्दी के वरिष्ठतम साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र लिखते हैं‘‘जिस समय अरब देशवाले बहुदेवोपासना के घोर अंधकार में फंस रहे थे, उस समय महात्मा मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने जन्म लेकर उनको एकेश्वरवाद का सदुपयोग दिया। अरब के पश्चिम में ईसा मसीह का भक्तिपथ प्रकाश पा चुका था, किन्तु वह मत अरब, फ़ारस इत्यादि देशों में प्रबल नहीं था और अरब जैसे कट्टर देश में महात्मा मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के अतिरिक्त और किसी का काम न था कि वहां कोई नया मत प्रकाश करता। उस काल के अरब के लोग मूर्ख, स्वार्थ-तत्पर, निर्दय और वन्य-पशुओं की भांति कट्टर थे। यद्यपि उनमें से अनेक लोग अपने को इब्राहीम अ़लैहिस्सलाम के वंश का बतलाते और मूर्ति पूजा बुरी जानते किन्तु समाज परवश होकर सब बहुदेव उपासक बने हुए थे। इसी घोर समय में मक्के से मुहम्मद चन्द्र उदय हुआ और एक ईश्वर का पथ परिष्कार रूप से सबको दिखाई पड़ने लगा।’’


भारतेन्दु हरिश्चन्द्र समग्रसमस्त मानवजाति के मार्गदर्शकलाला काशीराम चावला ‘ऐ मुस्लिम भाई’ में लिखते हैं
‘‘समस्त धर्मों के प्रणेता और संस्थापक, बड़े-बड़े घरानों में पैदा हुए और उनकी पैदाइश पर बड़ी धूम-धाम मची, बड़े हर्ष वाद्य बजे। उदाहरणतः हज़रत ईसा अ़लैहिस्सलाम, बुद्व-भगवान, हज़रत मूसा अ़लैहिस्सलाम, भगवान कृष्ण, भगवान महावीर, गुरू नानक सबका बचपन नितांत लाड-प्यार और शानो-शौकत से गुज़रा। लेकिन आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के कष्टों का आरंभ जन्म से पहले ही हो चुका था।अभी आप माता के गर्भ ही में थे कि पिता का देहांत हो गया। छः वर्ष की अवस्था में मातृ-प्रेम से भी वंचित हो गये। दो साल दादा की गोद में खेले और आठवें वर्ष वे भी स्वर्ग सिधार गये और फिर आपके चाचा ने संभाला। इस प्रकार बचपन में शिक्षा-दीक्षा और सुख- शान्ति के समस्त साधन लुप्त हो गये। क्या वह ईश्वरीय चमत्कार नहीं कि ऐसी दशा में पला हुआ व्यक्ति आज मानवजाति के एक विशाल समूह का पथप्रदर्शक और नेता स्वीकार किया जा रहा है और उसने अरब जैसे बर्बर देश से निराश्रित अवस्था में संसार- निवासियों को मानवता का सन्देश दिया।किसे पता था कि ऐसा अप्रसिद्ध परिवार में जन्म लेने वाला अनपढ़ और अनाथ बालक अरब से अज्ञानता का नामो-निशान मिटाने वाला सुधारक बनेगा? समूचे संसार में इस्लामी पताका लहराने वाला रसूल होगा। कुरआन शरीफ़ का सन्देश पहुंचाने वाला नबी होगा? मूर्खों में महत्वपूर्ण क्रान्ति उत्पन्न करने वाला सुधारक होगा और एक बिल्कुल अनोखे नवीन धर्म का प्रकाश दिखाएगा? नितांत अल्प समय में स्वयं अशिक्षित होते हुए भी अपने बौद्विक ज्ञान से समस्त संसार के एक बहुत बड़े भाग को शिक्षा और ज्ञान से परिपूर्ण कर देगा? ऐसे ज्ञान से जो विश्व के समस्त मनुष्यों के लिए एक अनुकरणीय आदर्श है।आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने उदारता और समता, सत्य और न्याय एवं पड़ौसियों के स्वतत्वों का जो आदर्श संसार में स्थापित किया है, उसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के सुव्यवहार और समता-भाव का यह हाल था कि आपने अपने संपूर्ण जीवन में कभी किसी दास या बालक या पशू तक को न मारा, न किसी को अपशब्द कहा, एक बार बिल्ली को प्यासा देखा तो वुजू के लोटे से पानी पिलाया। इसी तरह एक बार एक बिल्ली आपके बिस्तर पर सोई हुई थी, आपने उसे उस सुख से वंचित न किया, चिड़ियों और चींटियों के मारने के विरूद्ध आदेश दिया, कुत्तों को पानी पिलाने वालों के अपराध क्षमा किये। युद्ध के बन्दियों का सम्मान किया। नितांत महत्वपूर्ण युद्ध-नियम निर्माण किये, जिसमें स्त्री, बालक, वृद्ध, सोये हुए और निहत्थे पर अस्त्रा चलाने की मनाही की। फ़सलों और मकानों को हानि पहुंचाने से रोका।आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम अन्य जातियों के सरदारों का आदर-सत्कार करते थे। अन्य धर्मों के विद्वानों और प्रतिष्ठित जनों से सम्मानपूर्वक मिलते थे। जहां अपने प्रिय अनुयायियों के लिए दिन-रात ईश्वर से प्रार्थना करते रहते थे, वहीं विरोधियों और शत्रुओं के लिए भी प्रार्थना करते थे। जब उहुद के युद्ध में आपके मुख पर पत्थर मारे गये और आपके दांत शहीद हो गये तो आपने फ़रमायाः ‘‘हे मेरे ईश्वर! तू मेरी जाति के इन लोगों को क्षमा प्रदान कर, क्योंकि निस्सन्देह वे नहीं जानते (कि वे क्या कर रहे हैं)।’’आपकी दानशीलता और उदार हृदयता अद्वितीय थी। प्रार्थी किसी धर्म या सम्प्रदाय का हो आपके द्वार से निराश न लौट सकता था। आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम का यह आदेश था कि सृष्टि के प्राणियों पर दया करो, ईश्वर से डरो। आप कष्र्ज़ लेकर भी लोगों की ज़रूरतें पूरी किया करते थे। आपकी आज्ञा थी कि (युद्ध में) दुश्मन की लाश नष्ट न की जाए, औरतों और बच्चों की हत्या न की जाए, शरीर के अंगो को काट-काटकर प्राण-वध न किया जाए, न शरीर के किसी भाग को जलाया जाए।आपकी सत्यप्रियता, शुद्ध हृदयता, ईमानदारी और न्यायशीलता की प्रशंसा न केवल मुसलमान, बल्कि अबू जहल और अबू सुफ़यान जैसे ख़ून के प्यासे दुश्मनों ने भी की, और इन्सान की वास्तविक प्रशंसा वही है जो विरोधी को भी मान्य हो और सच्ची बुराई वह होती है जिसे मित्रा भी निःसंकोच कह दे।
क्या वह आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम का चमत्कार नहीं है कि अरब के जाहिल, अक्खड़, लड़ाके, झगड़ालू, अंधविश्वासी, जुआरी, शराबी, डाकू, व्यभिचारी, प्रतिज्ञा-भंग, कन्यावध, सौतेली माताओं से विवाह करने वाले लोग आज सीधे-सादे यात्रियों और अतिथियों का आदर-सत्कार करने वाले, मेहनती, ईमानदार, सहायक, आज्ञापालक, समतावादी और ईश्वर पूजक दिखायी देते हैं। यह आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की शिक्षा का अलौकिक चमत्कार है कि इतने अल्प समय में इन लोगों के आचार-व्यवहार, स्वभाव, प्रकृति में एक असाधारण क्रान्ति उत्पन्न कर दी।आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इतने अधिक प्रभाव और अधिकार के बाद भी कभी अपने स्वभाव में परिवर्तन न होने दिया। एक यात्रा में भोजन तैयार न था। आपके साथियों ने मिलकर भोजन बनाने का निश्चय किया, लोगों ने एक-एक काम बांट लिया। साथियों के रोकने के बावजूद जंगल से लकड़ी लाने का काम आपने स्वंय लिया और फ़रमायाः ‘‘कोई कारण नहीं कि मैं अपने आपको श्रेष्ठ समझूं।’’बद्र की लड़ाई में सवारियों की संख्या कम थी। बारी-बारी लोग सवार होते थे, आप भी इसी प्रकार अपनी बारी पर चढ़ते और पैदल चलते।आपकी सादा ज़िन्दगी कहावत की सीमा तक पहुंच चुकी है। यह पहले लिखा जा चुका है कि आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम अपने घर का काम-काज अपने हाथ से स्वयं करते थे, कपड़ों में पेवंद लगाना, फटे जूते गांठना, झाडू देना, दूध दुहना, बाज़ार से सौदा-सुल्फ़ लाना आदि, यह सब काम हज़रत की दिनचर्या में सम्मिलित थे। दिखावे और आडमब्र को बिल्कुल पसन्द न फ़रमाते थे। मोटे, फटे कपड़े पहनते, कुर्ते का तुक्मा खुला होता था, बनाव-सिंगार को नापसंद करते थे। एक बार आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम अपनी प्रिय सुपुत्री फ़ातिमा ज़ोहरा रज़ियल्लाहु अ़न्हा के घर गये। लेकिन दीवारों पर पर्दे लटके हुए देखकर वापस चले आये। कारण पूछने पर आपने फ़रमायाः‘‘जिस घर में बनावट-सजावट में दिल लगा रहता हो, वहां मैं नहीं जा सकता।’’ऐसा क्यों था? इसलिए कि उनके पास वह ईश्वरीय आदेश पहुंच चुका था कि ईश्वरीय प्रेम के सम्मुख सांसारिक प्रेम तुच्छ है।कुरआन में एक जगह कहा गया हैः‘‘ऐ (ईश्वर पर) विश्वास रखने वालो! तुम्हें तुम्हारे (सांसारिक) धन और संतान ईश्वर उपासना से ग़ाफ़िल न कर दें, और जो ऐसा करेगा वह हानि उठाने वालों में है।’’आप सारी-सारी रात ईश्वर की उपासना में लीन रहते थे। जब घर के लोग सो जाते तो आप चुपचाप बिस्तर से उठकर ईश्वर-स्मरण में लग जाते। आपकी सुपत्नी हज़रत आइशा सिद्दीक रज़ियल्लाहु अ़न्हा फ़रमाती हैं कि एक रात मेरी आँख खुली तो आपको बिस्तर पर न पाया, मैं समझी आप किसी और हरम (पत्नी) के हुज्रे (कमरे) में तशरीफ़ ले गये हैं, किन्तु अंधेरे में टटोला तो मालूम हुआ कि आपका पवित्रा मस्तक धरती पर है और आप ईश्वर-प्रार्थना में लीन हैं। यह देखकर आप बहुत लज्जित हुईं कि आपका विचार क्या था और आप किस दशा में हैं। इसी का नाम इस्लाम है। इस्लाम का अर्थ हैः ईश्वर के आगे नतमस्तक हो जाना। आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम मानो हर समय ईश्वर के सम्मुख उपस्थित रहते थे। आपने युद्ध-क्षेत्र में भी कभी नमाज़ नहीं छोड़ी।ईश्वर पर आपका अटूट विश्वास था। आपका कथन है कि अगर जूती का तसमा भी टूटे तो ईश्वर ही से मांगो। एक बार आपकी प्रिय सुपुत्राी हज़रत फ़ातिमा रजिष्यल्लाहु अ़न्हा घरेलू कामों की अधिकता के कारण आपकी सेवा में उपस्थित हुई और बहुत डरते-डरते एक सेविका के लिए प्रार्थना की, तो आपने फ़रमायाः‘‘ऐ प्यारी बेटी! तू ईश्वर पर भरोसा रख और उसका हकष् अदा (स्वत्वपूर्ति) कर। अपने घर वालों की सेवा स्वयं कर। अगर तू किसी समय थकन अनुभव करे तो ‘सुब्हान अल्लाह’ (ईश्वर पवित्रा है) 33 बार, ‘अल्हम्दुलिल्लाह’ (सारी प्रशंसा ईश्वर के लिए है) 33 बार, ‘अल्लाहु अक्बर’ (ईश्वर ही सबसे बड़ा है) 34 बार पढ़ लिया कर, तेरी सारी थकन दूर हो जाया करेगी।’’इसका नाम है सच्ची भक्ति! इसका नाम है सच्ची ईश्वर-उपासना! इसका नाम है ईश्वर-प्रेम!आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम फ़रमाया करते थे, ‘‘मुसलमान की सबसे पहली निशानी यह है कि वह ईश्वर और किष्यामत के दिन के हिसाब- किताब से डरे।’’ ‘ऐ मुस्लिम भाई’, पृष्ठ 252 से

दयानिधि श्री देवदास गांधी, जो दिवंगत महात्मा गांधी के पुत्र हैं, अपने एक निबंध में लिखते हैं‘‘एक महान शक्तिशाली सूर्य के समान ईश्वर-दूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने अरब की मरूभूमि को उस समय रौशन किया, जब मानव-संसार घोर अंधकार में लीन था और जब आप इस दुनिया से विदा हुए तो आप अपना सब काम पूर्ण रूप से पूरा कर चुके थे, वह पवित्रतम काम जिससे दुनिया को स्थायी लाभ पहुंचने वाला था। दुनिया के सच्चे पथ-प्रदर्शक बहुत थोड़े हुए हैं और उनके युगों में एक-दूसरे से बहुत अन्तर रहा है और वे लोग कि जिन्होंने मुहम्मद साहब के जीवन-चरित्र का अध्ययन उसी श्रद्धा के साथ किया है, जिसके वे अधिकारी हैं, इस बात के मानने पर बाध्य हैं कि आप महान धर्म-उपदेशकों में से एक थे। आपकी महानता और गुरूता में उस समय और भी वृद्धि हो जाती है, जबकि आपका चित्रा खींचते वक्त हम उस नितांत आध्यात्मिक और नैतिक ह्नास की पृष्ठभूमि पर भी दृष्टि रखें जो आपके जन्म के समय अरब में विद्यमान थी। मुहम्मद साहब एक सभ्य और उन्नतशील वातावरण की पैदावार न थे। आपके समय में एक आदमी भी ऐसा नहीं था जिससे आप ब्रहम्वाद की शिक्षा ग्रहण करते, उस काल में ईश्वरीय धर्म के लिए तो अरब में जगह ही न थी, वह देश अपने अंधकारमय काल से गुज़र रहा था। जब ख़राबी और पतन अपनी सीमा को पहुंच गया तो उस समय आप ईश्वरीय अनुकंपा बनकर उदित हुए। ऐसी दशा में यदि उन्हें ‘रहमतुल लिल् आलमीन’ (संसार के लिए दयानिधी) की पद्वी दी जाती है, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है?आपकी अदर्श जीवनी हमें बताती है कि आपने अपने उपदेश और प्रचार का जीवन भर यही नियम रखा कि जो कुछ अपने अनुयायियों को सिखाना चाहते थे, पहले वह सब स्वयं करके दिखा दिया और कभी किसी ऐसे कार्य की शिक्षा न दी जिसका उदाहरण आपने उपस्थित न कर दिया हो।आपके पवित्रा जीवन में उस समय भी किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं आया, जबकि आप पैग़म्बर के पद पर शोभायमान हो गये। आपने सम्पूर्ण जीवन उसी सरलता और सादगी से व्यतीत किया। सांसारिक सुख और जीवन के भोग-विलास उस समय भी आपको अपनी ओर आकर्षित न कर सके जब एक से अधिक साम्राज्यों का धन आपके चरणों में अर्पित हो रहा था। आपका भोजन बहुत ही सादा और थोड़ा होता था और उसे भी केवल इसलिए खाते थे कि जीवित रह सकें। चटाइयां और टाट आपके बिस्तर थे और इसी तरह पहनने के कपड़े भी बहुत साधारण होते थे। आपने कभी किसी को कटुवचन नहीं कहा, यहां तक कि लड़ाई के अवसर पर भी दुश्मनों के साथ आपका स्वर कोमल होता था। सत्य यह है कि आपको अपनी इच्छाओं और मनोभावों पर पूरा-पूरा संयम प्राप्त था। गीता में कर्मयोगी के जो गुण बताये गये हैं, वह सबके सब आपमें पूर्णतया मौजूद थे।आप अपने अप्रिय कर्तव्यों को भी सच्चे ईमान और सच्ची वीरता के साथ पूर्ण किया करते थे और इच्छाएं या घमंड कभी आपके पगों में कम्पन उत्पन्न नहीं कर सकता था। कर्मयोगी उस व्यक्ति को कहते हैं जो अपने उत्तम विचारों को भी कार्य रूप में परिणत कर दे, और मुहम्मद साहब एक ऐसे ही व्यक्ति थे। एक नश्वर मनुष्य होते हुए भी आप अलौकिक गुण रखते थे। सुख- दुख, हर्ष, क्षोभ, जिनके प्रभावों के अन्तर्गत हम साधारण मनुष्यों के जीवन व्यतीत होते हैं और जो वास्तव में हमारे जीवन में क्रान्ति उत्पन्न कर देते हैं, उनसे यह पवित्रा और महान आत्मा कभी प्रभावित न होती थी।जो लोग समाज की वर्तमान व्यवस्था और प्रणाली को परिवर्तित करने में लगे हुए हैं और चाहते हैं कि इससे अच्छे समाज को जन्म दें, उनके दिलों पर जिस बात का गहरा प्रभाव पड़ेगा वह पैग़म्बर साहब का वह उच्च आदर्श है जिसे उन्होंने मेहनत-मज़दूरी के संबंध में कषयम किया। इस ईशदूत ने ऐसे बहुत से अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित किये हैं, जिन्हें लोगों ने भुला दिया है। उनमें से एक यह है कि आप अपने कपड़ों की स्वयं मरम्मत करते थे। यही नहीं बल्कि अपने जूते भी ख़ुद ही टांकते थे। आप घर के काम-काज में प्रायः अपने सेवकों की सहायता करते थे। मस्जिद के निर्माण में आपने मज़दूरों के साथ बराबर काम किया है। मज़दूरों के साथ काम करते वक्त आप उनमें इस प्रकार घूल-मिल जाते थे कि कोई उन्हें पहचान न सकता था।बच्चों से आपको विशेष लगाव था और उनके साथ आप बहुत प्रसन्न रहते थे। वे सौभाग्यशाली बच्चे जो आपके जीवनकाल में थे और जिन्हें आपका प्रेम प्राप्त रहा, अपने घरों में इतने प्रसन्न नहीं रहते थे जितना आपके साथ। बच्चों के साहचर्य में उठना-बैठना आपके लिए कोई इत्तिफ़ाकी बात न थी, बल्कि यह आपका नियम और कार्यक्रम था कि बच्चों को ढूंढ़कर उनके साथ हो जाते और अपने उत्तम विचार उनके मस्तिष्क में अर्पित कर देते। क्या शिक्षा और उपदेश का इससे अधिक स्वाभाविक और सरल ढंग कोई हो सकता है? मासिक ‘पेशवा’, दिल्ली, जुलाई 1931 ई.

डॉ॰ बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर (बैरिस्टर, अध्यक्ष-संविधान निर्मात्री सभा)
‘‘...इस्लाम धर्म सम्पूर्ण एवं सार्वभौमिक धर्म है जो कि अपने सभी अनुयायियों से समानता का व्यवहार करता है (अर्थात् उनको समान समझता है)। यही कारण है कि सात करोड़ अछूत हिन्दू धर्म को छोड़ने के लिए सोच रहे हैं और यही कारण था कि गाँधी जी के पुत्र (हरिलाल) ने भी इस्लाम धर्म ग्रहण किया था। यह तलवार नहीं थी कि इस्लाम धर्म का इतना प्रभाव हुआ बल्कि वास्तव में यह थी सच्चाई और समानता जिसकी इस्लाम शिक्षा देता है...।’’
—‘दस स्पोक अम्बेडकर’ चौथा खंड—भगवान दास--पृष्ठ 144-145 से उद्धृत
प्रोफ़ेसर के॰ एस॰ रामाकृष्णा राव (अध्यक्ष, दर्शन-शास्त्र विभाग, राजकीय कन्या विद्यालय मैसूर, कर्नाटक)
 इस्लाम का मूल मंत्र है। इस्लाम की तमाम शिक्षाएँ और कर्म इसी से जुड़े हुए हैं। वह केवल अपने अलौकिक व्यक्तित्व के कारण ही अद्वितीय नहीं, बल्कि अपने दिव्य एवं अलौकिक गुणों एवं क्षमताओं की दृष्टि से भी अनन्य और बेजोड़ है।’’—‘मुहम्मद, इस्लाम के पैग़म्बर More
विशम्भर नाथ पाण्डे भूतपूर्व राज्यपाल, उड़ीसा
क़ुरआन ने मनुष्य के आध्यात्मिक, आर्थिक और राजकाजी जीवन को जिन मौलिक सिद्धांतों पर क़ायम करना चाहा है उनमें लोकतंत्र को बहुत ऊँची जग हदी गई है और समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व-भावना के स्वर्णिम सिद्धांतों को मानव जीवन की बुनियाद ठहराया गया है। More
 

तरुण विजय सम्पादक, हिन्दी साप्ताहिक ‘पाञ्चजन्य’ (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पत्रिका)
‘‘...क्या इससे इन्कार मुम्किन है कि पैग़म्बर मुहम्मद एक ऐसी जीवन-पद्धति बनाने और सुनियोजित करने वाली महान विभूति थे जिसे इस संसार ने पहले कभी नहीं देखा? उन्होंने इतिहास की काया पलट दी और हमारे विश्व के हर क्षेत्र पर प्रभाव डाला। अतः अगर मैं कहूँ कि इस्लाम बुरा है तो इसका मतलब यह हुआ कि दुनिया भर में रहने वाले इस धर्म के अरबों (Billions) अनुयायियों के पास इतनी बुद्धि-विवेक नहीं है कि वे जिस धर्म के लिए जीते-मरते हैं उसी का विश्लेषण और उसकी रूपरेखा का अनुभव कर सवें$। इस धर्म के अनुयायियों ने मानव-जीवन के लगभग सारे क्षेत्रों में बड़ा नाम कमाया और हर किसी से उन्हें सम्मान मिला...।’’
‘‘हम उन (मुसलमानों) की किताबों का, या पैग़म्बर के जीवन-वृत्तांत का, या उनके विकास व उन्नति के इतिहास का अध्ययन कम ही करते हैं... हममें से कितनों ने तवज्जोह के साथ उस परिस्थिति पर विचार किया है जो मुहम्मद के, पैग़म्बर बनने के समय, 14 शताब्दियों पहले विद्यमान थे और जिनका बेमिसाल, प्रबल मुक़ाबला उन्होंने किया? जिस प्रकार से एक अकेले व्यक्ति के दृढ़ आत्म-बल तथा आयोजन-क्षमता ने हमारी ज़िन्दगियों को प्रभावित किया और समाज में उससे एक निर्णायक परिवर्तन आ गया, वह असाधारण था। फिर भी इसकी गतिशीलता के प्रति हमारा जो अज्ञान है वह हमारे लिए एक ऐसे मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं है जिसे माफ़ नहीं किया जा सकता।’’
‘‘पैग़म्बर मुहम्मद ने अपने बचपन से ही बड़ी कठिनाइयाँ झेलीं। उनके पिता की मृत्यु, उनके जन्म से पहले ही हो गई और माता की भी, जबकि वह सिर्प़$ छः वर्ष के थे। लेकिन वह बहुत ही बुद्धिमान थे और अक्सर लोग आपसी झगड़े उन्हीं के द्वारा सुलझवाया करते थे। उन्होंने परस्पर युद्धरत क़बीलों के बीच शान्ति स्थापित की और सारे क़बीलों में ‘अल-अमीन’ (विश्वसनीय) कहलाए जाने का सम्मान प्राप्त किया जबकि उनकी आयु मात्रा 35 वर्ष थी। इस्लाम का मूल-अर्थ ‘शान्ति’ था...। शीघ्र ही ऐसे अनेक व्यक्तियों ने इस्लाम ग्रहण कर लिया, उनमें ज़ैद जैसे गु़लाम (Slave) भी थे, जो सामाजिक न्याय से वंचित थे। मुहम्मद के ख़िलाफ़ तलवारों का निकल आना कुछ आश्चर्यजनक न था, जिसने उन्हें (जन्म-भूमि ‘मक्का’ से) मदीना प्रस्थान करने पर विवश कर दिया और उन्हें जल्द ही 900 की सेना का, जिसमें 700 ऊँट और 300 घोड़े थे मुक़ाबला करना पड़ा। 17 रमज़ान, शुक्रवार के दिन उन्होंने (शत्रु-सेना से) अपने 300 अनुयायियों और 4 घोड़ों (की सेना) के साथ बद्र की लड़ाई लड़ी। बाक़ी वृत्तांत इतिहास का हिस्सा है। शहादत, विजय, अल्लाह की मदद और (अपने) धर्म में अडिग विश्वास!’’

—आलेख (‘Know thy neighbor, it’s Ramzan’  अंग्रेज़ी दैनिक ‘एशियन एज’, 17 नवम्बर 2003 से उद्धृत साभार
 राजेन्द्र नारायण लाल (एम॰ ए॰ (इतिहास) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)
‘‘...संसार के सब धर्मों में इस्लाम की एक विशेषता यह भी है कि इसके विरुद्ध जितना भ्रष्ट प्रचार हुआ किसी अन्य धर्म के विरुद्ध नहीं हुआ । More

'लोरा वेस्सिया वागलियेरी'(L.VecciaVaglieri)अपनी पुस्तक इस्लाम का दिफा प्रतिरक्षामें लिखती हैः "मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी पूरी जवानी के दिनों में जबकि लैंगिक इच्छा अपनी चरम सीमा पर होती है और जबकि आप ऎसे समाज -अरब समाज-में रह रहे थे जहाँ शादी एक समाजी संस्था के रूप में अनुपस्थित थी और जहाँ अनेकबीवियों से शादी करना ही नियम था और तलाक़ देना अत्यंत सरल था, इसके बावजूद आप नेकेवल एक औरत से शादी की। वह खदीजा रजि़यल्लाहु अन्हा हैं जिनकी आयु पैग़म्बरसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की आयु से बहुत बड़ी थी, और आप पचीस साल तक उनके मुख्लिस और प्रिय पती रहे, और दूसरी शादी उस समय तक नहीं की जब तक खदीजा  रजि़यल्लाहु अन्हा की मृत्यु न हो गई और आप की आयु पचास साल को पहुंच गई। पैग़म्बरसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इन शादियों में से हर एक शादी का कोई न कोई राजनीतिक या समाजी कारण अवश्य था, जिन औरतों से आप ने शादियाँ कीं उसका उद्देश्य परहेज़गार और सदाचारी औरतों को सम्मान देना और कुछ क़बीलों और खानदानों के साथ वैवाहिक संबंधस्थापित करना था ताकि इस्लाम को फैलाने के लिए एक नया रास्ता निकाल सकें। केवल आइशारजि़यल्लाहु अन्हा को छोड़ कर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऎसी महिलाओंसे शादियां कीं जो कुंआरी, जवान और सुंदर नहीं थीं, तो क्या आप एक शहवानी (कामुक औरशहवत परस्त) व्यक्ति थे? आप एक मनुष्य थे पूज्य नहीं थे। नई शादी करने का कारण यहभी हो सकता है कि आप को औलाद की इच्छा रही हो...आप के पास आय के कोई अधिक साधन नहींथे इसके बावजूद आप ने एक भारी परिवार का आर्थिक बोझ अपने कन्धे पर उठा लिया औरहमेशा उन सब के साथ पूरी बराबरी के साथ निबाह किया और कभी भी उन में से किसी के साथअंतर और भेद भाव का रास्ता नहीं अपनाया। आप ने पिछले पैग़म्बरों जैसे मूसा अलैहिस्सलाम आदि के आदर्श पर चलते हुए काम किया जिनके अनेक शादियों पर आपत्तिा(एतिराज़) करने वाला कोई नहीं। तो क्या मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बहुविवाह की आलोचना करने का यही कारण रह जाता है कि हम दूसरे पैग़म्बरों के दैनिकजीवन के विवरण नहीं जानते हैं जबकि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के परिवारिक जीवन की एक एक चीज़ जानते हैं?"

प्रसिद्ध अंग्रेज़ लेखक 'थामस कार्लायल'(Thomas Carlyle) अपनी किताब 'हीरोज़' में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में कहताहैः मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम शहवत के पुजारी नहीं थे, जबकि अत्याचार, अन्याय और जि़यादती करते हुए आप पर यह आरोप लगाया गया है। उस समय हम बड़ा अत्याचारऔर भयानक ग़लती करते हैं जब आप को एक शहवत परस्त (कामुक) आदमी समझते हैं, जिसका अपनीइच्छा और लालसा पूरी करने के सिवा कुछ काम न था। कदापि नहीं! उसके और लालसाओं केबीच ज़मीन आसमान का अंतर था।
More हज़रत पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बीवियाँ


Mahatma Gandhi, statement published in 'Young India ,.

I wanted to know the best of the life of one who holds today an undisputed sway over the hearts of millions of mankind.... I became more than ever convinced that it was not the sword that won a place for Islam in those days in the scheme of life. It was the rigid simplicity, the utter self-effacement of the Prophet the scrupulous regard for pledges, his intense devotion to his friends and followers, his intrepidity, his fearlessness, his absolute trust in God and in his own mission. These and not the sword carried everything before them and surmounted every obstacle. When I closed the second volume (of the Prophet's biography), I was sorry there was not more for me to read of that great life.

Sir George Bernard Shaw in 'The Genuine Islam,' Vol. 1, No. 8, 1936.

"If any religion had the chance of ruling over England , nay Europe within the next hundred years, it could be Islam."

“I have always held the religion of Muhammad in high estimation because of its wonderful vitality. It is the only religion which appears to me to possess that assimilating capacity to the changing phase of existence which can make itself appeal to every age. I have studied him - the wonderful man and in my opinion for from being an anti-Christ, he must be called the Savior of Humanity."

"I believe that if a man like him were to assume the dictatorship of the modern world he would succeed in solving its problems in a way that would bring it the much needed peace and happiness: I have prophesied about the faith of Muhammad that it would be acceptable to the Europe of tomorrow as it is beginning to be acceptable to the Europe of today.”

K. S. Ramakrishna Rao in 'Mohammed: The Prophet of Islam,' 1989

My problem to write this monograph is easier, because we are not generally fed now on that (distorted) kind of history and much time need not be spent on pointing out our misrepresentations of Islam. The theory of Islam and sword, for instance, is not heard now in any quarter worth the name. The principle of Islam that “there is no compulsion in religion” is well known.

Annie Besant in 'The Life and Teachings of Mohammad,' Madras , 1932.
It is impossible for anyone who studies the life and character of the great Prophet of Arabia, who knew how he taught and how he lived, to feel anything but reverence for that mighty Prophet, one of the great messengers of the Supreme. And although in what I put to you I shall say many things which may be familiar to many, yet I myself feel, whenever I reread them, a new way of admiration, a new sense of reverence for that mighty Arabian teacher.

Michael Hart in 'The 100, A Ranking of the Most Influential Persons In History,' New York , 1978.
My choice of Muhammad to lead the list of the world’s most influential persons may surprise some readers and may be questioned by others, but he was the only man in history who was supremely successful on both the secular and religious level. ...It is probable that the relative influence of Muhammad on Islam has been larger than the combined influence of Jesus Christ and St. Paul on Christianity. ...It is this unparalleled combination of secular and religious influence which I feel entitles Muhammad to be considered the most influential single figure in human history.
read more: Quotations from Famous People
 http://www.rasoulallah.net/v2/document.aspx?lang=en&doc=7701

Sarogini Naidu, the famous poetess of India says about Islam: "It was the first religion that preached and practiced democracy; for in the mosque, when the call for prayer is sounded and worshippers are gathered together, the democracy of Islam is embodied five times a day when the peasant and king kneel side by side and proclaim: 'God Alone is Great'… I have been struck over and over again by this indivisible unity of Islam that makes man instinctively a brother."


Thanks
Muhammad in their Eyes
http://www.rasoulallah.net/v2/folder.aspx?lang=en&folder=380








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पुस्‍तक ''जिहाद या फ़साद'-jihad--aur-quran--sawalon-ke-jawab

(हिन्‍दू स्‍कालर हरिद्वार निवासी डा. अनूप गौड़ की पुस्‍तक “क्या हिन्दुत्व का सूर्य डूब जाएगा...”
जो “विश्व संवाद केन्द्र” लखनऊ से प्रकाशित का सूक्ष्म जवाब)

लेखक:- डा. मौलवी मुहम्‍मद असलम क़ासमी



दो शब्‍द
यह दुनिया स्थिर नहीं हैं, हर मनुष्य के भूतकालिक जीवन के संबंध में तो यह कहा जा सकता है कि वह उसका था, परन्तु भविष्य के एक क्षण का भरोसा नहीं, किसी को नहीं मालूम कि कब वह परलोक सिधार जाए एवं उसकी आत्मा मिट्टी के इस शरीर को त्याग दें।
यह आत्मा इस शरीर को त्यागकर कहाँ जाती है? आधुनिक विज्ञान भी इस संबंध में कुछ कहने से लाचार दिखाई पड़ता है। मरने के बाद क्या होगा? इसके बारे में केवल धर्म ही हमारा मार्गदर्शन करता है। करीब-करीब सभी बडे़ धर्मों का मानना है कि मरने के बाद हर मनुष्य की आत्मा को ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत होकर अपने द्वारा किए गए हर प्रकार के कार्यों का हिसाब चुकाना है। इस संबंध में इस्लामिक सिद्वांत यह है कि हर आत्मा ईश्वर की अमानत है वह जब चाहता है उसे वापस ले लेता है। अतः मरने के बाद हर मनुष्य की आत्मा देव-दूतों के कब्जें मे होती है। जहाँ वह उसे एक अलग दुनिया में ले जाते है एवं उसके अच्छे व बुरे कर्मो के अनुसार उसे फल या दण्ड दिया जाता है।
ईश्वर की अदालत में हर मनुष्य के द्वारा किए गए मामूली से मामूली कार्यों को भी सामने ला दिया जाता है। इसी पर प्रकाश डालते हुए, क़ुरआन में एक स्थान पर कहा गया है कि जब हर मनुष्य द्वारा किया गया, छोटा व बडा कार्य ईश्वरीय अदालत में उसके सामने लाया जाएगा तो वह पुकार उठेगा कि -
“हायरे! यह कैसा रिकार्ड है जिसने हर छोटा बडा कार्य सामने ला दिया है।” .. क़ुरआन .... सूरह कहफ, आयत 49
अच्‍छे और बुरे की समीक्षा के बाद हर मनुष्य के लिए केवल दो ही स्थान होंगे, स्वर्ग या नरक, जहाँ उसे सदैव रहना है।
जब हम मरने के बाद के जीवन पर नज़र डालते है तो हमें वर्तमान की जिन्दगी अति दुर्बल, बेहक़ीक़त, इंतिहाई मामूली और बहुत छोटी नज़र आने लगती है। परन्तु इस मामूली जीवन काल में जब मानव जगत धर्म के नाम पर अधर्मीय कार्य करने में लिप्त हो जाए, वही धर्म जो इस दुनिया को बहुत बौना और दुर्बल दिखाता था, सांप्रदायिकता का विषय बनकर मानव जगत में नफ़रत की फ़सल उगाने लगे तो स्थिति बहुत गम्भीर हो जाती है।
परन्तु ऐसा क्यों ? क्या यह ज़रूरी है कि हम जिसे सही समझ रहे हैं केवल वही सत्य मार्ग हो, जो वास्तव में हमें सही मार्ग पर ले जाएगा? धर्म मनुष्य को सही मार्ग दिखाने के लिए है, परन्तु इस धरती पर तो अनेक धर्म हैं, किसे सही कहा जाए और किसे रद्द किया जाए, यह एक विचारणीय बिन्दु है, जब हम इस बात पर विचार करते हैं तो एक महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे दिमाग को झंझोड़ने लगता है, वह यह कि अगर इस सृष्टि का रचयिता सर्वशक्तिमान ईश्वर एक है तो उसके द्वारा दिए गए धर्म अनेक कैसे हो सकते है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम समझने में गलती कर रहे हों, सत्य मार्ग की खोज करना हर व्यक्ति का कर्तव्य है। ऐसा भी हो सकता है कि हम अपनी कमियों से कांच को हीरा समझ रहे हों या हीरे को कुछ और।
हीरे या मोती के असली, नक़ली का पता लगाना यद्यपि जौहरी का काम है, परन्तु हीरा, मोती धारक की भी कुछ ज़िम्मेदारी बनती है अन्यथा उसे उस समय पछताना पड़ेगा जब उसका मूल्य प्राप्त करने का समय आएगा।
जब चमकते सोने को गन्दे कपडे़ में लपेटकर फेंक दिया जाए तो हर देखने वाला उसे गन्दा कपड़ा समझकर छोड़ देगा, परन्तु इससे सोने की कीमत में कोई कमी नहीं आती।
कुछ इसी प्रकार का प्रदर्शन वर्तमान में इस्लाम धर्म के संबंध में उन व्यक्तियों की ओर से देखा जा सकता है जो उसकी संसार भर में बढ़ती लोकप्रियता से भयभीत हैं।
इस्लाम धर्म दुनिया के बड़े धर्मों में से एक है और सारी दुनिया में अधिक तेजी से फैलने वाला धर्म भी, परन्तु वर्तमान में इस्लाम धर्म एवं उसके पैग़म्बर के ऊपर बडे़-बडे़ आरोप लगाए गए, इस प्रकार के आरोप प्रतिदिन समाचार पत्रों में भी देखने को मिलते रहते हैं। साथ ही बाक़ायदा तौर पर इस विषय की पुस्तकें भी लिखी जाती हैं। ऐसी ही एक पुस्तक “क्या हिन्दुत्व का सूर्य डूब जाएगा...” के अध्ययन का अवसर प्राप्त हुआ। यह पुस्तक “विश्व संवाद केन्द्र” लखनऊ के सहयोग से जागृति प्रकाशन हरिद्वार द्वारा प्रकाशित की गई हैं, एवं उसके लेखक एक सामाजिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रवादी, अखिल भारतीय संस्था से जुडे़ व्यक्ति हैं। इस पुस्तिका में इस्लाम धर्म से जोड़कर जो बातें कही गयी हैं।
वे सब उसी प्रकार की हैं।
झूठ को अगर हेरा-फेरी से सच जैसा दिखाकर पेश किया जाए, तो कभी-कभी वह अच्छे ख़ासे व्यक्ति को भी सोचने पर मजबूर कर देता है कि जो कुछ उसके सामने प्रस्तुत किया गया, क्या वह सच तो नहीं? परन्तु जब कोई सीधे तौर पर डिटाई के साथ झूठ को सच कहकर प्रस्तुत करे, तो सोचने वाला दिमाग़ एवं धड़कने वाला दिल व्याकुल हो उठता है। इस प्रकार की बातों ने हर निष्पक्ष मनुष्य की भांति मेरे मन को भी झंझोड़ डाला, अतः मैंने सत्य को सामने लाने के लिए कलम का सहारा लेना उचित समझा।
मैं जानता हूँ कि मैं एक मामूली व्यक्ति हूँ एवं मेरे द्वारा किया गया यह कार्य “नक्क़ारख़ाने में तूती की आवाज़” बनकर भूल-भुलैया की दुनिया में गुम भी हो सकता है। लेकिन एक शायर के बक़ौल-
कोई सुने न सुने इनक़लाब की आवाज़।
पुकारने की हदों तक तो हम पुकार आए।।
मेरा प्रयास रहा है कि कोई ऐसी बात क़लम से न निकले जो किसी की धार्मिक या सामाजिक भावनाओं को ठेस पहुँचाए।
मुझे आशा ही नहीं अपितु यक़ीन है कि इस पुस्तिका में आपको ऐसी कोई बात नहीं मिलेगी, फिर भी अगर अन्जाने में किसी बात से आपकी भावना को ठेस लगे तो मैं पूर्वतः ही क्षमायाची हूँ।
किताब के अन्त में दो लेख जो कहीं न कहीं इसी विषय से सम्बन्ध रखते हैं हिन्दी मासिक ”कान्ति“ देहली के जनवरी एवं फरवरी 2008 के अंकों से नकल करके लिखे गये हैं।
इस पुस्तिका को प्रस्तुत करने में जिन मित्रों ने किसी भी प्रकार का सहयोग दिया हैं। मैं उनको धन्यवाद करता हूँ। विशेष रूप से डा. मौ. अख़लाक़, मास्टर अब्दुल मलिक, बाबू शफीक़ अहमद, भाई सतीश चन्द गुप्ता, कारी सलीम अख़्तर, भाई मौ. इरफान एवं धीरज सिंह का आभारी हूँ जिन्होंने कम्पोज़िंग एवं प्रूफ रीडिंग आदि में मुझे अपना अमूल्य सहयोग देकर पुस्तिका को अतिशीघ्र प्रकाशित करने में मेरी मदद की।
धन्यवाद!
डा. मुहम्मद असलम क़ासमी
मिल्लत उर्दू एकेडमी मौहल्‍ला सोत, रूड़की (हरिद्वार)

हरिद्वार निवासी डा. अनूप गौड़ के द्वारा लिखित पुस्तिका ”क्या हिन्दुत्व का सूर्य डूब जाएगा” प्रकाशक “जागृति प्रकाशन हरिद्वार, उत्तरांचल” के अध्ययन का अवसर प्राप्त हुआ। जैसा कि उक्त पुस्तिका के नाम से ही प्रतीत होता है कि लेखक हिन्दुत्व के संबंध में चिन्तनशील हैं, उन्हें भय है कि कहीं हिन्दुत्व का सूर्य डूब न जाए। अतः उन्होंने हिन्दू भाइयों को मुसलमानों से चेताते हुए आग्रह किया है कि-
‘‘हिन्दुओं को एक बार मुसलमानों के साथ युद्ध करना ही पड़ेगा और इसके लिए हिन्दुओं को अपनी ओर से तैयारी कर लेनी चाहिए।’’ पृष्ठ 75
प्रश्न यह है कि डा. गौड़ को मुसलमानों के प्रति इतना गुस्सा क्यों है कि वह हिन्दुओं को उनसे लड़ मरने की सलाह दे रहे हैं। डा. गौड़ की उक्त पुस्तिका को पढ़कर यह कहना उचित लगता है कि इस्लाम धर्म के संबंध से उसमें लिखी बातों को अगर सत्य मान लिया जाए, तो हर बुद्धिमान व्यक्ति को उतना ही गुस्सा आना चाहिए, जितना उक्त लेख से प्रकट हो रहा है परन्तु इसे क्या कहा जाए कि जिन बातों को सत्य जानकर उक्त लेखक नाराज़ हैं, वह निश्चित रूप से असत्य हैं, निराधार हैं, एवं सरासर आरोप हैं। लेखक महोदय स्वयं इतिहास को पढ़ें तो यह बात उनके सामने आएगी कि सच्चाई क्या है? उक्त पुस्तिका में इस्लाम एवं मुसलमानों पर अनेक बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाए गए हैं। उनमें से कुछ पर सूक्ष्म टिप्पणी आपके सामने प्रस्तुत है। उदाहरण के तौर पर डा. गौड़ लिखते हैं।
‘‘इस्लाम का मानना है कि नारी में जीवन नहीं होता है अतः वह वस्तु है, भोगने योग्य है।’’ .......पृष्ठ 32
तौबा-तौबा! इतना बड़ा इल्ज़ाम उस धर्म के ऊपर जिसने चैदह सौ साल पहले के उस समय में जब लड़की के पैदा होने पर मातम होता था, जब नारी को पुरूष की सम्पत्ति माना जाता था, जब उसे पैदा होते ही ज़िन्दा ज़मीन में गाड़ देने का रिवाज आम था। वह स्वयं अपने नाम से कोई सम्पत्ति नहीं ख़रीद सकती थी, (ख़्याल रहे कि ब्रिटेन में नारी को यह अधिकार 1817 में प्राप्त हुआ। ) और हाँ उस समय में जब महिला को अपने पति की चिता के साथ ज़िन्दा जल जाना पड़ता था, जब एक नारी का हाथ किसी के भी हाथ में पकड़ाकर उसे चाहे अनचाहे पुरूष की पत्नी बना देने का अधिकार केवल पुरूष को था। उस समय इस्लाम ने उसे सर उठा कर जीने का अधिकार दिया। किसी पुरूष के साथ उसके विवाह में उस की रज़ामन्दी को शर्त ही नहीं रखा बल्कि यह आदेश भी दिया कि विवाह के समय भी लड़की से पूछा जाए।, यही नही बल्कि यह भी आदेश किया कि विवाह के समय एक पर्याप्त धन पुरूष महिला को दे जिसे “महर” कहा जाता है, जिस पर केवल महिला का अधिकार है। उसे सम्पत्ति रखने-बेचने खरीदने का पूरा अधिकार दिया। माता-पिता एवं पति की सम्पत्ति में उसका निश्चित हिस्सा निर्धारित किया, जब कि भारत में यह अधिकार नारी को 2006 में दिया गया है। इस्लाम में जहाँ जहाँ भी पुरूष व महिला की बात आई है, वहाँ पुरूष की तुलना में महिला को अधिक आदर एवं सम्मान दिया गया। कुरआन की यह आयत देखें -
‘‘और हमने मनुष्य को अपने माता-पिता के साथ अच्छा बरताव करने की नसीहत की, उसकी माँ ने कठिनाइयाँ झेल कर उसे पेट में रखा एवं कठिनाइयाँ झेल कर ही उसे जन्मा एवं उसके गर्भ और दूध छुडाने में 2 साल लगे।’’ सूरह लुकमान आयत 14
और कुरआन में स्पष्ट रूप सें पुरूषों और महिलाओं को एक-दूसरे के प्रति समान अधिकार का वर्णन करते हुए कहा गया है - ''और महिलाओं को भी मारूफ़ तरीके़ पर वही अधिकार प्राप्त है जैसे पुरूषों के महिलाओं पर हैं।'' सूरह बकर आयत नं0 228
सूरह बकर आयत नं. 228
जिस धर्म ने नारी को यह सम्मान दिया है उस पर इतना बड़ा इल्ज़ाम लगाना कि वह नारी को निर्जीव मानता है, कितना बड़ा अन्याय है?
मान्य “डा. अनूप गौड़” अगर यह पुष्टि भी कर देते कि उन्होंने उक्त राय किन बुनियादों पर क़ायम की है तो अच्छा होता।
डा. गौड़ अपनी इसी पुस्तक में लिखते हैं
‘‘मुहम्मद सल्ल. ने स्वयं अपने जीवन काल में 82 युद्ध किए इन युद्धों में से कई युद्धों का उन्होंने स्वयं नेतृत्व किया था ......इसी लिए जेहाद अर्थात ख़ूनी आन्दोलन का इस्लाम में सर्वाधिक महत्व है।’’ पेज 33
प्रिय डा. अनूप गौड साहब आपने बिल्कुल गलत समझा है। मुहम्मद सल्ल. ने कोई युद्ध नही किया, केवल आप समझने में गलती कर रहे हैं। वह कैसे? आइए समझें।
निश्चित रूप से आपने पढ़ा होगा कि जब मुहम्मद सल्‍ल. ने अरब के मक्का नगर में इस्लाम धर्म का प्रचार आरम्भ किया तो मक्का नगर के बडे़-बडे़ सरदार उनके शत्रु हो गए। उन्होंने मुहम्मद सल्ल. को एवं जो भी उनका अनुयाई हो जाता था उसको भाँति-भाँति की यातनाएं देनी आरम्भ कर दी। तीन वर्ष तक तो मुहम्मद सल्‍ल. एवं उनके अनुयाइयों का हर प्रकार से बहिष्कार भी किए रखा, जब मुहम्मद साहब एवं उनके अनुयाइयों को दी जाने वाली यातनाएं, उनकी बर्दाशत से बाहर हो गयीं तो मुहम्मद सा. सल्ल. ने अपने साथियों को मक्का छोड़कर किसी अन्य स्थान पर चले जाने की राय दी। फलस्वरूप उनके करीब सवा सौ अनुयाई अलग-अलग समय में मक्का छोड़कर “ऐथोपिया” चले गए। इसे ही इस्लामी इतिहास में “हिजरत” कहा जाता है, परन्तु जब मक्के वालों ने देखा कि प्रतिदिन लोग मुहम्मद सल्ल. की शिक्षाओं से
प्रभावित होकर इस्लाम धर्म स्वीकार कर रहे हैं तो उन्होंने सुनियोजित तरीक़े से मुहम्मद साहब को जान से मारने का निश्चय किया, एवं रात्रि में उनको पकड़ने के लिए उनके घर को चारों ओर से घेर लिया, तो मुहम्मद सा. सल्ल. ने भी मक्का छोड़कर मदीना चले जाने का निश्चय किया एवं शत्रुओं की निगाहों से बचते हुए रात के अन्धेरे में अपने घर से निकलकर अपने एक अनुयाई को साथ लेकर मक्का छोड़ मदीना आ गए। हिजरत की इसी घटना से इस्लामी सन् ‘‘हिजरी’’ का आरम्भ हुआ। ख़्याल रहे कि मक्के से मदीने की दूरी 433 कि.मी. है। परन्तु जब मक्के वालों ने देखा कि मुहम्मद सा. सल्ल. मदीने में अमन चैन के साथ इस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार कर रहे हैं एवं दिन प्रतिदिन उनके अनुयाइयों की संख्या बढ़ रही है, तो वह आग बगूला हो गए एवं हथियार बन्द लाव लश्कर लेकर मदीने पर आक्रमण करने के लिए निकल पडे़। मुहम्मद सल्ल. ने अपने साथियों के साथ मदीने से बाहर उनका रास्ता रोक लिया, इस समय मुसलमानों की संख्या 313 थी, जिनके पास बहुत कम मात्रा में हथियार एवं सवारी थी। जबकि शत्रु हर पहलू से दोगुनी से अधिक शक्ति रखता था। यहाँ पर घमासान युद्ध हुआ एवं शत्रु सेना के सत्तर व्यक्ति मारे गए।
अब प्रश्न यह है कि मुहम्मद सा. सल्ल. अपना घर बार एवं रिश्तेदारों को छोड़, चार सौ कि.मी. से भी अधिक दूरी पर स्थित मदीना नगर में जाकर रहने लगे थे, परन्तु शत्रु को यह बात भी पसन्द न आयी, एवं वह एक शक्तिशाली फौज लेकर इतनी दूरी पर भी आक्रमण करने के लिए चढ़ आया, तो ऐसी स्थिति में मुहम्मद सा. सल्ल. एवं उनके साथियों ने जो कुछ किया उसे युद्ध कहेंगे या आत्मरक्षा का प्रयास, यह फैसला आपके हाथ है - यहीं पर यह पुष्टि करना भी बेहतर होगा कि जिहाद शब्द का मूल अर्थ भी प्रयास
करना ही है, युद्ध करना बिल्कुल नहीं है जबकि ऐसी कुछ विशेष परिस्थितियां भी आती हैं, जहाँ युद्ध भी करना पड़ता है एवं युद्ध करना ही धर्म हो जाता है। क्या श्री कृष्ण ने वीर अर्जुन को युद्ध करने पर प्रेरित करते हुए यह उपदेश नहीं दिए थे कि, इस समय युद्ध करना ही धर्म है, युद्ध नहीं करोगे तो अधर्म हो जाएगा। जबकि वह अपना अधिकार छोडने को भी तैयार थे।
और दुनिया में कौन सा समाज ऐसा है जो अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए युद्ध करने की अनुमति नहीं देता। स्वयं डा. अनूप गौड़ जी लिखते है-
”हिन्दू इतिहास भी महापुरूषों का इतिहास रहा है। इसमें अधर्म के विरूद्व धर्म की लड़ाई लड़ी जाती थी। ........... स्वयं हिन्दू गौरव को पुनः जागृत करने का सर्वोच्च माध्यम है धर्मयुद्ध, अधर्म के विरूद्ध धर्मयुद्ध करने की परिपाटी बनी रहनी चाहिए।”पेज 35 - 36
लेखक के उक्त विचारों पर कोई टिप्पणी न करते हुए केवल यह कहना प्रयाप्त है कि इसे ही कहते है, ”उलटा चोर कोतवाल को डाँटे“
डा. अनूप गौड़ ने लिखा है -
“मुहम्मद सा. सल्ल. ने स्वयं अपने जीवन काल में 82 युद्ध किए” ।”पेज 33
डा. सा. अगर दस बीस का हवाला भी अंकित कर देते तो हमारे ज्ञान भण्डार में भी वृद्धि हो जाती, क्योंकि उक्त जैसी आत्म रक्षक कार्यवाई को भी अगर वह युद्ध मानते हैं तो भी मुहम्मद सा. सल्ल. के पूरे जीवन काल के इतिहास में इस प्रकार की, बल्कि इससे भी बढ़कर केवल आत्म रक्षक कार्यवाइयों की अधिक से अधिक संख्या तीन हैं। आपकी भाषा में अगर इस प्रकार के आत्मरक्षा के प्रयास, युद्ध हैं, तो उक्त तीन युद्धों के अतिरिक्त शेष दो घटनाएं और हैं परन्तु वे भी केवल आत्मरक्षा के अन्तिम प्रयास थे। वह कैसे? आइए
देखते है। उक्त लड़ाई में जैसा कि बताया गया कि मक्के वालों को अधिक हानि का सामना करना पड़ा था। अतः उसका बदला लेने के लिए वह अगले वर्ष पहले से भी अधिक तैयारी के साथ एवं बड़ी सेना लेकर मदीने पर आक्रमण के लिए निकल पड़े। मुहम्मद सा. सल्ल. को जब इस की सूचना प्राप्त हुई तो उन्होंने अपने साथियों से इस संबंध में परामर्श किया, कि, नगर से बाहर निकलकर आक्रमणकारियों का रास्ता रोका जाए, या नगर में रहकर आत्मरक्षा की जाए,अधिकांश साथियों की राय पर यह निर्णय लिया गया कि नगर से बाहर ही आक्रमण करने वालों का रास्ता रोक लिया जाए। इतिहास में यह बात बहुत स्पष्ट रूप से लिखी गई है कि इस समय पर स्वयं मुहम्मद सल्ल. की राय यह थी कि नगर के भीतर रहकर ही आत्मरक्षा के उपाय किए जाएं, परन्तु अधिकांश व्यक्तियों की सलाह का पालन करते हुए मदीने से करीब डेढ़ कि.मी. बाहर आकर मुहम्मद सा. सल्ल. ने अपने साथियों के साथ मक्के वालों का रास्ता रोक लिया। इस समय भी मक्के वालों से घमासान युद्ध हुआ जिसे इतिहास में “ओहद” की लडाई के नाम से जाना जाता है। इस के आरम्भ में मुसलमानों का पलड़ा भारी रहा। परन्तु अन्तिम चरण में उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा।
ख़्याल रहे कि मक्के वाले चार सौ कि.मी. की लम्बी यात्रा करके मदीने पर आक्रमण करने आए थे और मुहम्मद सा. सल्ल. ने केवल आत्म रक्षा के बेहतर उपाय के तौर पर नगर से बाहर निकलकर उनका रास्ता रोका था। फलस्वरूप युद्ध हुआ, और युद्ध न होता तो क्या आप यह चाहते हैं कि मुहम्मद सल्ल. एवं उनके साथियों को, बावजूद इस के कि वे अपना घरबार छोड़ कर बहुत दूर जा बसे हैं, परन्तु मुख़ालिफ़ लोग हैं कि वहाँ भी चैन से नहीं रहने देते और बार-बार आक्रमण करते हैं, तो क्या ऐसे समय में हाथ पर हाथ रखे घर में पड़ा रहना चाहिए था ?
यह मुहम्मद सल्ल. के जीवन काल का दूसरा युद्ध है, जिसका आपने नेतृत्व किया। आइए अब शेष बचे तीसरे युद्ध पर भी एक नज़र डालें, जिसका इतिहास पढ़कर आपको लगेगा कि वह पहली दोनों घटनाओं से भी अधिक केवल आत्म रक्षा का इंतिहाई और आख़ीरी दर्जे का प्रयास था।
जैसा कि लिखा गया है कि “ओहद” की लड़ाई के अन्तिम चरण में मुसलमानों को हानि उठानी पड़ी थी। अतः इस स्थिति ने मक्के वालों के हौसले बुलन्द कर दिए एवं वह मुहम्मद सल्ल. और उनके साथियों को जड़ से मिटाने के लिए एक बडे़ आक्रमण की तैयारी में लग गए उन्होंने आस-पास के कबीलों एवं सरदारों की सहायता भी प्राप्त की, एवं दो वर्ष की भारी भरकम तैयारी के बाद विभिन्न कबीलों के दस हज़ार सैनानियों की एक विशाल सेना लेकर मदीने पर आक्रमण के लिए चल दिए, मुहम्मद सल्ल. को यह सूचना प्राप्त हुई तो साथियों से परामर्श के उपरान्त यह निर्णय लिया गया कि क्योंकि मदीना शहर तीन ओर से ऊँचे, पहाडों एवं घने बागों से घिरा है और एक दिशा केवल उत्तर की दिशा से ही आक्रमण हो सकता है। अतः इस दिशा में शहर के बाहर एक लम्बी खाई खोद ली जाए। जिसे फाँदकर कोई आसानी से शहर में प्रवेश न कर सके। अतः एक लम्बी और गहरी खाई खोदी गई जिसे खोदने में मुहम्मद सल्ल. स्वयं सम्मिलित हुए। मक्के वालांे की सेना जब यहाँ पहुँची तो उसे मदीने में प्रवेश करने का मार्ग न मिला। फलस्वरूप उसने मदीने से बाहर खाई के पार पड़ाव डाल दिया और मदीनेवासियों पर आक्रमण करने के लिए मदीने में प्रवेश का मार्ग खोजने लगे। दूसरी ओर खाई के तट पर उसकी देख-रेख के लिए मुहम्मद सल्ल. स्वयं अपने साथियों के साथ उपस्थित रहे। मक्के वालों की सेना के एक सरदार ने दिलेरी दिखाते हुए अपना घोड़ा खाई में डालकर आक्रमण करना चाहा परन्तु मुसलमानों के हाथों मारा गया, इसके अतिरिक्त इस पूरी घटना में कोई विशेष झड़प नही हुई न ही किसी पक्ष की विशेष हानि हुई। परिणाम यह हुआ कि प्राकृतिक स्थिति मुसलमानों के हक़ मे थी, क्योंकि वह अपने शहर में थे जबकि शत्रु की सेना अपने शहर एवं घर से बहुत दूर जंगल में पड़ाव डाले हुए थी। दूसरी ओर मौसम, बारिश का था एवं अरब की तेज व तुन्द हवाओं ने स्थिति मक्के वालों के लिए काफी खराब कर दी थी। अंततः मक्के वालों को मदीने का घेराव तोडकर खाली हाथ मक्के लौट जाना पड़ा। इतिहास में इसे “गज़वा-ए-ख़न्दक” के नाम से जाना जाता हैं, क्योंकि ख़न्दक खाई को ही कहते है। यह मुहम्मद सल्ल. के जीवन काल की तीसरी घटना थी, क्या इसे आप युद्ध का नाम देंगे या आत्मरक्षा का अथक प्रयास? निर्णय आपको करना है।
मुनासिब मालूम पड़ता हैं कि मुहम्मद सल्ल. के जीवन काल की उन सभी घटनाओं का वर्णन कर दिया जाए, जिनमें किसी भी प्रकार विपक्ष से आपका सामना हुआ हो, ताकि डा0 गौड़ के द्वारा उन पर बयासी युद्ध करने के आरोप का सत्य सामने आ सके।
हिजरत के छठे साल मुहम्मद सल्ल. ने स्वयं को ख़्वाब में मक्के में स्थित काबे की परिक्रमा(उमरह) करते हुए देखा तो आप अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए अपने साथियों के साथ मक्के की ओर चल दिए, मक्के वालों को जब इस की सूचना प्राप्त हुई तो, उन्होंन मक्के से बाहर निकलकर आपका रास्ता रोक लिया। विगत तीन-तीन बार के मदीने पर किए गए हमलों में पराजय का मुँह देखने के कारण यद्यपि मक्के वालों के हौसले टूट चुके थे एवं इस समय उनको अन्य कबीलों की सहायता भी प्राप्त न थी, दूसरी ओर मुहम्मद सल्ल. के साथ प्राणों की आहुति देने को तत्पर रहने वाले डेढ़ हजार
सुसज्जित साथी सैनानियों का साथ प्राप्त था। अगर वह चाहते तो शक्ति के बल पर मक्के में प्रवेश कर सकते थे परन्तु उन्होंने ऐसा न करते हुए मक्के वालों को कहलवा भेजा कि, मैं युद्ध का कोई इरादा नहीं रखता। मैं तो केवल “उमरह” अदा करने आया हूँ एवं “उमरह” करने के बाद में अपने साथियों सहित मदीने लौट जाऊँगा। परन्तु मक्केवालांे ने उन्हें एवं उनके साथियों को मक्के में प्रवेश की अनुमति न दी। अंततः कुछ बिचैलियों के माध्यम से वह अपनी ओर से अधिकाधिक अनुचित एवं दबावटी शर्तों को प्रस्तुत करते हुए उन्हें मुसलमानों के द्वारा मान लेने की स्थिति में केवल इस बात पर सहमत हुए कि वे इस समय तो खाली हाथ वापस जाएं परन्तु अगले वर्ष आकर “उमरह” कर लें। मुहम्मद सल्ल. ने इसी उपलब्धि के बदले उनके हर प्रकार के उचित-अनुचित प्रतिबन्धों को स्वीकार करते हुए संधि कर ली, केवल अपने लिए इस संधि में एक गारंटी और चाही, वह यह कि मक्के वाले दस वर्षों तक मुसलमानों के ऊपर कोई आक्रमण न करें।
इस संधि को इतिहास में “सुलह हुदैबिया” के नाम से जाना जाता है। आइए देखते हैं कि इस में क्या-क्या तय हुआ था।
(1) मुसलमान इस वर्ष खाली वापस जाएं। अगले वर्ष आकर उमरह करें।
(2) उन्हें मक्के में तीन दिन से अधिक रूकने की अनुमति नहीं होगी।
(3) मक्के में जो मुहम्मद सा0 के अनुयाई हैं उन में से किसी को साथ न ले जा सकेंगे।
(4) अगर मक्के वालों में से कोई व्यक्ति इस्लाम धर्म स्वीकार करके मदीने चला जाए तो उसे मक्के वालों के हवाले करना होगा, जबकि अगर कोई मुसलमान मक्का वापस आ गया तो मक्के वाले उसे वापस न करेंगे।
अगर किसी घटना में इस हद तक दबावटी प्रतिबन्धों के साथ बिना किसी प्रकार की लडाई, झगड़े के संधि कर ली जाए तो क्या आप उसे भी युद्ध कहेंगे? यह निर्णय लेना आपके हाथ है।
इस सन्धि के बाद मुहम्मद सल्ल. मक्केवालों की ओर से संतोष हो गया तो उन्होंने एकान्तीय हृदय से विश्व भर के बडे़-बडे़ राजा महाराजाओं को पत्र लिखकर उन्हे इस्लाम धर्म की दावत दी। जिनमें उस समय के दो बडे साम्राज्यों किसरा (ईरान) एवं कैसर (रोम) आदि को पत्र लिखे एवं अपने प्रतिनिधि मंडल भेजकर उन्हे इस्लाम धर्म स्वीकार करने का संदेश दिया, परन्तु अभी दो ही वर्ष हुए थे कि मक्के वालों ने सन्धि को तोड़ दिया। अतः सन् आठ हिजरी में मुहम्मद सल्ल. अपने अधिकतर अनुयाइयों को साथ लेकर मक्का पहुंचें एवं शहर से बाहर पड़ाव डाल दिया। एक रात्रि का विश्राम करने के बाद अगले दिन मुहम्मद सल्ल. ने अपने दस हजार अनुयाइयों के साथ बिना किसी रूकावट के मक्के में प्रवेश किया।
निःसन्देह आप चौंक गए होंगे कि ऐसी स्थिति में जब मक्के वालों ने मुहम्मद सल्ल. को जान से मार डालने के लिए उनके घर का घेराव कर लिया था, जब इन्हीं मक्के वालों ने उन्हें एवं उनके साथियों को दो-दो बार अपना प्यारा घर बार छोड़ने पर मजबूर किया था एवं यही मक्के वाले थे जिन्होंने चार सौ कि.मी. से भी अधिक दूर मदीने में जाकर पनाह लेने वाले मुहम्मद सल्ल. एवं उनके अनुयाइयों पर तीन-तीन भयानक आक्रमण किए थे।
अब जबकि अपने दस हजार अनुयाइयों के साथ मुहम्मद सा0 ने मक्के में प्रवेश करके अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया ऐसे समय में मुहम्मद सल्ल. ने मक्के वालों के साथ क्या व्यवहार किया होगा? मगर चैंकिये मत, किसी ने भी किसी पर हाथ नहीं उठाया बल्कि सार्वजनिक क्षमा का एलान कर दिया गया एवं घोषणा की गयी कि जो अपने घर का द्वार बन्द कर लेगा उसको शरण होगी, जो काबा क्षेत्र में चला जाएगा उसको भी शरण होगी, यहाँ तक कि “अबूसुफ़ियान” जिन्होंने अधिकांश युद्धों में शत्रु सेना का नेतृत्व किया था यह घोषणा की गई कि जो उनके मकान में प्रवेश कर लेगा उसे भी शरण होगी।
क्या विश्व का इतिहास कोई एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है, जिसमें शत्रु सेना के कमान्डर को यह सम्मान दिया गया हो कि जो उसके घर में घुस जाए उसे कुछ नहीं कहा जाएगा। इस घटना को इतिहास में “फ़तह मक्का” के नाम से जाना जाता है।
मक्का फतह हो गया तो मक्के की पूर्वी दिशा में रहने वाले ‘हवाज़िन’ एवं ‘सक़ीफ़’ नामक दो क़बीले व्याकुल हो उठे एवं युद्ध करने को तैयार हो गए, उन्होनें मुसलमानों पर तीरंदाज़ी शुरू कर दी। मुहम्मद सल्ल. भी अपने अनुयाइयों के साथ उनका मुकाबला करने को तैयार थे मुसलमानों को सामने डटा देख यह कबीले मैदान छोड़कर भाग गए एवं ”ताइफ़“ नगर में जा छिपे, मुहम्मद सा0सल्ल0 ने आगे बढ़कर ”ताइफ़“ का घेराव कर लिया परन्तु वह यहाँ से निकलकर ‘अवतास’ की गुफाओं में जा छिपे तो मुहम्मद सल्ल. घेराव तोड़कर मदीने वापस आ गए। इस घटना को इतिहास में “हुनैन” के नाम से जाना जाता है।
मुहम्मद सल्ल. के पूरे जीवन काल में इस प्रकार की सभी घटनाओं में से केवल तीन का वर्णन शेष रह गया है। इन घटनाओं को इतिहास में “गज़वा-ए-तबूक”, “खैबर” और “मौता” के नाम से जाना जाता है। इन घटनाओं का वर्णन अलग से करने का कारण यह है कि इन में स्वयं मुहम्मद सल्‍ल. अपनी ओर से अपने अनुयाइयों की सेना लेकर मदीने से निकले थे या आपने सेना भेजी थी।

तबूकः---
पहली घटना जो “सफर-ए-तबूक” के नाम से प्रसिद्ध है वह सन नौ हिजरी की है।
हिजरत के नौवें वर्ष यह सूचना मिली कि रोम का सम्राट अरब पर भारी आक्रमण की तैयारी कर रहा हैं और उसने इस के लिए अपनी सेना को एडवांस वेतन का भुगतान भी कर दिया है। सीरिया से आने वाले कुछ व्यापारियों ने भी इस सूचना की पुष्टि कर दी, तो मुहम्मद सल्ल. ने अरब क्षेत्र के तट पर ही इस आक्रमण को रोकने का निर्णय लिया, एवं एक विशाल सेना लेकर तबूक नामक स्थान पर जा पहुँचे तथा वहाँ बीस दिन तक ठहरे रहे, रोम का सम्राट मुसलमानों की मुस्तैदी देखकर घबरा गया और उसने आक्रमण करने का अपना ख़्याल त्याग दिया। अतः बिना किसी युद्ध के मुहम्मद सल्ल. अपने साथियों के साथ मदीने वापस आ गए।

ख़ैबरः-
सन् छः हिजरी में मक्के वालों के साथ संधि होने पर उनकी ओर से चैन मिला तो मदीने के आस-पास रहने वाले यहूदी विभिन्न प्रकार की बाधाएँ उत्पन्न करने लगे। मदीने के उत्तर में “ख़ैबर” नाम की एक बस्ती थी, जहाँ पर यहूदी आबाद थे। वह यहां से मुसलमानों के ख़िलाफ़ तरह-तरह की साजिशें, जोड़, तोड़ एवं शरारतें करते रहते थे। उनकी शरारातों से छुटकारा पाने के लिए सन् 7 हिजरी में मुहम्मद सल्ल. अपने सोलह सौ अनुयाइयों को साथ लेकर “खैबर” पहुँचे। यहूदियों ने यह देखा तो “ख़ैबर” के किले का दरवाजा बन्द कर लिया मुहम्मद सा0 सल0 के एक अनुयाई हज़रत अली ने आगे बढ़कर दरवाज़ा उखाड़ फेंका, यहूदियों से छुट-पुट झड़प भी हुई जिसमें उनका एक सरदार ”मुरहिब” हज़रत अली के हाथों मारा गया। अंततः यहूदी अपनी पराजय को स्वीकार करते हुए “खैबर” को छोड़कर जाने लगे। मुसलमानांे ने, न तो उनका पीछा किया एवं न ही उन्हें जाने से रोका, अपितु जितना भी साज़-ओ-सामान वह ले जा सकते थे। उन्हें ले जाने दिया।
उक्त प्रकार की घटनाओं को सामने रखकर ही डा0 अनूप गौड़ ने अपनी पुस्तिका में लिखा है-
”मदीने में से यहूदियों का सर्वनाश या पूरी तरह उनको देश से निकाल बाहर करने का कार्य स्वयं मुहमम्द सा. सल्ल. ने किया।” पृष्ठ - 33
वास्तविकता यह है कि यहूदियों को किसी ने निकाला नहीं था, अपितु अपने लिए स्थिति अनुकूल न समझते हुए वे पहले मदीने से निकलकर ख़ैबर में एकत्र हुए एवं फिर ख़ैबर को भी छोड़कर चले गए। इस को समझने के लिए आप को यह जानना होगा कि अरब के निवासियों का जीवन कबीलाई था, एवं वह भिन्न-भिन्न कबीलों में बटे हुए थे, जो आवश्यकतानुसार एक स्थान छोड़कर दूसरे स्थान पर चले जाते थे। यही कारण है कि इन कबीलांे पर किसी की हुकूमत नहीं चलती थी। बल्कि उनका सरदार ही उनका राजा या हाकिम होता था। अतः एक स्थान छोड़कर दूसरे स्थान पर चले जाने का उनके यहाँ कोई महत्तव नहीं था।

मौताः----
जैसा कि ऊपर लिखा गया है कि मक्के वालों से संधि हो जाने के उपरान्त मुहम्मद सा. सल्ल. ने विश्वभर के राजा महाराजाओं को पत्र लिखे थे, ऐसा ही एक पत्र लेकर सीरिया के राजा के पास उनके एक साथी “हज़रत हारिस बिन उमेर” गए थे। सीरिया के राजा ने क्रोध में आकर “हज़रत हारिस” का वध कर दिया। किसी दूत का वध कर देना अन्तर्राष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लंघन था, अतः उस को दण्ड देने के लिए मुहम्मद सा. सल्ल. ने एक सेना सीरिया भेजी, इस में तीन हजार सैनानी थे एवं सेनापति हज़रत जै़द बिन हारिस को बनाया गया था। स्वयं मुहम्मद सा. सल्ल. इसमें सम्मिलित न हुए थे, सीरिया के राजा ने रोम के महाराजा की सहायता से एक लाख की सेना को रणक्षेत्र में उतारा। मौता नामक स्थान पर दोनों सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में मुसलमान फौज के लगातार तीन सेनापति वीरगति को प्राप्त हुए। उसके बाद “ख़ालिद बिन वलीद” को सेनापति बनाया गया, उन्होंने शत्रु की सेना पर आक्रमण कर ”रोम” की सेना को पराजित कर दिया, अंततः ”सीरिया” एवं ”रोम” की संयुक्त सेना मैदान छोड़कर भाग गई और मुसलमान वापस मदीने आ गए।
हमने मुहम्मद सा. सल्ल. के कुल जीवन काल की उन सभी घटनाओं का वर्णन कर दिया हैं, जिनको लेकर डा. अनूप गौड़ ने मुहम्मद सा. सल्ल. के ऊपर युद्ध करने का आरोप लगाया है, और “इस्लाम धर्म” पर आरोप लगया है कि, उसकी उपज ख़ून की टपकती धारा पर हुई है। (पेज 67)
युद्ध करने का इल्ज़ाम लगाते हुए वह यहाँ तक लिख गए हैं कि -
“मुहम्मद सल्ल. ने स्वयं अपने जीवन में 82 युद्ध किए हैं।”पृष्ठ - 33
उक्त सभी घटनाओं को हम संयुक्त रूप से आपके सामने रखते हैं ताकि यह बात स्पष्ट हो सके कि मुहम्मद सा. सल्ल. ने कितने एवं किस प्रकार के युद्ध किए हैं
1.बद्र
कबः हिजरत के दूसरे वर्ष मक्के वालों का मदीने पर पहला आक्रमण
कहाँ: मदीने से बाहर बद्र नामक स्थान
परिणामः मक्के वालों के सत्तर लोग युद्ध में मारे गए। एवं चौदह मुसलमान शहीद हुए।

2. ओहद
कबः हिजरत के तीसरे वर्ष मक्के वालों का मदीने पर दूसरा आक्रमण
कहाँ: मदीने के पास ओहद नामक पहाड़ी के नीचे
परिणामः कई मुसलमान शहीद हुए

3. खन्दक
कबः हिजरत के चौथे साल मक्के वालों का मदीने पर तीसरा आक्रमण
कहाँ: मदीने के द्वार पर खाई खोदी गई
परिणामः शत्रु की फौज खाई पार न कर सकी अतः खोदी गई कोई युद्ध नहीं हुआ।

4. सुलह हुदैबिया
कबः हिजरत के छठे साल मु. सल्‍ल. उमरा करने हेतु मक्के में प्रवेश करना मक्के वालो ने मक्के से बाहर रोक दिया
कहाँ: मक्के से बहार “हुदैबिया'' नामक स्थान पर
परिणामः कोई युद्ध नही हुआ एवं दोनों पक्षों में संधि हो गई।

5. फ़तह मक्‍काः
कबः हिजरत के आठवे साल जब मक्के वालों ने संधि को तोड़ दिया।
कहाँ: मक्का
परिणामः कोई युद्ध नहीं हुआ न ही जान व माल की कोई हानि हुई।

6. ख़ैबर
कबः हिजरत सातवां साल
कहाँ: मदीने के पास की खैबर नामक बस्ती में
परिणामः बहुत मामूली झड़प हुई जिसमें एक यहूदी मारा गया

7. मौता
कबः हिजरत सातवां साल
कहाँ: जार्डन का पश्चिमी तट
परिणामः घमासान युद्ध हुआ घमासान युद्ध हुआ कई मुस्लिम सिपाही शहीद हुए

8. हुनैन
कबः हिजरत का नौवाँ साल
कहाँ: मक्के के पूर्वी ओर से मुसलमानों पर तीरंदाजी
परिणामः मुस्लमानों को सामने डटा देख शत्रु मैदान छोड़ कर भाग गया

9. तबूक
कबः हिजरत का आठवाँ साल
कहाँ: अरब का उत्तरी तट कोई युद्ध नहीं हुआ।

सन् दस हिजरी में मुहम्मद सा. सल्ल. ने “हज“ अदा किया एवं “हज“ करने के बाद आप केवल दो महीने इक्कीस दिन के बाद इस संसार से परलोक सिधार गए। अतः आपके पूरे जीवन काल में उक्त वर्णित घटनाओं के अतिरिक्त कोई एक भी ऐसी घटना नही हुई जिसमें किसी प्रकार की कहा सुनी भी हुई हो। आइए अब यह भी
देखें कि उक्त नौ घटनाओं मे से युद्ध कितने है।
जैसा कि ज्ञात है कि “गज़वा-ए-खंदक”, “सुलह, हुदैबिया” “तबूक एवं फ़तह मक्का” में तनिक भी युद्ध नहीं हुआ। और ख़ैबर व हुनैन में मामूली व इस प्रकार की झड़प हुई कि उसे युद्ध नहीं कहा जा सकता। अतः निश्चित रूप से यह स्पष्ट हो जाता है कि मुहम्मद सल्ल. के पूरे जीवन काल में युद्ध की केवल तीन घटनाएँ हुई, इनमें आपकी ओर से युद्ध आरम्भ नही किया गया, बल्कि आत्मरक्षा करने हेतु मजबूरन आपको युद्व करना पड़ा। अतः यह कह देना कि स्वयं मुहम्मद सल्ल. ने अपने जीवनकाल में 82 युद्ध किए तथ्यों के ख़िलाफ़ और सरासर झूठ है।
मुहम्मद साहब के समय में जो तीन युद्ध हुए उनमें “जंग-ए-बदर” और मौता इन दोनों में जान व माल की अधिक हानि हुई परंतु किसी में भी 100 से अधिक व्यक्ति नहीं मारे गए, और धन की कोई ऐसी हानि नहीं हुई जो किसी राष्ट्र या कौम/कबीले को प्रभावित कर सके, जहाँ तक समय की बात है अगर उक्त प्रकार के सभी युद्धों में लगे समय को जोड़ लिया जाए तो उसकी कुल अवधि दो दिन से भी कम होती है।
इसका आंकलन अगर हिन्दू धर्म युद्धों में हुई जान व माल व समय की हानि से करें तो बहुत विपरित आंकड़े प्राप्त होते हैं क्योंकि उनमें हुई जान व माल की हानि से संबंधित कोई संख्या करोड़ों से कम नहीं, महाभारत के अनुसार इस लड़ाई में एक अरब छियासठ करोड़ व्यक्ति मारे गये थे ।
“गीता हक़ीक़त के आइने में”पृ.24, लेखक वी.आर.नारला, प्रकाशित यूनीवर्सल पीस फाउन्डेशन, देहली
वह तीन घटनाएँ जिन में युद्ध की स्थिति उत्त्पन्न हुई वह ”जंग-ए-बद्र“, ”जंग-ए-ओहद“, और ”जंग-ए-मौता“ हैं।
पहली दो घटनाएँ उस समय की हैं जब मुहम्मद सल्ल. के मक्का छोड़कर मदीना आ जाने के उपरांत मक्केवालों ने भारी सेना द्वारा मदीने पर चढ़ाई कर दी। ऐसी स्थिति में जब शत्रु आपको नष्ट कर देने के तत्पर हो और बावजूद इस के कि आप उस से बचकर बहुत दूर जाकर रहने लगें, परन्तु वह फिर भी आपका पीछा न छोड़े और विशाल सेना लेकर आपको एवं आपके साथियों को मार डालने के लिए वहीं चढ़ आए। ऐसे समय मे दो प्रकार की स्थितियों का ही सामना होता है। या तो आप हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाएं और शत्रुओं के द्वारा गाजर, मूली की तरह काट दिए जाएं और सदैव के लिए नष्ट कर दिए जाएं। या यह है कि स्वयं की रक्षा के लिए हर सम्भव प्रयास किए जाएं।
इस संसार में कौन सा राष्ट्र या समाज ऐसा है जो उक्त जैसी स्थिति में आत्म रक्षा के लिए हर सम्भव प्रयास करने या आवश्यकता पड़ने पर हथियार उठाने की अनुमति नहीं देता ?
जहाँ तक पहली स्थिति की बात है इस्लाम में अपने ऊपर हमले की स्थिति में आत्मरक्षा के उपायों को अपनाए बिना हाथ पर हाथ रख कर मारा जाना आत्मदाह की भाँति माना जाता है, जिसकी अनुमति नहीं है। ऐसी स्थिति में स्पष्ट निर्देश हैं -
1. हे, नबी इन्कार करने वालों और हृदय में द्वेष रखने वालों के साथ जिहाद करो एवं उनके संग कठोरता से पेश आओ उनका ठिकाना नरक है और वह बहुत बुरा ठिकाना है। सूरह तौबह आयत 73

2. क्या तुम नही लड़ोंगे ऐसे लोगों से जिन्होंने संधि को तोड़ा है और मुहम्मद सल्‍ल. को निकाल बाहर करने के तत्पर रहे। क्या तुम उनसे डरते हो, अगर तुम ईमान रखते हो तो ईश्वर इस बात के ज्य़ादा योग्य है कि तुम उससे डरो। लड़ो उनसे ईश्वर तुम्हारे हाथों द्वारा उनको दण्ड दिलवाएगा। उन्हे ज़लील करेगा। एवं तुम्हारी सहायता करेगा। सूरह तौबह आयत 13-14
3. हे नबी ईमान वालों को युद्ध करने के लिए आमादा करो यदि तुम में से बीस भी डटे रहने वाले होंगे तो वह 200 पर प्रभुत्व प्राप्त करेंगे। यदि सौ ऐसे होंगे तो वह 1000 पर भारी रहेंगे। सूरह अनफाल, आयत 65

कुरआन की आयतों पर प्रश्न चिन्ह
डा. अनूप गौड़ उक्त आयतों एवं ऐसी ही कुछ अन्य आयतों का वर्णन करने के उपरांत लिखते है-
“इसी प्रकार की सैकड़ों “आयतें” क़ुरआन में स्पष्ट निर्देश करती है। उपरोक्त आयतों से स्पष्ट है कि इनमें ईष्र्या, द्वेष, घृणा, छल, कपट, लड़ाई, झगड़ा और हत्या करने के आदेश मिलते है।” पृष्ट - 71
परन्तु डा. गौड़ को यह कौन बतलाए कि उक्त प्रकार की आयतें बद्र और ओहद जैसी विशेष परिस्थितियों में उतरी हैं। जब मक्के वाले मुहम्मद सल्ल. और उनके अनुयाइयों को नष्ट करने के इरादे से मदीने पर चढ़ आए थे। ख़्याल रहे कि कुरआन पूरा एक समय में नहीं उतारा गया है, बल्कि आवश्यकतानुसार समय-समय पर देवदूत (हज़रत-ए-जिबरील) ईश्वर की ओर से एक आयत, दो आयतें या अधिक, जैसी भी ज़रूरत होती थी लाकर मुहम्मद सल्ल. को सुना देते थे वह सुनकर उसे याद करते एवं किसी लिखने वाले को बुलाकर उसे लिखवा लेते थे। और अपने अनुयाइयों को सुना देते थे। इस प्रकार पूरा कुरआन तेईस वर्ष में उतारा गया है।
यह थी ईश्वरवाणी (पवित्र कुरआन) के अवतरण की स्थिति। अब प्रश्न यह है कि ऐसी स्थिति में जब मुहम्मद सल्ल. अपना वतन एवं घरबार छोड़ कर मक्के से मदीने चले आए थे। परन्तु मक्के वालों ने वहाँ पर भी चढ़ाई कर दी, तो क्या ऐसे समय में उन्हे गले लगाने के उपदेश दिए जाते। यहाँ पर एक बार फिर भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उस उपदेश का वर्णन करना उचित होगा जो उन्होंने कौरवों और पाण्डवों के बीच हुए “महाभारत युद्ध” के समय अर्जुन को युद्ध पर उभारने हेतु दिया था कि इस समय युद्ध करना ही धर्म है। युद्ध नहीं करोगे तो अधर्म हो जाएगा। अतः यह मानना पड़ेगा कि ऐसी परिस्थितियां भी उत्पन्न होती हैं, जब युद्ध करना भी अनिवार्य हो जाता है, और उस समय युद्ध करना ही धर्म का हिस्सा होता है।
उक्त में क़ुरआन की जो आयतें दी गई हैं उनकी शब्दावली से यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि युद्ध करने की अनुमति देने वाली आयतें विशेष समय का विशेष उपदेश हैं। जैसा कि ज्ञात है कि बद्र एवं ओहद के युद्धों में आक्रमणकारियों की संख्या मुसलमानों से कई गुना अधिक थी, अतः उनकी ढारस बंधाते हुए कहा गया कि तुम्हारे बीस व्यक्ति भी उनके दो सौ पर भारी होंगे क्योंकि ईश्वर तुम्हारी सहायता करेगा।
नं0 2 पर अंकित आयत को देखें, संधि को किसने तोड़ा था?
एवं मुहम्मद सल्ल. को किसने घर से बाहर निकाला था? अब वह ही लड़ मरने के लिए आ चढे़ हैं, तो कुरआन की इस आयत में उन्हीं से तो लड़ने की बात की जा रही है।
युद्ध संबंधी आयतों की पृष्ठभूमि जाने बगैर ही प्रश्न चिन्ह लगा देना उचित नहीं है। केवल डा0 गौड़ की ही बात नहीं कुछ अन्य ज़िम्मेदार व्यक्तियों की ओर से भी इन आयतों पर युद्ध की प्ररेणा देने का इल्ज़ाम लगाया जाता रहा है।
80 के दशक में किसी चोपडा नामी व्यक्ति ने मुम्बई हाई कोर्ट में कु़रआन से इन आयतों को निकलवाने के लिए याचिका दायर कि थी। दिनांक 8, 9 मई 2007 को “विश्व युवा केन्द्र“ दिल्ली में आयोजित सभा को संबोधित करते हुए आर.एस.एस. के निवर्तमान सर संचालक के.सी. सुर्दशन ने इसी प्रकार की आयतों की ओर संकेत करते हुए कहा था की हिन्दू धर्मावलंबी अपनी धार्मिक पुस्तकों से विवादित मंत्रों एवं श्लोकों को निकालने के लिए तैयार हैं तो मुसलमान ऐसी आयतों को कु़रआन से क्यों नहीं निकाल सकते हैं जिनसे आतंकवाद की सीख मिलती है।
परन्तु किसी भी प्रकार यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि क़ुरआन के किसी एक अक्षर से भी छल, कपट, लड़ाई झगड़ा या किसी की बेवजह हत्या करने की सीख मिलती हो। किन्तु ऐसा भी नहीं, कि अपने ऊपर हमला होते हुए भी वह अपने अनुयाइयों को हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाने की अनुमति देता हो। विशेष परिस्थितियों में युद्ध की अनुमति दी गई है, परन्तु यह भी नसीहत है। “और सुलह करना (लडा़ई-झगड़े) से बेहतर है। ”सूरह निसा, आयत 128
और एक दुसरे स्थान पर कहा गया है - और अगर शत्रु (युद्ध के बीच) सुलह करना चाहे तो तुम सुलह कर लो और ईश्वर पर भरोसा करो, वह सबकुछ सुनता और जानता है, यहाँ तक की उनका इरादा धोखे का भी हो, (तो तुम परवाह न करो) तुम्हारे लिए ईश्वर काफी है। ससूरह अनफाल आयत नं. 61, 62सूरह अनफाल आयत नं. 61, 62
परन्तु फिर भी अगर सुलह नही हो पाती और युद्ध की ही स्थिति उत्पन्न होती है तो उसके लिए क्या क्या शर्ते हैं। उन्हे बडी़ धार्मिक पुस्तकों में देखा जा सकता है जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं।
1. महिला बच्चों एवं बूढ़ों का वध न किया जाए।
2. फलदार वृक्षों को न काटा जाए खेती को न उजाड़ा जाए।
3. धर्मस्थलों में रहने वाले धार्मिक गुरूओं को न छेड़ा जाए।
4. खेती की भूमि को एवं खेती को बर्बाद न किया जाए, फल एवं छायादार वृक्ष ना काटा जाए, जानवरों को न मारा जाए, आदि।
युद्ध क्षेत्र में महिला, बच्चे या बूढ़े क्या करते है? स्पष्ट है कि वह युद्ध करने वालों की सहायता के लिए होते हैं, परन्तु जिस धर्म में युद्ध क्षेत्र में भी बच्चों बूढ़ों एवं महिलाओं का वध करना जायज़ न हो, तो क्या वह धर्म ट्रेन में यात्रा करते बेक़सूर स्त्रियों-पुरूषों बूढ़ों एवं बच्चों को बम से उड़ा देने, या मन्दिर मस्जिद में पूजा-अर्चना करने आए श्रद्धालुओं की धोख़े से हत्या कर देने की अनुमति दे सकता है? या आत्मघाती हमला करके निर्दोर्षों को मारने की अनुमति दे सकता है? ख़्याल रहे कि आत्म हत्या की स्वयं इस्लाम धर्म में कोई गुंजाइश नही है। उक्त प्रकार के जैसे कार्य करके अगर कोई उन्हें धर्म से जोड़ता है तो वह धार्मिक नहीं हो सकता अपितु वह धर्मविरोधी है। फिर क्या वजह है कि इस प्रकार की आतंकवादी घटनाओं का ज़िम्मा केवल मुसलमानों के सर डालकर उनके तार इस्लाम से जोड़ दिए जाते हैं, जब कि कुरआन में उक्त प्रकार की आतंकवादी घटनाओं को पृथ्वी पर फ़साद बरपा करने की संज्ञा दी गई हैं। एवं फसाद बरपा करने वालों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा गया है -
और जो लोग पृथ्वी पर फ़साद बरपा करते है। उनपर लानत है एवं उनके लिए बुरा ठिकाना (नरक) है। सूरह, रअद - 13, आयत - 24
ऐसा भी नहीं कि इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम देने वाले केवल मुसलमान ही हों। श्रीलंका में तमिलों की बग़ावत, भारत में नक्सलवाद एवं आसाम सहित पूर्वी प्रान्तों में घटने वाली आतंकी घटनाओं में कोई मुसलमान लिप्त नहीं है, परन्तु इन्हें कोई हिन्दू आतंकवाद नहीं कहता।
विश्व भर में विभिन्न स्थानों पर पृथकतावादी आन्दोलन चल रहे हैं इन में कुछ पृथक्तावादी मुस्लिम भी हैं। जैसा कि हमारे देश में कश्मीर की समस्या। परन्तु कश्मीर में अलगावादी संगठन मुसलमान हैं तो इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं कि उनका यह आन्दोलन इस्लामी आन्दोलन है। यह कश्मीरियों का अपना सियासी आन्दोलन हो सकता है धर्म से इसका कोई संबंध नहीं, न ही उनके द्वारा की गई आतंकी कार्यवाई को किसी प्रकार जायज़ ठहराया जा सकता है।
आजकल आत्मघाती हमलों की बड़ी चर्चा है इस प्रकार के हमले “तमिल टाइगर्स“ ने आरम्भ किए थे वर्तमान समय में इराक एवं फलस्तीन में इस प्रकार के हमले अधिक हो रहे हैं। ऐसे हमलों की इस्लाम धर्म में बिल्कुल अनुमति नहीं है। स्वयं आत्महत्या करना इस्लाम धर्म के अनुसार बहुत बड़ा अपराध एवं गुनाह है जो धर्मानुसार हराम और नाजायज़ है, तो फिर आत्महत्या करके दूसरे बेगुनाह व्यक्तियों का वध करने की कैसे अनुमति दी जा सकती है?
दुनिया में जहाँ-जहाँ पर भी पृथकतावाद के सियासी आन्दोलन में मुसलमान सम्मिलित हैं वह सियासी स्वार्थ प्राप्त करने के लिए आतंकवादी हमलों को धर्म से जोड़ते हुए उन्हें जिहाद की संज्ञा देते हैं जब कि कुरआन एंव इस्लाम धर्म की परिभाषा में यह घटनाएँ केवल फ़साद हो सकती हैं जिहाद का इनसे कोई संबंध नहीं है।

जिहाद या फ़साद
वर्तमान में जिहाद के नाम पर लोगों ने इस्लाम को जी भर के बदनाम किया है। इनमें वह मुस्लिम संगठन भी शामिल हैं जो अपने राजनितिक स्वार्थों की प्राप्ति के लिए अपनी सियासी लड़ाई को जिहाद की संज्ञा देते हैं जब कि मुस्लिम विद्वानों, धार्मिक नेताओं एवं इस्लामिक संस्थाआओं ने कभी भी इन राजनितिक गतिविधियों को न तो “जिहाद“ माना है न ही उनका समर्थन किया है, फिर भी न जाने क्यों डा0 श्री अनूप गौड़ एवं उन जैसे कुछ अन्य व्यक्ति भी “जिहाद“ के बारे में बहुत ही गलत धारणा स्थापित कर बैठे हैं। डा0 गौड़ लिखते है -
‘‘जिहाद अर्थात ख़ूनी आन्दोलन का इस्लाम में सर्वाधिक महत्व है।” पृष्ठ - 33
इसी प्रकार हिन्दी के विख्यात लेखक डा0 हृदय नारायण दीक्षित ने अपने एक लेख में लिखा था -
‘‘जिहाद एक अंतर्राष्ट्रीय धारणा है यह संसार को दो भागो में बाँटती है। एक “दारूल हरब” जहाँ “इस्लाम” का राज्य नहीं है, दूसरा “दारूल इस्लाम“ जहाँ इस्लाम का राज्य हैं। “जिहाद“ इन दोनों के बीच निरन्तर युद्ध की स्थिति है, जिसका अंत तभी होगा जब काफिरों पर मुसलमानों को पूर्ण रूपेण प्रभुत्व मिलेगा।’’ दैनिक जागरण (23-9-2001, विशेष परिशिष्ट)
हरिद्वार से प्रकाशित दैनिक बद्री विशाल 4 मई 2002 के अंक में लेखक “निरंजन वर्मा” अपने लेख “भारत पाक युद्ध” में लिखते है -
‘‘मुसलमानों की इस विषय में यह धारणा है कि येनकेन प्रकारेण मुस्लिम अधिपत्य वाले “दारूल इस्लाम“ को आगे बढ़ाकर “दारूल हरब“ अर्थात गैर मुस्लिम प्रधान क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया जाए। हिंसा, लूट-पाट और आक्रमणों द्वारा दारूल हरब इलाके को वशीभूत करने के प्रयासांे को जिहाद कहते हैं।“ (बद्री विशाल 4-5-2002) (बद्री विशाल 4-5-2002)
कहा जाता है कि मारने वाले के हाथ पकडे़ जा सकते हैं, कहने वाले की ज़ुबान नहीं। उक्त अंकित पंक्तियाँ “डा0 गौड़” ”निरंजन वर्मा“ और ”हृदय नारायण दीक्षित“ की हैं, इस्लाम का उनसे कोई संबंध नहीं अगर ये विद्वानगण यह व्याख्या भी कर देते कि उन्होंने उक्त विचार कहाँ से लिए हैं तो उस पर कुछ बात की जाती, परन्तु ऐसा नहीं है। इस्लाम धर्म में हिंसा लूटपाट एवं आक्रमण की न तो अनुमति है और न ही गैर मुस्लिम प्रधान क्षेत्र पर क़ब्ज़ा करने का अधिकार वाली कोई बात। दैनिक जागरण (23-9-2001, विशेष परिशिष्ट)
वास्तव में इसे ही कहते हैं कि झूठ इतना बोलो कि वह सच लगने लगे। परन्तु “दीक्षित जी”, “निरंजन वर्मा” एवं “गौड़“ जैसे गणमान्य व्यक्तियों से यह उम्मीद कैसे की जाए कि उन्होंने झूठ ही यह बातंे लिखी हैं, अगर ऐसा नहीं तो मानना होगा कि निश्चित रूप से वह किसी भी प्रकार मिसगाइडेन्स के शिकार हुए हैं।
हो सकता है कि भारत में तुर्कों एवं मुगलों के आक्रमणों से उन्होंने उक्त प्रकार की राय क़ायम कर ली हो। ख़्याल रहे कि मुगलों एवं तुर्कों के द्वारा भारत में जो आक्रमण किए गए, इस्लाम का उनसे कोई सम्बन्ध नहीं था। वास्तविकता यह है कि मध्यकालीन युग के राजा, महाराजा अपने साम्राज्य के विस्तार की ख़ातिर इस प्रकार के आक्रमण करते रहते थे।
प्राचीनकाल में यूनान के महाराजा “सिकन्दर” ने पूरे मध्य एशिया एवं भारत पर आक्रमण कर उन पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था या “अशोक महान” ने अनेक क्षेत्रों पर आक्रमण करके उन्हें अपने अधीन कर लिया था, तो क्या यह कहा जाएगा कि यही उनके धर्म की शिक्षा थी? एक समय में मंगोलिया से उठने वाले मुगलों ने पूरे मध्य एशिया में उत्पात मचाया, उस समय वह मुसलमान नहीं थे। उन्होंने मुस्लिम साम्राज्य की राजधानी “बगदाद“ में खून की नदियाँ बहा दीं। यहाँ तक कि मुगल सम्राट हलाकू ने “बगदाद“ में मनुष्यों की खोपड़ियों से एक बडे़ स्तूप का निर्माण कराया। उनकी इस बर्बरता का शिकार होने वाले तो मुस्लिम थे, तो क्या उनके इस आक्रमण को उनके धर्म से जोड़ दिया जाए?
भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम मुगल शासक तैमूर लंग था परन्तु उस समय संयुक्त रूप से मुगलों ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। लेकिन उनकी शिक्षा दीक्षा इस्लामिक सिद्धांतों से नहीं बल्कि मंगोली एवं चंगे़जी सिद्धांतों से हुई थी, एवं उनकी कार्यशैली उसी के अनुरूप थी। “बाबर“ जब भारत आया तो वह “मदिरा“ का सेवन करता था। जबकि “इस्लाम“ धर्म में “मदिरा“ का सेवन हराम है। अब यह निर्णय आप स्वयं करें कि क्या उक्त प्रकार के शासकों द्वारा किए गए आक्रमणों को धर्म से जोड़ा जा सकता है ?

जिहाद
“जिहाद“ के बारे में आजकल बहुत भ्रांतियाँ फैली हुई हैं। कुछ अपनों ने और कुछ गैरों ने “जिहाद“ को इस प्रकार प्रस्तुत किया है मानो वह लड़ने झगड़ने, मारने मरने का नाम है जब कि ऐसा नहीं है। “जिहाद“ अरबी भाषा का शब्द है जिसका मूल अर्थ है “प्रयास करना” “जद्दो जहद करना” और “संघर्ष” करना। ख़्याल रहे कि अरबी भाषा में युद्ध करने के लिए “क़िताल” शब्द बोला जाता है न कि जिहाद।
इस्तिलाही मायनों में “जिहाद“ शब्द अलग-अलग स्थान पर अलग मायनों में प्रयोग हुआ है, कहीं अपने नफ़्स (अन्तरात्मा या इन्द्रियों) से संघर्ष करने को “जिहाद“ कहा गया है, कहीं माँ-बाप की सेवा करने को “जिहाद“ कहां गया है, और कहीं ज़ालिम राजा के सामने हक़ बात कहने को “जिहाद“ कहा गया है, परन्तु इस्तिलाह में जिहाद अपने मूल अधिकारों की प्राप्ति के लिए हर सम्भव एवं उचित प्रयास करने को भी कहते हैं। उस में युद्ध की स्थिति केवल इसी प्रकार उत्पन्न हो सकती है जैसे मदीने में मुहम्मद साहब एवं उनके अनुयाइयों के सामने युद्ध करने के अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था, परन्तु ऐसी स्थिति में भी युद्ध की अनुमति केवल स्थापित राज्य को ही प्राप्त है, प्रजा को राज्य के मुक़ाबले हथियार उठाने की कदापि अनुमति नहीं है, चाहे राजा ज़ालिम ही क्यों न हो। विस्तार से जानने के लिये ''फिक़ह'' की बड़ी पुस्तकों का अध्ययन करें। जहाँ आपको यह बात बहुत ही स्पष्ट रूप से मिलेगी कि स्थापित राज्य के मुकाबले में उसकी प्रजा का हथियार उठाना हराम है। ऐसे ही यह भी कि अगर प्रजा में से कोई व्यक्ति अपने समाज में किसी को कोई बुराई करते देखे तो उसे केवल ज़ुबान से शान्तिपूर्ण तरीक़े से रोका जा सकता है। क़ानून को अपने हाथ में लेने या उसके विरूद्ध हथियार उठाने की अनुमति नहीं है।
प्रसिद्ध पुस्तक “फिकहुल सुन्नह” की यह इबारत देखें -
(अरबी से अनुवाद)
‘‘और तीसरी किस्म फर्ज़-ए-क़िफ़ाया की वह है जिस में राजा का होना अनिवार्य है जैसे जिहाद एवं दण्ड देना।’’ फिकहुल सुन्नह बाब 3 पृष्ठ 20फकहुल सुन्नह बाब 3 पृष्ठ 20
अतः अगर कुछ विद्रोही कोई दुर्घटना करके उसे जिहाद का नाम देते हैं, तो केवल उनके कहने से वह धार्मिक जिहाद नहीं हो जाएगा। यही कारण है कि उक्त प्रकार की कार्यवाई करने वालों को कभी भी और कहीं भी धार्मिक गुरूओं का समर्थन नहीं मिलता है।
डा0 अनूप गौड़ सहित उक्त दोनों विद्वानों ने दारूल ”इस्लाम” और ”दारूल हरब” का वर्णन करते हुए यह बात कही है कि -
‘‘मुसलमानों की इस विषय में यह धारणा है कि “दारूल इस्लाम” (मुस्लिम राज्य) को आगे बढ़ाकर “दारूल हरब” (गैर मुस्लिम प्रधान क्षेत्र) पर क़ब्ज़ा कर लिया जाए।
यह एक बेबुनियाद बात है इस में कोई वास्तविकता नहीं। ”क़ुरआन” व ”हदीस” या किसी भी इस्लामिक स्रोत में इस प्रकार की कोई बात नहीं मिलती, अगर लेखक महोदय मध्यकालीन युग में महमूद ग़ज़नवी, मौहम्मद गौरी, तुर्कों या मुगलों के आक्रमणों को देखते हुए यह बात कह रहे हैं तो यह बात समझनी चाहिए कि उनके द्वारा किए गए आक्रमण केवल राजनितिक थे, उनका इस्लाम से कोई संबंध नहीं था, न ही उक्त राजाओं ने ‘‘दारूल इस्लाम’’ या ‘‘दारूल हरब‘‘ को देखकर आक्रमण किए। क्या यह सत्य नहीं कि जब ‘‘बाबर‘‘ ने भारत पर आक्रमण किया तो दिल्ली पर ‘‘इब्राहीम“

“लोधी‘‘ एक मुसलमान राजा शासन कर रहा था। अतः ‘‘बाबर‘‘ का युद्ध ‘‘इब्राहीमलोधी‘‘ से हुआ ऐसे ही ‘‘हुमायूं‘‘ का युद्ध ‘‘शेरशाह सूरी‘‘ से हुआ और ‘‘औरंगज़ेब‘‘ का युद्ध ‘‘कुतुबशाही‘‘ खानदान से हुआ, जबकि यह सब मुसलमान थे। जहाँ तक बात है ‘‘दारूल इस्लाम‘‘ या ‘‘दारूल हरब‘‘ की यह दोनों केवल इस्लामिक इतिहास की परिभाषाएँ हैं जिनका अविष्कार मुहम्मद सल्ल. के सैकड़ों वर्ष बाद ‘‘अब्बासी साम्राज्य‘‘ में हुआ था। कु़रआन या मुहम्मद साहब से संबंधित हदीसों में उक्त दोनों शब्दों का इन मायनों में कहीं कोई वर्णन नही है।
इस सूक्ष्म टिप्पणी के बाद भी अगर ‘‘डा. अनूप‘‘ स्वयं उनके कथनानुसार अभी भी यही मानते है कि इस्लाम की उपज टपकती खून की धारा पर हुई है।(पृष्ठ 67) तो निश्चित ही उन्हें यह भी मानना होगा कि हिन्दू धर्म में भी ऐसा ही है, क्योंकि वहां भी ‘‘कौरवों‘‘ ‘‘पाण्डवों‘‘ के बीच का महायुद्ध, जिसमें एक ओर ‘‘श्री कृष्ण‘‘ भगवान एवं दूसरी ओर उनकी सेना थी। और उसमें कईं करोड़ जानें गयीं थी । मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान ‘‘श्री राम‘‘ द्वारा लंका पर आक्रमण कर युद्ध करना एवं लंका को आग लगाकर भस्म कर देना, ‘‘अशोक महान‘‘ के द्वारा किया गया, रक्तपात तथा ‘‘नन्द‘‘ और ‘‘चन्द्रगुप्त मौर्य‘‘, ‘‘पृथ्वीराज‘‘ व ‘‘जयचन्द‘‘ के बीच युद्ध आदि से तो ऐसा ही प्रतीत होता है।
डा. गौड़ दोनों का तुलनात्मक अध्ययन करें। और फिर बतलाएं के किस की उपज टपकती खून की धारा पर हुई है ?

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम।
वह क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।।

डा. अनूप गौड़ लिखते है-”भारतीय तत्वज्ञान के अनुसार, धर्म एक जीवन जीने की पद्धति है। जिसका न कोई एक स्थापना करने वाला होता है, और न ही कोई अकेली पुस्तक होती है। (पृष्ठ - 3)
उक्त लेखक ने इस्लाम और ईसाई धर्म पर विचार व्यक्त करते हुए यह भी लिखा है कि:-
इस्लाम/ईसाई व अन्य धर्म उपासना पद्धति मात्र हैं। (पृष्ठ - 3)
डा0 गौड़ साहब धर्म या संस्कृति इतनी मामूली वस्तुएं नहीं है जिनकी परिभाषा मेरे या आपके निर्धारित करने से निर्धारित हो जाएगी। सारा संसार जानता है कि जिसका न कोई एक स्थापना करने वाला हो एवं न ही कोई एक धर्म पुस्तक हो, बल्कि जो ढेर सारे, ऋषियों मुनियों बहुत सारे रस्म व रिवाजों एवं अधिक तोर तरीकों से मिलकर बने, तो उसे धर्म कहेंगे या संस्कृति? और यह भी सब जानते हैं कि हर धर्म का एक अग्रणी गुरू होता है। जिसके बतलाए हुए मार्ग पर धर्म की बुनियाद उठती है, वह ही अनुयाइयों के लिए रोल माडल होता है। (ख्याल रहे के रोल माडल व्यक्ति का बनाया जा सकता है समाज को नहीं) परन्तु डा0 गौड़ के कथनानुसार यह हिन्दू धर्म की विशेषता है कि उसका कोई एक धर्म संस्थापक नहीं और न कोई एक धर्म पुस्तक। (पृष्ठ 3)
चलिए कुछ देर के लिए आपकी बात ही सही मान लेते हैं।
अब कृपया इस पर विचार कीजिए कि आपके कितने ”धर्मगुरू” और धर्मग्रन्थ ऐसे हैं जिनकी वास्तविकता ही विवादित है।
हम किसी की आस्था को आघात पहुँचाना नहीं चाहते क्योंकि हम आस्थाओं, भावनाओं के आहत होने का दर्द समझते हैं। किसी के धर्म या धर्मगुरू के संबंध से कोई ऐसी बात कहना जो उसके मानने वालों को बुरी लगे, इस्लाम धर्म इसकी अनुमति नहीं देता, देखें कुरआन सूरह ”अनआम“ आयत 108
परन्तु कहने वालों ने कहा और सारे देश व संसार ने सुना, ‘‘पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग‘‘ और भारतीय ‘‘जहाजरानी मंत्रालय‘‘ ने उच्चतम न्यायालय में विख्यात ‘‘रामसेतु ’’ विवाद पर अपने द्वारा दाखिल किए गए शपथ पत्र में कहा, कि ”राम“ और ‘‘रामायण‘‘ के अन्य किरदार काल्पनिक हैं। और जब राम काल्पनिक है तो उनके भक्त हनुमान् कहाँ से आए।
न केवल भारतीय ‘‘जहाजरानी मंत्रालय‘‘ ने कहा है, बल्कि तमिलनाडु के मुख्य मन्त्री करूणानिधि1 ने कहा तमिलनाडु के मुख्यमन्त्री करूणानिधि ने कहा है कि राम का अस्तित्व इतना बडा ही झूठ है जितना हिमालय के अस्तित्व का सच।
(दैनिक राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली एडीशन,22/09/2007)

और बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धादेव भट्टाचार्य ने कहा और उन से पहले भी बड़े-बडे़ विद्धानगण
(गाँधी जी भी राम और कृष्ण को तारीख़ी शख्सियतें नहीं मानते थे, उन्होंने अपने अखबार ‘‘हरिजन’’ दिनाँक 27 जुलाई 1937 के अंक मे इसकी पुष्टि की है।) कहते रहे हैं। परन्तु न तो हम ऐसा कहते है न ही कहने वालों का समर्थन करते हैं ।
हमारी इसमें कोई दिलचस्पी नही कि हम किसी भी धर्म गुरू या धर्मग्रन्थ की वास्तविकता पर प्रश्न चिन्ह लगाए परन्तु जो हमें स्वधर्म में लौटाना चाहते है जैसा कि ‘‘डा0 गौड़‘‘ ने आह्वान किया है, (पृष्ठ 78) उनसे यह तो पूछा जाना चाहिए कि वह कौन से धर्म में लौटाना चाहते है। क्या उसी में जिसके धर्म गुरूओं और धर्म ग्रन्थों की वास्तविकता ही संदिग्ध है?
डा0 गौड़ ने लिखा है - मुसलमानों से एक बार युद्ध करना ही पड़ेगा, पृष्ठ 75
पाठक क्षमा करें क्या मुझे डा0 गौड़ से यह कहने की अनुमति मिलेगी कि, यह चर्चा होती रही कि राम और रामायण के अन्य किरदार वास्तविक है या काल्पनिक? और एक समुदाय ने राम जी के जन्म-स्थान का भी पता कर लिया और वहाँ पर बने एक धर्मस्थल को केवल ताकत के बल पर घ्वस्त भी कर डाला और उन्हें कोई न रोक सका। डा0 गौड़ मुसलमानों के साथ इस से बड़ा और क्या युद्ध करेंगे।
और 2002 में गुजरात मे जो (Holo Caust - गोधरा रेलवे स्‍टेशन आग लगने की दुर्भाग्‍यपूर्ण घटना, गुजरात में मुसलमानों पर अत्‍याचार....) हुआ उससे बडा और कौन सा युद्ध हो सकता है, जिसमें देश-भक्ति का दावा करने वाली सियासी व समाजी संस्थाओं से जुड़े बडे़-बडे़ नेताओं ने गर्भवती महिलाओं का पेट तक चाक कर डाला, और अपने ऐसे कारनामों को कैमरे के सामने गर्व से स्वीकार भी करते रहे जिसको छोटे पर्दे पर देश के हर नागरिक ने देखा परन्तु क्या “शासन प्रशासन“ और क्या “न्यायालय“, कोई अपराधियों का बाल बाकाँ न कर सका, क्या इससे बढ़कर आज के समय में कोई अन्य प्रकार का युद्ध भी हो सकता है?
रामसेतु के मुद्दे पर राम और रामायण के अस्तित्व के संबंध में सरकारी सत्ह से शपथ-पत्र दाखिल किया गया फिर जल्दी में उसे वापस भी ले लिया गया। ज़ाहिर है कि वापसी का मतलब हंगामे से बचना था, स्थिति जो भी हो। हमारी इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं है कि हम किसी के धर्म गुरूओं के अस्तित्व की खोजबीन करें। परन्तु जब हम यह देखते है कि खुद हिन्दू विद्वानों के बीच राम का वजूद विवादित रहा है, भारत के बहुत से अग्रणी विद्धानगण भी रामायण के किरदारों पर उक्त प्रकार की टिप्पणी कर चुके हैं इसके बावजूद देश का एक विशेष वर्ग ”जन्मभूमि“ खोज लेता है। और ताक़त के बल पर धर्मस्थलों को भी नहीं बख्शा जाता। फिर भी मुसलमानों से युद्ध करने की कसर बाक़ी रह जाती है, तो ऐसे में क़िस्सा-ए-दर्द सुनाए बगै़र कैसे रहा जा सकता है।
अजीब बात यह भी है कि दुनिया भर में कहीं भी महापुरूषों के जन्म-स्थान पर यादगार नही बनाई जाती, जिसकी वजह शायद यह हो कि जब कोई बच्चा जन्म लेता है तो किसी को मालूम नहीं होता कि वह भविष्य में कोई बड़ा आदमी बनेगा इस कारण किसी के भी जन्म-स्थान का रिकार्ड नही रखा जाता, हाँ जिस स्थान पर अंतिम संस्कार होता है उसे अवश्य यादगार बनाने का रिवाज है। इसलिए भगवान राम का यादगारी मंदिर सरयू नदी पर बनाया जाना चाहिए, न कि उनके जन्म स्थान पर।
एक वर्ग का मानना है कि यह आस्था का प्रश्न है परन्तु यह भी एक बडा सवाल है कि आस्था बड़ी है या सच्चाई। एक वर्ग आस्था को न्याय और सच्चाई के ऊपर मानता है, परन्तु ऐसी आस्था जो सच्चाई या न्याय के विपरीत हो आस्था नहीं जुर्म है, जबकि इससे प्रभावित होकर हमारे देश की अदालतें फैसला तक सुना देती हैं। सितम्बर 2007 के अंतिम सप्ताह में उ0प्र0 उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने अपने एक निर्णय मंे भारतीय सरकार को मशविरा दिया है कि वह हिन्दू धर्म पुस्तक ”गीता“ को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित करे। यह भी वास्तविकता पर आस्था का प्रभुत्व स्थापित करने का उदाहरण है। क्या उक्त न्यायधीश ”गीता” की शिक्षाओं को वर्तमान में आदर्श बनाने की अनुमति दे सकते हैं?
1.”भगवद् गीता“ छठा अध्याय श्लोक 11 में श्री कृष्ण जी योगी को योग के लिए बैठने का तरीक़ा बताते हुए कहते हंै कि योगी एकान्त के स्थान में पहले कुश (एक प्रकार की घास) बिछाए उसके ऊपर मृगादिकों का चर्म और उसके ऊपर वस्त्र विछाए
मृगादिकों का चर्म कहां से आयेगा मृग के शिकार पर तो प्रतिबन्ध है, केवल एक मृग के शिकार करने पर वर्तमान में फिल्मी अभिनेता “सलमान ख़ान“ को “न्यायालय“ सात वर्ष के कारावास की सज़ा सुना चुका है।
2. चैथे अध्याय के तेरहवें श्लोक में और अठारवें अध्याय के 41, 42, 43, 44वें श्लोक में समाज को गुणों के आधार पर चार वर्णो में विभाजित किया गया है। क्या वर्तमान में वर्ण व्यवस्था को स्वीकार किया जा सकता है? जबकि अंतर्राष्ट्रीय कानून के अन्तर्गत संसार के हर मनुष्य को समान अधिकार प्राप्त हैं।
3. दूसरे अध्याय में श्री कृष्ण जी अर्जुन को युद्ध पर उभारते नज़र आते है, उन्होंने कहा है-
यदि तुम अपने धर्म के अनुसार इस संग्राम को नहीं करोगे तो अपना धर्म और बड़ाई खो बैठोगे। (श्लोक - 33)
इस श्लोक के अनुसार जिस युद्ध को लड़ने पर धर्म ही खो जाऐगा उसमें दूसरी ओर कृष्ण जी ने अपनी फौज को लड़ने के लिए खड़ा किया हुआ है। लोम-विलाम में से एक ही सत्य हो सकता है, अगर यहाँ युद्ध करना ही धर्म है तो यक़ीनन दूसरा पक्ष अधर्मी होगा, तो क्या कृष्ण जी ने दूसरे पक्ष को अपनी सेना देकर अधर्म का समर्थन नहीं किया है? यह विरोधाभास कैसा? क्या इसके होते यह नहीं कहा जाएगा कि ”गीता“ के उपदेशक ने ऐसा करके धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य, न्याय और अन्याय दोनों का समर्थन किया है।
एक विशेष वर्ग भारत को हिन्दू स्टेट बनाने या देश में रामराज्य लाने की बात करता रहता है, परन्तु क्या यह सम्भव है, रामराज्य में वर्ण व्यवस्था का प्रभुत्व था शूद्र को बा्रह्मण के कार्य करने की अनुमति नहीं थी श्री राम ने ‘‘शम्बूक’’ शूद्र का वध केवल इस कारण कर दिया था कि उसने शूद्र होकर भी ब्राह्मण के कार्य, विद्या प्राप्त करने और जप तप करने का दुस्साहस किया था। (उत्तर कांड 89)
श्री राम के समय की एक कहानी प्रसिद्ध है कि एक बार महर्षि वाल्मीकि जी स्नान करके लौट रहे थे, उन्होंने देखा कि एक शिकारी ने क्रोच पक्षी के एक जोड़े पर तीर चला दिया, जिससे एक पक्षी मर गया, दूसरा अपने मरे हुए साथी को देखकर विलाप करने लगा, इस करूण दृश्य को देखकर वाल्मीकि जी के मुख से स्वतः ही कविता के यह बोल निकल पडे़-
मा निषाद प्रतिष्ठा त्वमगमः शाश्वतीः समाः
यत्क्रौं ´चमिथुनादे कम अवधिः काम मोहितम्
इससे प्रतीत होता है कि राम के समय में शिकार की आम अनुमति थी, स्वयं ”भगवान राम” मृगादि का शिकार करते थे। परन्तु क्या वर्तमान में इन मान्यताओं को स्वीकार किया जा सकता है?
डा0 गौड़ के कथनानुसार हिन्दू एक धर्म है और अन्य धर्म उपासना मात्र। वह यह भी कहते हैं कि हिन्दू एक जीवन जीने की पद्धति है। (पेज 3) अगर हिन्दू धर्म एक जीवन जीने की पद्धति है तो कृपया बताएँ कि यह जीवन जीने की कैसी पद्धति है, जिसके अनुसार जीवन व्यतीत करना वर्तमान में न तो सम्भव है और ना ही उसके अनुसार जीवन व्यतीत करने की अनुमति दी जा सकती है।
हिन्दु धर्म की मूल शिक्षाओं के अनुरूप, “नियोग1“ (महाभारत के अधिक पात्रों का जन्म या तो नियोग प्रथा से हुआ है या स्वच्छंद व्यभिचार व बलात्कार से, सरिता मुक्ता प्रिन्ट -2, पेज 34/7,प्रकाशित बी.ई.-3 झंडेवालान, नई दिल्ली) से बच्चे पैदा करना। स्त्री के एक से अधिक पति होना जैसे की द्रोपदी के थे। समाज को चार खानों में बाँटना, चारों के लिए अलग-अलग नियम, कानून होना(हिन्दू धार्मिक फिलोसफी के अनुसार मनुष्य समाज चार खानों में विभाजित है चारों के कार्य अलग-अलग हैं उनके लिए नियम भी अलग हैं, अधिक जानकारी के लिये वेद, गीता, मनुस्मृति आदि का अध्ययन करें) शूद्रों के लिए शिक्षा प्राप्ति की अनुमति न होना यहां तक की उसे ईश्वर पूजा का अधिकर भी न हो। पति के देहान्त होने पर पत्नी का उसी की चिता के साथ जलकर “सती“ हो जाना।
क्या हिन्दू धर्म की इस प्रकार की शिक्षाओं को वर्तमान का समाज स्वीकार कर सकता है? यहाँ तक की भारत की सरकार भी जीवन जीने की इस पद्धति को स्वीकार नहीं करती। डा0 गौड़ जिन्होंने लिखा है कि
मुसलमानों का धर्मग्रन्थ कु़रआन और ईसाइयों का धर्म ग्रन्थ बाइबिल व्यापक संशोधन मांगते है। पृष्ट 4
वह उक्त प्रकार की धार्मिक शिक्षाओं का अध्ययन करें और बताएं कि व्यापक संशोधन कौन सी पुस्तकें माँग रही हैं? और प्रश्न यह भी है कि डा0 गौड अगर हमें उक्त प्रकार की शिक्षाओं पर लौटाना चाहते हैं तो पहले उस पर स्वयं तो कारबन्द हो जाएं, कम से कम भारतीय सरकार से ही उसे मान्यता दिलवाएं।
आप कह सकते हैं कि वर्तमान में हिन्दू समाज उक्त प्रकार की बातों को छोड़ चुका है, परन्तु ऐसी स्थिति में यह मानना होगा कि हिन्दू समाज अपने धर्म की मूल शिक्षाओं से भटक गया है, ऐसे में वह स्वयं अधर्मी हो गया है, तो क्या आप हमें भी स्वधर्म में लौटाकर अधर्मी बनाना चाहते हैं।
डा0 गौड़ ने लिखा है कि -
जब इस्लाम की विचारधारा का प्रचार होता है तो राष्ट्रवाद नष्ट हो जाता है, और जब राष्ट्रवाद का विकास होता है तो इस्लाम नष्ट हो जाता है। (पृष्ठ 11)
डा0 गौड़ को शायद मालूम नहीं कि भारतीय संविधान, भारतीय संहिता का नब्बे प्रतिशत हिस्सा इस्लामिक सिद्धांतों पर आधारित है या इस्लामी सिद्धांतों से मेल खाता है। इस छोटी सी पुस्तिका की तंगदामनी मुझे इसकी अनुमति नहीं देती कि इस विषय को विस्तार से प्रस्तुत किया जाए, अगर ईश्वर ने चाहा तो इस विषय पर अलग से पुस्तक लिखी जाएगी, परन्तु एक, उदाहरण प्रस्तुत है-
1. भारतीय संविधान में हर नागरिक को समान अधिकार प्राप्त है।
ये सिद्धांत सबसे पहले इस्लाम ने दुनिया के सामने रखा देखें- कुरआन सूरह इसरा आयत नं0 70, सूरह अरफात आयत नं0 189
2. कुछ दिनों पहले ही देश में यह कानून बना है कि बाप की जायदाद में पुत्रों के साथ पुत्रियों को भी हिस्सेदारी दी जाएगी।
इस्लाम चैदह सौ वर्ष पूर्व बेटी को यह अधिकार दे चुका है क़ुरआन सूरह निसा आयत 11 .... 176
3. भारतीय न्यायलय में वादी को दो गवाह पेश करने होते है, यह विचारधारा सबसे पहले इस्लाम ने पेश की थी ....देखें ... कुतुब-ए-फ़िक़ाह
4. आज विधवा की शादी को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इस्लाम चैदह सौ बर्ष से यह आवाज़ उठाता रहा है। दहेज पर सरकारें अब प्रतिबन्ध लगा रहीं हैं इस्लाम 14 सौ वर्ष पूर्व उस पर प्रतिबन्ध लगा चुका है । भूर्ण हत्या, बालिका हत्या आदि पर समाज में अब प्रतिबन्ध लगाया जा रहा है इस्लाम बहुत पहले इस सबको प्रतिबन्धित कर चुका है ।
और यह भी विचारणीय है कि जब उक्त प्रकार की राष्ट्रवादी विचारधाराओं का विकास होता तो उससे इस्लाम नष्ट नहीं होता। हाँ हिन्दुत्व अवश्य नष्ट होता है, क्योंकि उक्त प्रकार की बातें हिन्दू धर्म की मूल शिक्षाओं से टकराती हंै। समानता से वर्ण व्यवस्था नष्ट हो जाती है, जयादाद में बेटी की शिरक़त से प्राय धन को अपना धन जाता है, विधवा की शादी के प्रोत्साहन से सती प्रथा नष्ट हो जाती है।
उक्त प्रकार की बातों के बावजूद हमारा मानना है कि हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित बहुत से ऋषि, मुनि अपने समय के ईशदूत थे जिन्हें ईश्वर ने समय-समय पर धर्म की स्थापना के लिए अपने-अपने क्षेत्रों में भेजा था। ऐसे ही बहुत से धर्मग्रन्थ वास्तव में ईश्वरीय पुस्तकें थीं। हमारा ऐसा मानना अपनी ओर से नहीं, बल्कि “इस्लाम” हमें इस के लिए बाध्य करता है। पवित्र क़ुरआन की यह आयत देखें - “संसार के हर क्षेत्र में हमने अर्थात् ईश्वर ने संदेष्टा, मार्गदर्शक और पैग़म्बर भेजे हैं।“ कु़रअसूरह ”रअद“ आयत 7
और एक दूसरे स्थान पर कहा गया है - “हमने हर क्षेत्र में उसी क्षेत्र की भाषा में संदेश वाहक संदेश लेकर भेजे हैं।“ ”सूरह इब्राहीम“ आयत 4
जब ईश्वर ने हर क्षेत्र में संदेश वाहक भेजे हैं तो कोई कारण नहीं कि भारत में ईशदूत न आए हांे, यह बताने की आवश्यकता नहीं कि यहां कि मूल भाषा संस्कृत है जिसमें हिन्दू धर्म के अधिक ग्रन्थ हैं। परन्तु अब यह प्रश्न उठता है कि इन धर्म ग्रन्थों में ऐसी बातें जो मौजूदा समय में स्वीकार न की जा सकें या ऐसी बातें जो धर्म का हिस्सा न लगें, आख़िर क्यों है? इस संबंध में पवित्र कुरआन हमारा दो प्रकार से मार्ग दर्शन करता है।
1. बताया गया है कि पिछले धर्म विशेष क्षेत्र और विशेष समय के लिए थे। ऐसा हो सकता है कि कोई बात तथा नियम विशेष समय या क्षेत्र में स्वीकार्य रहा हो।
2. यह कि गत धर्मों की पुस्तकों में उसके मानने वालों ने अपने स्वार्थों के अनुसार परिवर्तन कर डाला।
इस्लाम धर्म के अतिरिक्त हर धर्म के मानने वाले स्वयं इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनकी धर्म पुस्तकों में घटाने या बढ़ाने की प्रतिक्रिया चलती रही है एवं वर्तमान में भी जारी है। क़ुरआन में भी कहा गया है- “उनके लिए तबाही है जो धर्म पुस्तकों को अपने हाथों से लिखते है, और कह देते हैं कि यह ईश्वर की ओर से है मामूली स्वार्थ के लिए।“सूरह बकर आयत 79
पहले धर्मावलम्बियों ने ईश्वरीय धर्म में अपनी ओर से मिलावट कर डाली तो ईश्वर ने धर्म का अंतिम संस्करण पवित्र “कुरआन” के रूप में संसार को दिया और उसके एक-एक अक्षर की रक्षा का ज़िम्मा स्वयं लिया। क़ुरआन में कहा गया है- “हमने ही क़ुरआन का अवतरण किया और उसकी रक्षा हम स्वयं करेंगे।“ सूरह ‘‘हिज्र’ आयत नं0 9 सूरह ‘‘हिज्र’ आयत नं0 9
अर्थात् अब धर्मावलम्बियों पर भरोसा नहीं किया जायेगा कि वह गत् धर्मावलम्बियों की भांति इसमें भी अपनी मर्ज़ी से कुछ घटा या बढ़ा दें। इसलिए जो लोग पवित्र क़ुरआन में परिवर्तन किए जाने की बात करते रहते हैं। वह यक़ीन जाने कि ऐसा होना असम्भव है, क्या उनके लिए यह तर्क पर्याप्त नहीं कि सवा चैदह सौ वर्ष के उपरान्त भी कुरआन का एक-एक अक्षर अपनी उसी स्थिति में है जिस पर वह पहले दिन था।
वास्तव में डा0 गौड़ और उन जैसी विचार धारा रखने वाला हर व्यक्ति जानता है कि इस प्रकार के आह्वान से क़ुरआन में कुछ घटाया या बढ़ाया नहीं जा सकता परन्तु फिर भी इस प्रकार के झूठे और बेबुनियाद इल्ज़ामात की बौछार करके एक विशेष वर्ग अपने से कमज़ोर और अल्प मत वाले विशेष वर्ग को ड़रा धमक़ा कर रखना चाहता है।
विचाराधीन पुस्तक “क्या हिन्दुत्व का सूर्य डूब जाएगा” पर यक़ीन रखने वाले व्यक्ति यक़ीन जाने कि अगर हिन्दुत्व का अर्थ वह यही समझ रहे हैं जो डा0 गौड़ ने प्रस्तुत किया है, तो ऐसे ‘‘हिन्दुत्व‘ का सूर्य कभी का डूब चुका, परन्तु हम ‘‘हिन्दुत्व‘ का अर्थ यह नहीं समझते, हमारा मानना है कि ‘‘हिन्दुत्व‘‘ का अर्थ एक विशाल हृदय वाली ऐसी भारतीयता से है जिसमें सबका सम्मान हो। भारत की धरती पर जो भी आया है इस धरती ने उसे अपने दामन में जगह दी है। अनेकता में एकता इसकी पहचान है। यहाँ सारी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले ‘‘महात्मा गाँधी‘‘ जैसे व्यक्ति ने जन्म लिया। यही असल ‘‘हिन्दुत्व‘‘ है, जिसका सूर्य कभी डूबने वाला नहीं।
डा0 गौड़ हिन्दुओं को मुसलमानों से युद्ध करने की सलाह देते हैं। युद्ध की बात करने वाले “इतिहास“ से सबक लें, ‘‘हिटलर‘‘ और ‘‘मुसोलिनी‘‘ ने युद्ध की बात की, ‘‘सद्दाम‘‘ और ‘‘ओसामा बिन लादेन‘‘ ने युद्ध की बात की, आज वे सब कहां हैं? ‘‘पाकिस्तान‘‘ युद्ध की बात करता है, उन्नति की दौड़ में वह “भारत“ से कितना पीछे रह गया, साहिर लुधियानवी ने सच कहा है -

जंग ख़ुद एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी।
आग और ख़ून आज बख़्शेगी, भूख और एहतियाज कल देगी।।
इसलिए ऐ शरीफ इंसानों, जंग टलती रहे तो बेहतर है।
हम और आप सभी के आँगन में, शमाँ जलती रहे तो बेहतर है।।

डा0 अनूप गौड़ ने बडे़ क्रोध के साथ लिखा है -
”आज से 5000 वर्ष पहले तक सम्पूर्ण विश्व में केवल हिन्दू धर्मावलंबी रहते थे। लेकिन 2005 वर्ष पहले अस्तित्व में आए ईसाई आज एक अरब साठ करोड हो चुके हैं। लगभग 2600 वर्ष से पहले अस्तित्व में आए बौद्ध एक अरब 50 करोड़ हंै। लगभग 1400 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आए मुस्लिम आज विश्व में लगभग एक अरब 30 करोड़ हैं।” पृष्ठ 8

डा0 गौड़ को इस बात को लेकर क्रोध है कि कभी पूरे विश्व में केवल हिन्दू धर्म था परन्तु समय-समय पर नये-नये धर्मसंस्थापक आते गए एवं हिन्दू जनसंख्या घटती गई। अच्छा होता कि डा0 गौड इस घटना को ‘‘भगवद् गीता‘‘ के निम्न श्लोक के परिप्रेक्ष्य में देखते-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
- भगवद् गीता 4-7
भगवान श्री कृष्ण जी महाराज कहते है कि -
‘‘जब-जब भी संसार में धर्म की हानि होती है और अधर्म को बढ़ावा मिलता है, तब-तब मैं संसार में धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेता हूं।’’
भगवान श्री कृष्ण का यह उपदेश पवित्र क़ु़रआन की शिक्षा के भी अनुकूल है। इस्लामी शिक्षा के अनुसार इस संसार और विशाल ब्रह्माण्ड के रचयिता सर्वशक्तिमान ईश्वर (जिसको अलग-अलग
भाषाओं में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है) ने इस संसार में मनुष्य को पैदा किया, एवं उसकी शिक्षा दीक्षा और उसे धर्म का ज्ञान देने के लिए प्रथम मनुष्य पर अपनी वाणी का अवतरण किया, मानव जाति में वृद्धि होती गयी, तो धीरे-धीरे ईश्वरीय धर्म पर भी अन्धकार के बादल छाते गए। अतः ईश्वर ने योजनाबद्ध तरीक़े से समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रांे में उसी क्षेत्र की भाषा में धर्म को स्थापित करने के लिए उपदेश देने हेतु अपने दूत भेजे, जिन पर “देवदूत” द्वारा अपनी वाणी का अवतरण किया अथवा यों कहा जाए कि भगवान ने अवतार लिया।
“हदीस“ में कहा गया है कि जब-जब संसार में धर्म की हानि हुई हैं तो ईश्वर ने धर्म की स्थापना हेतु संसार के विभिन्न भागांे मंे स्वयं उसी क्षेत्र की भाषा में धार्मिक उपदेश देने के लिए “ईशदूत“ भेजे हैं। संसार के विभिन्न क्षेत्रों में जन्म लेने वाले ईशदूतांे की संख्या हदीस में एक लाख चैबीस हजार बतायी गई है। जैसा कि गुजर चुका कि पवित्र कु़रआन में कहा गया है -
”हर राष्ट्र में हमने उसी राष्ट्र की भाषा में संदेश देने के लिए ईशदूत भेजे हैं।”
“और हर राष्ट्र में ईशदूत भेजे गए है।” कु़रआन सूरह इब्राहीम आयत 4, सूरह रअद, आयत 7
और जैसा कि हदीस में इस प्रकार के ईशदूतों की संख्या एक लाख चैबीस हजार बताई गई है। स्पष्ट है इतनी बड़ी संख्या का क़ुरआन में वर्णन नहीं किया जा सकता था। अतः स्पष्ट रूप से पवित्र कुरआन में केवल छब्बीस “ईशदूतों“ अथवा “भगवान“ के अवतारों का वर्णन मिलता है उनमें से भी केवल आठ या दस ही ऐसे हैं जिन के क्षेत्रों का भी पता चलता है। विशेष बात यह है कि उन आठ या दस अवतारों में से दो का संबंध स्पष्ट रूप में भारत से बताया गया
है। एक ‘‘आदम‘‘ और दूसरे ‘‘नूह‘‘। पवित्र कुरआन यद्यपि अरबी भाषा में हैं परन्तु यह अद्भुत् संयोग है कि उक्त दोनांे अवतारांे का नाम मुलतः अरबी भाषा में न होकर भारतीय भाषाओं से संबंधित हैं। ‘‘आदम‘‘ आदि से बना है, जिसका मूल अर्थ होता है “पहला” क्यांेकि ‘‘आदम‘‘ ही इस संसार में भेजे जाने वाले पहले मनुष्य भी थे जिनसे शेष मानव जगत की उत्पत्ति हुई, एवं वह प्रथम ईशदूत भी थे इसी कारण उनका नाम भी यहाँ की आदि कालीन भाषा में आदिमः या ‘‘आदम‘‘ रखा गया। यह भी उल्लेखनीय है कि ‘‘आदम‘‘ व ‘‘नूह‘‘ शब्दों की मूल धातु अरबी भाषा में नहीं मिलती बल्कि यह माना गया है कि यह शब्द किसी अन्य भाषा से लिए गए है। इसलामी सिद्धान्त के अनुसार भारत को यह गौरव प्राप्त है कि पहला मनुष्य जो पहला ईश दूत प्रथम अवतार (नबी) भी था वह भारत में हुआ और उसी से सारे मानव जगत की उतपत्ति हुई ।
दूसरे ईशदूत जिनका संबंध भारत से बताया गया है। उनका नाम ”नूह” आया है। उनके बारे में बड़े ही विस्तृत रूप से क़ुरआन में एक घटना का वर्णन है। वह यह कि जब उन्होंने उपदेश देना आरम्भ किया, एवं लोगों को सही धर्म का मार्ग दिखाना चाहा, तो अधिकांश लोगों ने उनकी बात न मानी, एवं उनके शत्रु हो गए, तब ईश्वर ने उनको एक नाविका बनाने को कहा, अतः उन्होने एक बड़ी नाव तैयार की एवं ईश्वर के आदेशानुसार अपने अनुयाइयों सहित नाव पर चढ़ गए, तब ईश्वर ने दुष्टों का नरसंहार करने के लिए इस सारे संसार को जलमग्न कर दिया। अतः संसार के सारे लोग डूब गए, केवल “नूह” एवं उनके कुछ अनुयाई जो उनके साथ नाविका पर सवार थे, वह ही बच पाए। बाद में मानव जगत भी उन्हीं से फैला। इसी प्रकार की एक घटना का वर्णन हमें कुछ भारतीय धार्मिक पुस्तकों में भी मिलता है। जो जल महाप्रलय वाले “मनु महाराज” के नाम से है। इससे पता चलता है कि कु़रआन में “नूह” के नाम से जिस पैग़म्बर का वर्णन किया गया है। वह जल महाप्रलय वाले मनु महाराज का ही वर्णन है।
उक्त विस्तृत भूमिका से केवल यह सिद्ध करना है, कि उक्त में अंकित भगवान “कृष्ण जी” के उपदेश एवं पवित्र कु़रआन की शिक्षाआंे के अनुसार जब-जब धर्म की हानि हुई है, तो धर्म की स्थापना के लिए समय-समय पर ईशदूत आते रहे हैं, या यह कहा जाए कि भगवान अतवार लेते रहे हैं। अतः डा0 गौड़ ने 2005 वर्ष पूर्व ईसा मसीह के आने, 2600 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के आने एंव 1400 वर्ष पूर्व मुहम्मद सा0 के आने को लेकर जो चिन्ता व्यक्त की है वह व्यर्थ है। यह श्रृंखला तो ईश्वरीय नियमानुसार चली आ रही है जिसके अनुसार “आदम” आए फिर नूह आए, “भगवान राम” और “श्री कृष्ण” आए “इब्राहीम” आए, मूसा आए, “ईसा मसीह” आए और अंत में हज़रत मुहम्मद सा0 सल्ल0 आए।
मुहम्मद साहब अंतिम थे, अब कोई नया अवतार (संदेष्टा) या “ईशदूत” नहीं आयेगा, कुरआन और हदीस में यह बात जगह-जगह कही गई है।
यहां एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि मु0 साहब के बाद भी दुनिया में अनेक धर्म स्थापित होते रहे हंै, विशेष रूप से भारत में गत् दिनों कई धार्मिक तहरीकें उठीं जिनसे जुड़े लोग अपने गुरू को न केवल ईश्वर का अवतार बल्कि कुछ तो अंतिम अवतार ही मानते हैं।
इस प्रश्न के उत्तर में दो बातें कही जा सकती हैं, विशेष रूप से भारत में जो धार्मिक आंदोलन खडे़ हुए है उनकी स्थापना करने वालों ने स्वयं कभी यह दावा नहीं किया कि वे ईशदूत या ईश्वर के अवतार हैं, बल्कि उनके मानने वालों ने उन्हें मरणोपरांत ईश्वर का अवतार मान लिया। गुरूनानक जी के इतिहास में लिखा है कि वह कबीर की भांति कोई नया धर्म चलाना नहीं चाहते थे। अतः जो बात गुरू ही न कहे वह केवल अनुयाइयों के मान लेने से धर्म का हिस्सा कैसे हो सकती है?
दूसरी बात मैं अपने हिन्दू भाइयों से यह कहना चाहता हूँ कि आपके पास एक पैमाना है, एक स्केल है, और वह है आपकी धर्म पुस्तकें वेद, पुराण और गीता आदि।
आप देखें कि वह किसको प्रमाणित करते हैं। और अंतिम ऋषि या अंतिम अवतार के रूप में किसे दर्शाते हैं, अगले पृष्ठों में हम इस विषय पर थोड़े विस्तार से चर्चा करेंगे।
परंतु इससे पहले यह जानना बेहतर होगा कि हिन्दू धर्म ग्रंथों के बारे में क़ु़रआन क्या कहता है।
जैसा कि बताया गया कि इस्लाम धर्मानुसार इस पृथ्वी पर एक लाख चैबीस हजार पैग़म्बर आए हैं, परन्तु क़ुरआन शरीफ़ में केवल आठ या दस का ही विस्तारित वर्णन किया गया है। इस प्रकार यह भी बताया गया है कि उक्त एक लाख चैबीस हज़ार पैग़म्बरों में से केवल कुछ ही को अलग से धर्म ग्रन्थ दिए गए हैं। शेष ने अपने से पहले वाले ग्रन्थों के अनुसार ही धर्म की शिक्षा दी है। इस प्रकार क़ुरआन में सभी धर्म ग्रंथों का तो वर्णन नहीं, परन्तु पाँच प्रकार के धर्म ग्रन्थों का विस्तारित वर्णन किया गया हैं। एक स्वयं “क़ुरआन” जिसका अवतरण अरब क्षेत्र में मुहम्मद सा0 सल्ल0 पर हुआ, दूसरे “इंजील” (बाइबिल) जो येरोशेलम (फिलिस्तीन) में “ईसा मसीह” पर उतारी गई, तीसरे “तौरैत” जो मिस्र में प्रकट होने वाले पैग़म्बर मूसा को दी गई, “चैथे ज़बूर” जो हज़रत” “दाऊद” को मिली। पाचवे “सुहुफ-ए-ऊला“ ससूरह आला आयत नं 18या “ज़ुबुर-ए-अव्वलीन”सूरह शुअरा 196
“सुहुफ़-ए-ऊला“
अरबी भाषा के दो शब्दों सुहुफ़+ऊला से मिलकर बना है, “सुहुफ़” बहुवचन है सहीफे का, और “सहीफ़े” का मूल अर्थ है, ग्रंथ “ऊला” शब्द अव्वल का स्त्रीवाचक है, जिसका मूल अर्थ है “पहले” या “आदि”। अरबी व्याकरण के अनुसार निर्जीव बहुवचन का विशेषण “स्त्री वाचक” होता है। अतः “सुहुफ-ए-ऊला” का मूल अर्थ हुआ “आदि ग्रंथ”। यही अर्थ “जुबुर-ए-अव्वलीन” का है। यह अद्भुत संयोग है कि हिन्दू धर्म पुस्तकों (वेदों) को ”आदि ग्रंथ“ कहा जाता है। इससे पता चलता है कि क़ुरआन में जिसे “सुहुफ-ए-ऊला” या “ज़ुबुर-ए-अव्वलीन” कहा गया है वह भारतीय धर्म ग्रन्थों (वेदों) का ही वर्णन है, जो संख्या में चार हैं। इसी कारण कु़रआन मंे भी उनके लिए सार्वजनिक बहुवचन शब्द का प्रयोग है। इसके अतिरिक्त वेद एवं क़ुरआन की शिक्षाओं में जो समानता पाई जाती है उससे भी इस दावे की पुष्टि होती है।
विस्तार से जानने के लिए देखें - सैयद अब्दुल्ला तारिक़ की पुस्तक:
‘‘वेद और कुरआन कितने कितने पास‘‘ प्रकाशित :- रोशनी पब्लिकेशन हाऊस, बाज़ार नसरूल्लाह ख़ां - रामपुर (नवाबान)
“क़ुरआन” में कहा गया है कि -
”इसमें अर्थात “कुरआन” में जो कुछ है वह कोई नई बात नहीं, वह केवल वही है, जो “आदि” ग्रंथो में था एवं जो इब्राहीम और मूसा के ग्रंथों में था।”
सूरह आला पारा 30, आयत नं0 19
”वह (क़ुरआन) उन ग्रन्थों की पुष्टि करता है एवं उन्हें प्रमाणित करता है जो पहले से आई हुई हैं, एवं वह (ईश्वर) इससे पहले मनुष्यों के मार्गदर्शन के लिए ”तौरैत“ एवं इंजील का भी अवतरण कर चुका है।“सूरह आल-ए-इमरान आयत नं0 -3
वेद एवं क़ुरआन की शिक्षाओं में अत्यंत समानताओं को देखते हुए कुछ भारतीय विद्वानों ने कहा है कि (नऊज़ु़बिल्लाह) “क़ुरआन” में जो कुछ है, वह वेदों से चुराया हुआ है, परन्तु चैदह सौ पच्चीस वर्ष पूर्व जब मुहम्मद सा0 सल्ल0 पर क़ुरआन का अवतरण हुआ, उस समय भारत से अरब की दूरी, आवागवन के साधनों का अभाव, अरबी एवं संस्कृत भाषाओं के बीच का अन्तर, वह भी उस समय में जब अनुवाद के पर्याप्त साधन न थे एवं मुहम्मद साहब या उनके किसी साथी का किसी भी समय में भारत से किसी प्रकार का संबंध न होना उक्त आरोप के खण्डन के लिए पर्याप्त है।
परन्तु फिर भी यह प्रश्न अपनी जगह क़ायम है, कि फिर दोनों की शिक्षाओं में यह समानता किस प्रकार है।
उसका उत्तर हमें स्वयं कु़रआन से ही मिलता है वह यही कि क़ुरआन केवल पहली आसमानी ईश्वरीय धर्म पुस्तकों की पुष्टि करता है। अतः जब हम यह मान लेते हैं, कि दोनों का स्रोत एक है तो हमें उक्त प्रश्न का स्वयं ही उत्तर मिल जाता है। क़ुरआन में है- “ईश्वर ने तुम्हारे लिए वही धर्म स्थापित किया है जो “नूह“ को दिया था, “इब्राहिम“ को “मूसा“ और “ईसा“ को दिया था।“ सूरह शूरा आयत 13
मुहम्मद साहब सल्ल0 ने भी कहा है कि - ”मैं कोई नया धर्म लेकर नही आया। अपितु वह ही धर्म लाया हूँ, जो आदम लाए थे, नूह लाए थे इब्राहीम लाए थे एवं मूसा व ईसा मसीह लाये थे“। - हदीस
मुहम्मद साहब की इस हदीस में पाँच ईशदूतों, अथवा यह कहें कि पाँच अवतारों का वर्णन है, इनमें प्रथम के दो ऐसे, है जिनका संबंध भारत की धरती से बताया गया है।
ऐसे ही कु़रआन में अनेक स्थानों पर इस्लाम धर्म को “दीन-ए-क़य्यिम” कहा गया है। दीन का मूल अर्थ होता है धर्म एवं “क़य्यिम” का मूल अर्थ है जो सदैव से क़ायम हो, अतीत से चला आ रहा हो, एवं कभी उस की श्रृंखला टूटी न हो, संस्कृत में इसी के लिए “सनातन” के शब्द का प्रयोग होता है। गोया केवल भाषा का अन्तर है, ख़्याल रहे की ईश्वर के लिए सारी भाषाएं समान हैं क्योकि सब उसी के द्वारा बनाई गई हैं।
इस सूक्ष्म भूमिका के उपरांत डा0 गौड़ के उन शब्दों पर ध्यान केन्द्रित करना उचित होगा जिनमें उन्होंने कहा है कि - आज से पाॅंच हज़ार वर्ष पहले तक सम्पूर्ण विश्व में केवल हिन्दू धर्मावलंबी रहते थे। फिर गौतम बुद्ध आए, ईसा मसीह आए, एवं चैदह सौ वर्ष पहले मुहम्मद साहब आए और उनका धर्म फैलता गया, एवं हिन्दुओं की संख्या घटती गई।
वास्तव में बात यह है कि यह सारे ईशदूत स्वयं ही नहीं आए, अपितु हिन्दू धर्म के नियमानुसार एवं पवित्र ग्रंथ गीता के उस श्लोक
के अनुसार आए हैं जिस में कहा गया था कि - जब-जब भी धर्म की हानि होती है तो धर्म की स्थापना के लिए मैं आता हूं। साथ ही यह भी कि वह कोई नया धर्म लेकर नहीं आए, बल्कि वही धर्म लाए हैं जो पहले से चला आ रहा था, परन्तु वह धूमिल हो गया था।
साथ ही इस पर भी विचार करे कि “भगवद् गीता” 4/8 में यह बात स्पष्ट की गई है कि युग-युग में धर्मस्थापना के लिए ईश्वर के अवतार प्रकट होते हैं।
डा0 गौड़ साहब! विश्व भर में बहुत सारे ऋषि, मुनि एवं भगवान के अवतार प्रकट हुए हैं, इन में से बहुत से भारत में आए। जिन्होंने यहाँ की भाषा में ईश्वर का संदेश दिया परन्तु यह सारी सृष्टि उसी एक सर्वशक्तिमान ईश्वर के द्वारा ही रची गई है जो सारे संसार का मालिक है। अतः उसने कभी भारत में अवतार लिया, तो कभी अन्य देशों में, कभी संस्कृत भाषा में अपना संदेश दिया, तो कभी विश्व की अन्य भाषाओं में, क्योंकि सारी धरती उसी की है, एवं विश्व की सारी भाषाएं भी उसी की बनाई हुई हंै। अतः ऋषियों, मुनियों एवं अवतारों व पैग़म्बरों की उसी श्रृंखला में अंतिम अवतार के रूप में मुहम्मद सा0 ने अरब की पृथ्वी पर जन्म लिया, एवं अरबी भाषा में उपदेश दिए। पवित्र “क़ु़रआन” से पहले जितने भी ईश्वरीय धर्म ग्रन्थ आए, उन सभी में बडे़ ही स्पष्ट शब्दों में अंतिम अवतार हज़रत मुहम्मद सा0 सल्ल0 की निशानियाँ बताई गई थीं एवं मुहम्मद सा0 सल्ल0 की अंतिम ईश्वरीय दूत के रूप में प्रकट होने की भविष्यवाणी की गई थी। इसी पर प्रकाश डालते हुए संस्कृत के जाने माने विद्वान “डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय” अपनी पुस्तक में लिखते है-
”वेदों में बाइबिल में तथा बौद्ध ग्रन्थों में अंतिम ऋषि के रूप में जिसके आने की घोषणा की गई थी वह मुहम्मद साहब ही सिद्ध होते हंै। अतः मेरे अन्तः करण ने मुझे यह प्रेरणा दी कि सत्य को खोलना आवश्यक है। भले ही वह कुछ लोगों को बुरा लगने वाला हो।“
‘‘नराषंस और अंतिम ऋशि’’ पृश्ठ 4
लेखक डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय
प्रकाशितः- जु़महुर बुक डिपो, देवबन्द (यू.पी.)
उक्त विषय में डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय (जो भारत के दो विश्वविद्यालयों “चण्डीगढ़” एवं “इलाहाबाद” में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष रहे हंै।) की दो महत्वपूर्ण पुस्तिकाएँ ‘‘नराशंस और अंतिम ऋषि’’ व “कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब” हमारा मार्ग दर्शन करती है।
प्रथम पुस्तिका ‘‘नराशंस और अंतिम ऋषि’’ में वेदों ”बाइबिल” एंव बौद्ध ग्रन्थों में “मुहम्मद साहब” के संबंध में की गई भविष्यवाणियों पर विस्तार से चर्चा की गई है। जब कि दूसरी पुस्तक ”कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब“ केवल पुराणों पर आधारित है ।
इन दोनों पुस्तकों में ”डा0 उपाध्याय” ने बहुत ही स्पष्ट रूप से वेदों एवं पुराणों में की गई ”अंतिम ऋषि“ “कल्कि अवतार” के रूप में मुहम्मद साहब सल्ल0 के संबंध से भविष्यवाणियों का वर्णन किया है यहाँ पर उदाहरणार्थ उनकी दोनों पुस्तिकाओं में से एक-एक अंश प्रस्तुत है -डा0 वेद प्रकाश ने अपने इस कथन को सिद्ध करने के लिए जिसमें उन्होंने कहा है कि “वेदों” में, “बाइबिल“ में तथा “बौद्ध“ ग्रन्थों में “अन्तिम ऋषि“ के रूप में जिसके आने की घोषणा की गई थी, वह मुहम्मद साहब ही थे। पवित्र वेदों से अनेक मन्त्र प्रस्तुत किए हैं। उनमें से दो निम्नलिखित हैं -
1. इंदजना उपश्रुत नराशंस स्तविष्यते ........... - अथर्ववेद संहिता 20/127/1
2.उष्ट्रा यस्य प्रवाहणो ............ - अथर्ववेद 20/127/2
उक्त मंत्रों पर टिप्पणी करते हुए “नराशंस का काल निर्धारण” के अन्तर्गत् डा0 वेद प्रकाश ने लिखा है-
1. ब्रह्म वाक्य में कहा गया है कि ”हे लोगों सुनो नराशंस की प्रशंसा की जाएगी। उपर्युक्त वाक्य “अथर्ववेद“ का है, और “अथर्ववेद“, “ऋग्वेद“, “यजुर्वेद“ तथा “सामवेद“ से बहुत बाद का है। अतः “अथर्ववेद“ के काल के बाद तो नराशंस की उत्पत्ति का होना निश्चित हुआ।
2. नराशंस के वाहन के रूप में ऊँट का प्रयोग उल्लिखित है।
अतः नराशंस की उत्पत्ति का होना उस समय निश्चित हुआ जब ऊँटों का सवारी के रूप में प्रयोग हो।
नराशंस या अन्तिम ऋषि (पेज 7)
यह बताने की आवश्यकता नही कि मुहम्मद साहब जिस क्षेत्र में प्रकट हुए वहां सवारी के रूप में ऊँट का प्रयोग होता था। एवं मुहम्मद साहब भी ऊँट की सवारी करते थे। मक्के से मदीने की “हिजरत” नामक यात्रा उन्होंने ऊँट पर की थी, “फ़तह मक्का” के समय भी वह ऊँट पर सवार थे। इस के अतिरिक्त करीब-करीब सभी प्रमुख यात्राएं आपने ऊँट के द्वारा की हैं।
खेद का विषय है कि आज के आधुनिक युग में भी जो लोग “नराशंस” के ऊँट पर बैठकर आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं वह कौन सी दुनिया में रहते हैं।
नराशंस शब्द का अनुवाद अगर अरबी भाषा में किया जाए तो वह केवल “मुहम्मद” शब्द से ही किया जा सकता है अर्थात् जिसकी प्रशंसा की जाए। स्वयं यह बहुत बड़ा प्रमाण है कि वेदांे के नराशंस ”मुहम्मद साहब“ ही थे।
यहाँ फिर इस बात को दोहराना उचित होगा कि सारी भाषाएं ईश्वर की हैं, एवं सारा संसार ईश्वर का है, वह जिस क्षेत्र में चाहे, और जिस भाषा में चाहे अपनी वाणी एवं अपने संदेश का अवतरण कर सकता है। साथ ही यह बात भी विचारणीय है कि यह तो ईश्वर का बड़ा अन्याय होगा, कि वह संसार के केवल एक विशेष क्षेत्र “भारत” में ही अवतार लेता रहे एवं संसार के एक विशेष भाग में एवं विशेष भाषा में ही उपदेश देता रहे और दूसरे क्षेत्रों एवं भाषाओं को अपने अवतारों एवं उपदेशों से वंचित रखे। ईश्वर के नौ अवतार भारत में हुऐ एक भारत से बाहर हो गया हम उसको इसलिए स्वीकार न करें कि वह भारत में प्रकट नहीं हुआ यह तो बड़ा अन्याय है।
उपरोक्त प्रथम मंत्र में कहा गया है -
”हे लोगों सुनो नराशंस की प्रशंसा की जाएगी”।
यह मंत्र अपने में कितना सत्य है रात, दिन में पाँच बार अज़ान होती है जिसमें “मुहम्मद साहब” की नाम सहित प्रशंसा की जाती है, पाँच समय ही नमाजे़ पढ़ी जाती हैं। नमाज़ में भी नाम सहित मुहम्मद साहब की प्रशंसा (दरूद) पढ़ी जाती है। यह बात भी उल्लेखनीय है कि अज़ान एवं नमाज़ की समय सारणी इस प्रकार की है कि विश्व भर में हर क्षण हर समय कहीं न कहीं अज़ान, या नमाज़ हो रही होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि रात या दिन का एक क्षण भी ऐसा नहीं गुज़रता जिसमें मुहम्मद साहब (नराशंस) की प्रशंसा न की जा रही हो।
Michael Hart एक अमरिकी विद्वान है, इन्होंने अस्सी की दहाई में The 100 नाम से एक पुस्तक लिखी, जिसमें दुनिया की उन सौ महानविभूतियों का वर्णन है जिन्होंने पूरी दुनिया को अपने अस्तित्व से प्रभावित किया। लेखक ने इस पुस्तक में नम्बर एक पर ‘‘हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल0‘‘ को रखा है। दूसरे नम्बर पर ‘‘आइज़क-न्यूटन‘‘ और तीसरे नम्बर पर ‘‘हज़रत ईसा मसीह‘‘ को स्थान दिया है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि लेखक पेशे से एक वैज्ञानिक हैं और धर्म से ईसाई। वह अगर पक्षपात से काम लेते तो ‘‘ईसा मसीह‘‘ को प्राथमिकता देते या ‘‘न्यूटन‘‘ को, परन्तु उन्होंने निष्पक्षता से काम लेते हुए ‘‘मुहम्मद साहब सल्ल0‘‘ को पहला स्थान दिया। दूसरे स्थान पर “आइज़क-न्यूटन” और तीसरे नम्बर पर “ईसा मसीह” को रखा है। इससे बड़ी कौन सी प्रंशसा होगी कि मुख़ालिफ़ भी सराहने पर मज़बूर हो जाए।
“डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय” ने अपनी दूसरी पुस्तिका ‘‘कल्कि अवतार और मुहम्मद सा0’’ में बडे़ स्पष्ट रूप से इस बात को सिद्ध किया है कि कल्कि अवतार जो “भागवत पुराण” के अनुसार 24 अवतारों के प्रकरण में कल्कि सबसे अन्तिम अवतार हैं। ”मुहम्मद साहब” ही थे जो सन् 570 ईसवी में अरब देश में पैदा हुए।
डा0 वेद प्रकाश के अनुसार “पुराणों” में भी बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कल्कि अवतार के सम्बन्ध से भविष्यवाणी उनकी निशानियों सहित की गयी है। पुराणों में कल्कि अवतार की जो निशानियां बताई गयी हैं, उनमें कुछ इस प्रकार हैं -
1. कल्कि का प्रधान पुरोहित के यहां जन्म लेना।
2. पुरोहित का नाम विष्णु युश होना।
3. माता का नाम सुमति होना।
4. कल्कि का पैदा होने के बाद पहाड़ों पर चला जाना।
5. एवं वहाँ परशुराम जी से ज्ञान प्राप्त करना।
6. कल्कि अवतार का शुक्ल पक्ष की बारहवीं तिथि को माधव मास में जन्म लेना।
7. कल्कि अवतार का ऐसे समय में होना जब युद्धों में अश्व एवं खड्ग
का प्रयोग होगा।
उक्त सारी निशानियाँ ‘‘भागवद् गीता‘‘ ‘‘कल्कि पुराण‘‘ एवं ‘‘भागवत पुराण‘‘ पर आधारित हैं। विस्तार से जानने के लिए देखें ‘‘डा0 वेद प्रकाश‘‘ उपाघ्याय की पुस्तिका -
‘‘कल्कि अवतार और मुहम्मद स.’’
प्रकाशित: जु़महुर बुक डिपो देवबन्द यू0पी0।
अब इस पर ध्यान दीजिए कि मुहम्मद साहब के पिता का नाम “अब्दुल्लाह” था। “विष्णुयुश” एवं “अब्दुल्लाह” का अर्थ एक है, आपकी माताजी का नाम “आमिना” था। “आमिना” एवं “सुमति” का अर्थ एक होता है आपका जन्म महीने की बारहवीं तिथि को हुआ। आप ज्ञान प्राप्ति से पहले मक्के से उत्तर की ओर स्थित पहाड़ पर ‘‘हिरा‘‘ नामक गुफा में बैठकर कई-कई दिन तक ध्यानलीन रहते थे। वहीं पर एक दिन “देवदूत” जिबरील नामक फ़रिश्ता प्रकट हुआ एंव आपको ज्ञान की प्राप्ति हुई।
“कल्कि अवतार का अश्व एवं खड्ग प्रयोग के समय में होना।”
इस पर विचार व्यक्त करते हुए “डा0 वेद प्रकाश“ लिखते हैं -
”दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि अन्तिम अवतार उस समय होगा जब कि युद्धांे में तलवार का प्रयोग किया जाता हो। यह तलवारों एवं घोडों का युग नहीं है। .......... जबकि आज से चैदह सौ वर्ष पूर्व घोडांे तथा तलवारों का प्रयोग होता था।“
-कल्कि अवतार और मुहम्मद सा0 पृष्ठ 22-23
पुराणों में कल्कि अवतार का स्थान शम्भल ग्राम बताया गया है अतः कुछ लोग इस भ्रम में है कि कल्कि अवतार “भारत“ के “सम्भल“ शहर में प्रकट होंगे।
परन्तु डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय के अनुसार शम्भल ”संज्ञा“ नहीं ”विशेषण“ के रूप में प्रयोग है। उन्होने इस के तीन अर्थ लिखे हैं जो तीनों ही स्वयं उन्हीं के शब्दों में भारत के सम्भल शहर पर किसी भी प्रकार फ़िट नहीं होते जबकि मुहम्मद साहब के जन्मस्थान अरब के “मक्का नगर” पर वह तीनों अर्थ शत-प्रतिशत फिट बैठते हैं। इन बातांे से बड़े ही स्पष्ट रूप से यह सिद्ध होता है कि कल्कि अवतार मुहम्मद साहब ही थे, जो अंतिम युग के अंतिम अवतार हैं।
उक्त प्रकार की भविष्यवाणी पर टिप्पणी करते हुए कुछ लोग ऐसा कह देते हैं कि यह बातें धर्म ग्रन्थों में बाद की बढ़ाई हुई हो सकती हंै, परंतु ऐसा मान लिया जाए तो फिर उक्त धर्म ग्रन्थों की अन्य शिक्षाओं की ही क्या विश्वसनीयता रह जाती है? अतः “वेद” और “पुराणों“ में आस्था रखने वालों के लिए दो में से एक विकल्प को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई अन्य रास्ता नहीं है कि या तो वह अपने ही धर्म ग्रन्थों की वास्तविकता पर प्रश्न चिन्ह लगाएं या “मुहम्मद साहब“ को “ईशदूत“ के रूप में स्वीकार करें, क्यांेकि उक्त धर्मग्रन्थों में अन्तिम ऋषि के होने का जो समय (ऊँटों, घोड़ों, तलवार एवं खड़ग के प्रयोग का समय) बताया गया है वह वर्तमान युग के चलते सम्भव नहीं है।
प्रायः देखने में आता है कि बहुत से धर्म में विश्वास रखने वाले लोग उक्त निशानियों को पढ़कर यह जान और समझ लेते हैं कि अन्तिम युग के अन्तिम अवतार “मुहम्मद साहब“ ही थे, परन्तु उन्हें कुछ दुनियावी स्वार्थ ऐसा मानने से रोके रखते हैं।
धर्म गुरूओं के सामने तो वह प्रश्न है जो स्वयं एक हिन्दू लेखक ने निम्न शब्दों में प्रकट किया है।
“धर्माधिकारियों ने कभी भी उन विचारों को पनपने, फलने नही दिया जिनसे उनकी रोज़ी रोटी पर आँच आती हो।“ सरिता मुक्ता, प्रिंट 2, पृष्ठ 34/1
और जहाँ तक आम जनता की बात है वह वही कहती है जिसका “कु़रआन“ में निम्न प्रकार वर्णन है।
“और जब उनसे कहा जाता है कि उसे मानों जो ईश्वर ने उतारा है, तो वह कहते हैं कि हम तो उसे मानेंगे जिस पर हमने अपने बाप-दादा को पाया है, चाहे शैतान भड़की आग की ओर ही क्यों न बुलाए।“ सूरह लुकमान आयत नं 20
हम अपने निजी जीवन में झांक कर देखें, हमने कितनी ऐसी परम्पराओं को छोड़ दिया है, जिन पर हमने अपने बाप-दादा का पाया था, हमने उन जैसी वेश-भूषा छोड़ी, उन जैसा खान-पान छोड़ा, परन्तु धर्म जो मरणोपरान्त के जीवन काल से बहस करता है, उसके संबंध से हम क्यों फिक्र मन्द नहीं होते।
एक वर्ग ऐसा भी है जो देश भक्ति का दावा करता है वह केवल उसी चीज को मानना चाहता है जो अपने देश में उपजी हो। भारत से बाहर की किसी भी वस्तु को वह विदेशी समझ कर उससे दूर रहना चाहता है। अजीब बात यह है कि यह वर्ग एक ओर तो स्वयं को एक कोने में समेटकर रखना चाहता है, दूसरी ओर भारत को संसार के अग्रणी मार्ग दर्शक (विश्व गुरू) के बतोर भी देखना चाहता है। एक समय में यह दोनों बातें कैसे हो सकती हैं। ऐसे लोगों से सर इक़बाल के लहजे में यह कहना उचित होगा -
चीन व अरब हमारा, हिन्दोस्तां हमारा
हिन्दी हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा
इस वर्ग को यह भी सोचना चाहिए कि वह आवागमन में विश्वास रखते है, अगर अगले जन्म में किसी अन्य देश या अन्य धर्म में पैदा हो गए तो उनकी देश-भक्ति का क्या होगा? या ईश्वर से उन्होंने इस बात की गारन्टी ली है कि वह हर जन्म व हर योनि में केवल भारत में और केवल हिन्दू धर्म में ही जन्म लेंगे।
इस्लाम इस विषय में यह सिद्धान्त पेश करता है कि जो जहां पैदा हुआ और मरा है मानो उसकी मिट्टी वहीं की थी अतः वह कल कयामत में वहीं से दोबारा जीवित करके उठाया जायेगा ।
डा0 गौड़ जो मुसलमानों से युद्ध करने की बात भी करते है, और उनसे हिन्दू धर्म में लौटने को भी कहते है। वह उक्त बातों पर गंभीरता से विचार करें और सोचें कि किसे किसके धर्म में लौट आना चाहिए, और अगर आप इस विषय पर विचार करना नहीं चाहते तो
न करें यह युग शिक्षा का युग है, वह समय इतिहास बन गया जब एक तबके को शिक्षा या ज्ञान प्राप्त करने की अनुमति नही थी। अतः ज्यों-ज्यों शिक्षा बढ़ेगी और आम जनता में तर्क शक्ति उत्पन्न होगी, लोग स्वयं ही सच्चाई को स्वीकार करेंगे अपितु कर भी रहे हैं।
“इंजीनियर नवीन कंसल” मेरे एक मित्र है मैंने उनको “कुरआन” पढ़ने को दिया और उसके बाद उनकी आख्या जाननी चाही। उन्होंने कहा कि जो कुछ भी मैंने पढ़ा और समझा है मुझे लगा कि यह सब बातें पहले से ही मेरे मन में थीं।
यह वही बात है जिसको ”हदीस“ में कहा गया है कि “इस्लाम धर्म“ “दीन-ए-फितरत“ है अर्थात् प्राकृतिक धर्म है, इसकी शिक्षाएं वही हंै जो प्राकृतिक रूप से हर व्यक्ति के मन में पहले से विद्य्मान होती हंै, उदाहरण के बतौर बड़ों का आदर, छोटों से प्यार, पड़ोसी से अच्छा बर्ताव, ग़रीबों की मदद करना, यह सब ऐसी बातें हैं कि हर व्यक्ति का मन-मस्तिष्क स्वीकार करता है कि इन बातों को धर्म का हिस्सा होना ही चाहिए। यही बात ‘‘कुरआन’’ की शिक्षाओं में है। “कुरआन“ के अलावा नवीन साहब को अगर “शिव पुराण“ पढ़ने को दिया जाता तो शायद उन्हें ऐसा न लगता।
विशेष रूप से “शिव पुराण“ का ज़िक्र करने का कारण यह है कि “शिव जी“ को “महादेव” कहा जाता है और हिन्दू धर्म में शिवलिंग की ही अधिक पूजा होती है। एक अनुमान के मुताबिक प्रतिवर्ष करीब पचास लाख व्यक्ति एक समय में “शिवलिंग” पर गंगाजल चढ़ाते हैं। “शिवलिंग“ क्या है, उसकी पूजा क्यों और कब से होती है और उसका आकार और स्थिति क्या है इसका वर्णन विस्तारित रूप से हमें “शिवपुराण“ में ही मिलता है। हो सकता है कि “शिवलिंग“ और ‘‘जलहरी’’ की पूजा करने का आदेश किसी समय में स्वयं ईश्वर ने दिया हो, परन्तु वर्तमान समय मंे “शिवलिंग“ और उससे संबंधित कथाओं को पढ़ते हुए आम व्यक्ति के दिमाग में तरह-तरह के सवाल उत्पन्न होते हंै।
‘‘इस्लाम’’ में केवल एक ईष्वर ही पूज्यनीय है
इस्लाम धर्म में केवल एक ईश्वर की पूजा होती है, जो निराकार है, सर्वशक्तिमान है, जिसने सारी सृष्टि को रचा, उसे किसी भी भाषा में ईश्वर, अल्लाह, प्रभु, या गाॅड, किसी भी नाम से पुकारा
जा सकता है, पर जो व्यक्ति उस निराकार सर्व-शक्तिमान एक ईश्वर की उपासना नहीं करता वह ईश्वर उस से अनेक साकार खुदाओं की पूजा करा देता है बल्कि जो उसके सामने नहीं झुकता उसे सैकड़ों खुदाओं के सामने झुकना पड़ता है, जो स्वयं को बनाने वाले की पूजा नहीं करता उसे अपने हाथ से बनाए हुए खुदाओं की पूजा करनी होती है। यह किसी विशेष धर्म की बात नहीं, कम्युनिज़्म के मानने वाले जो स्वयं को धर्म मुक्त मानते हैं वह भी धर्मावलंबी हैं, जो पूजा अर्चना भी करते है, कम्युनिज़्म उनका धर्म है, “माक्र्स“, “लेनिन“ और “माउत्से“ उनके ईश्वर और “माक्र्स“ का ग्रन्थ Das Capital उनकी धर्म पुस्तक है। आस्था और पूजा के प्रकार अलग-अलग हो सकते है, परन्तु यह मनुष्य की ऐसी ही आवश्यकता है, जैसे खाना और पानी, कम्युनिस्ट जो अपने को नास्तिक कहते हैं, माक्र्स और लेनिन में उनकी भी आस्था होती है, जिनकी वह पूजा करते है, एक कम्युनिस्ट जब “लेनिन“ या “माक्र्स“ के स्टैच्यू के पास से गुज़रता हैं तो उसके कदम हल्के हो जाते है और वह सर से हेट उतारकर उन्हंे सेलूट देता है, क्या इसे पूजा नहीं कहेंगे? स्वयं हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों का एक वर्ग कहता है कि वह किसी धर्म या ईश्वर में विश्वास नहीं रखता है, उसे मरणोपरांत ज़िंदगी पर भी विश्वास नहीं, वह सारी सृष्टि को स्वयं से अस्तित्व में आने वाली एक वस्तु कहता है। इन लोगों की मिसाल गर्भवती महिला के पेट में पलने वाले उस बच्चे की सी है, जिसको कहा जाए कि माँ के पेट का जीवन कोई जीवन नहीं, बल्कि इसके बाहर इससे एक बहुत बड़ी दुनिया है जहां असल जीवन व्यतीत करना है, परंतु वह इस बात को केवल इसलिए न माने कि उसने ऐसी कोई महान दुनिया नहीं देखी लेकिन जब वह पैदा होने के बाद इस दुनिया को देखे, तो उसकी आँखें खुल जाएं। जो व्यक्ति मरणोपरांत परलोक को एक नए संसार के रूप में नहीं मानते, वह उसको देखकर मानेंगें। जिन लोगों को यह बह्माण्ड, अंतरिक्ष में घूमते ग्रह, नियमित होते रात और दिन, यह उगते और बढ़ते पेड़-पौधे और इस अद्भुत सृष्टि की हज़ारों वस्तुएं सृष्टि के रचयिता के होने का यक़ीन नही दिलातीं मौत का एक झटका उन्हें इन सारी बातों का यक़ीन दिलाने के लिए काफी होगा और ये लोग उस समय मानेंगे जब मान लेना उन्हें कोई लाभ नही पहुंचा पायेगा।
और जहाँ तक धर्म में विश्वास रखने वालों की बात है, उनकी एक बात बड़ी अज़ीब लगती है, वह यह कि जब धार्मिक विद्वानों से इस विषय पर चर्चा करें कि क्या वेदों में “नराशंस“ का वर्णन है जिसकी सवारी ऊँट होगी, जिसकी संसार भर में प्रशंसा की जाएगी तो वह स्वीकार करते हैं कि हाँ ऐसा है, गीता में कहा गया है कि युग-युग में ईश्वर अवतार लेते हैं यह भी उन्हें स्वीकार है। ईश्वर के दस अवतार हैं, सत्युग में चार, त्रेता में तीन, द्वापर में दो और कलयुग में एक, जो उनके अनुसार अभी प्रकट नही हुए हंै, यह भी उन्हें स्वीकार है। पुराणों में कल्कि अवतार की भविष्यवाणी की गई है, जो ऊँटों घोड़ों तलवार और खड़ग् के प्रयोग के समय में आएगा, यह भी वह मानते है, परंतु यह सब निशानियां ‘‘मुहम्मद साहब सल्ल0‘‘ पर फ़िट होती है अतः कल्कि अवतार आ गए हैं, यह उन्हें स्वीकार नहीं, कारण यह है कि वह भारत में नहीं आए, इसलिए एक विशेष धर्म में विश्वास रखने वाले आज भी कल्कि अवतार की प्रतीक्षा में जी रहे हैं।
अगर यह मान लिया जाए कि कल्कि अवतार अभी तक नहीं आए अपितु उनका आना शेष है तो ऐसी अवस्था में कई प्रश्न खड़े होते हैं।
1. पहला प्रश्न यह है कि प्रथम नौ अवतार भारत में आए, शेष एक को भी भारत में ही आना चाहिए। यह तो ईश्वर का बड़ा अन्याय होगा कि वह भारत के अलावा सारे संसार की अनदेखी करता रहे। ऐसे में धर्म की सच्चाई पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है।
2. कलयुग को आरम्भ हुए छः हजार साल के लगभग समय हो गया है, कलयुग तो स्वयं ही बुराई और अपराधों का युग था, परंतु अब जबकि माना जाता है कि यह समय घोर-अन्याय ज़ुल्म, ज़्यादती और अपराधों का समय है, तो आखिर ‘‘कल्कि’’ जो दुष्टों का नरसंहार और साधुओं की रक्षा करने के लिए आएंगे उन्हें काहे का इंतज़ार है?
3. कल्कि की उत्पत्ति ऊँट, घोड़ों, तलवार और खड्ग के समय में बताई गई है। कम से कम इस युग में तो ऐसा समय अब दोबारा आने वाला नहीं। हाँ अबसे चैदह सौ वर्ष पूर्व जब ‘‘मुहम्मद साहब’’ इस
संसार में पधारे थे, वह समय अवश्य वैसा ही था। वास्तव में बात यह है कि धर्म ग्रन्थों के अनुसार कल्कि में विश्वास रखने वाले यह तो जानते और समझते हैं कि कल्कि अवतार मुहम्मद साहब ही थे परंतु सत्य के मुक़ाबले स्वार्थ उन्हें मानने से रोकता है। ऐसे लोगों के लिए ही “क़ुरआन“ में ईश्वर कहते हैं -
“जिनको हमने धर्म ग्रन्थ दिए थे वह मुहम्मद साहब को, ऐसे पहचानते हंै जैसे लोग अपने पुत्रों को पहचान लेते है, परंतु जिन्हें घाटे में ही रहना है वह मानते नहीं“

कुछ सीधे-सादे बन्धु ऐसे भी है जो कहते हैं कि सारे धर्म समान हैं और सब उसी ईश्वर तक पुहँचने का मार्ग बताते हैं, परन्तु अगर ऐसा होता तो ईश्वर को युग-युग में अवतार लेने की क्या ज़रूरत थी? और पहले धर्मों में उसने जो ग्रन्थ दिए हैं, उनमें एक अन्तिम अवतार के आने की भविष्यवाणी क्यों की जाती? क्या इससे यह समझ में नहीं आता है कि आदिकाल के धर्म एवं उसके ग्रन्थ विशेष क्षेत्र एवं विशेष समय के लिए थे और वर्तमान का धर्म स्वयं ईश्वर की इच्छा के अनुसार वह है जिसकी भविष्यवाणी आदि ग्रन्थों में की गई थी।
अतः डा0 गौड़ जिन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है कि -
”इस पुस्तक के माध्यम से मैं आह्वान करता हूँ (मुसलमानों एवं ईसाइयों का ) कि वे अपने स्वधर्म में लौट आएं।“ -पेज 78
अतः मैं भी अपनी इस पुस्तक के माध्यम से डा0 गौड़ एवं उन जैसे विचार रखने वाले सभी भाई, बहनों का आह्वान करता हूं कि वे उक्त सच्चाई को स्वीकार करते हुए अपने मूल धर्म में लौट आएं जो पहले से चले आ रहे ईश्वरीय धर्म का रिवाईज़्ड एवं लेटेस्ट एडिशन है, जिसमें ईश वाणी की श्रृंखला का अन्तिम एवं फाइनल संस्करण पवित्र कु़रआन के रूप में आपके सामने है। यह कोई नया धर्म नहीं बल्कि सनातन धर्म का मूल रूप है जो आपकी ही खोई हुई अमानत है। मैं आपकी इस अमानत को आपकी सेवा में प्रस्तुत करने का सौभाग्य प्राप्त करता हूं।
परन्तु जो लोग आज के समय जानकर और समझकर भी सत्य को स्वीकार नहीं करते, वह उस समय अवश्य स्वीकार करेंगे जब मानने या
स्वीकार करने से कोई लाभ न होगा। मरणोपरांत जब मनुष्य ईश्वर की अदालत में उपस्थित होगा, उस समय का जो नक्शा क़ुरआन में खींचा गया है उसे पढ़कर रोंगटे खडे़ हो जाते हैं कहा गया है -
“और लोगों को उस दिन से डराइए जब अज़ाब आएगा उस समय ज़ालिम लोग कहेंगे हे ईश्वर हमें थोडी मोहलत देदे, अब की बार हम तेरी दावत (तेरे पैगा़म) को स्वीकार कर लेंगें, और संदेष्टा के बताए मार्ग पर चलेंगे“ सूरह इब्राहिम आयत नं0 44
लेकिन क़यामत के बाद कोई दूसरी क़यामत नहीं होगी न किसी को दोबारा से इस संसार में भेजा जाएगा।
पहली ज़िन्दगी में जिसने अच्छे कर्म किए होंगे उनके लिए ‘‘स्वर्ग’’ होगी तो बुरे कर्म करने वालों के लिए ’’नरक’’ की दहकती आग ‘‘कु़रआन’’ में है।
और जिन लोगों ने अपने पालनहार का इंकार किया उनके लिए नरक का अज़ाब है, और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है, जब वह उसमें फेंके जाएंगे तो उसके दहाड़ने की भयानक आवाज़ सुनेगें, और वह प्रकोप से बिफर रही होगी ऐसा लगेगा कि प्रकोप से अभी फट जाएगी, हर बार जब भी उसमें कोई समूह डाला जाएगा तो उसके कारिन्दे कहेंगे क्या तुम्हारे पास कोई सावधान करने वाला नहीं आया था, वह कहेंगे कि आया था परन्तु हम उसे झुठलाते रहे। सूरह मुल्क 8-9
कुरआन की उक्त आयतों के बाद “मिशकात शरीफ“ की उस हदीस को समझना उचित होगा जिसमें कहा गया है कि क़यामत उस समय तक नहीं आएगी जब तक अल्लाह इस्लाम की आवाज़ को संसार के हर घर में दाखिल न कर दें।
आज वह समय आ गया है हर मानने न मानने वाले के घर में अनेक माध्यम से इस्लाम की आवाज़ पहुँच चुकी है स्वयं डा0 गौड़ ने क़ुरआन को पढ़ लिया है। जैसा कि उनकी पुस्तक के अध्यन से पता चलता है।
और अगर सत्य के प्रकट हो जाने के बाद भी आपको सच्चाई स्वीकार नहीं है तो मैं पवित्र क़ुरआन की भाषा में आपके लिए केवल इतना कहना चाहूंगा कि -
”कोई भी किसी अन्य व्यक्ति के हिस्से का भार नहीं उठाएगा अपितु सबको अपना बोझ स्वयं उठाना हैं।“ सूरह,फातिर, आयत 18
अंत में पहले से चले आ रहे ईश्वरीय धर्म के अंतिम संस्करण (इस्लाम) की सूक्ष्म रूप रेखा प्रस्तुत करना उचित होगा ताकि “इस्लाम“ पर बेवजह कीचड़ उछालने वाले जान लंे कि इसके प्रसार से राष्ट्रवाद नष्ट नहीं होता,

इस्लाम के पाँच मौलिक सिद्धान्त
बुनयादी तौर पर “इस्लाम” के पाँच स्तम्भ हैं।
पहला कलिमाः- अर्थात् इस बात का यक़ीन करना कि समस्त ईश्वरीय सत्ता केवल उस निराकार सर्व शक्तिमान परमेश्वर की है जो केवल एक है, और वह अकेला ही पूजनीय है उसके अतिरिक्त किसी और की पूजा नहीं की जा सकती, और हज़रत मुहम्मद सा0 सल्ल0 उसके अंतिम दूत हैं।
कलिमे के दो अंग है पहला ईश्वर को एक मानना, दूसरा मुहम्मद सा0 सल्ल0 को उसका अंतिम दूत मानना, जब हम इन दोनों बातों को हृदय से स्वीकार कर लेते हंै तो हमें अलग-अलग क्षेत्रों में दो अलग-अलग लाभ प्राप्त होते हैं, जब हम इस बात में यक़ीन करते हैं कि सारी सत्ता केवल एक ईश्वर के पास है, वह ही मारता और ज़िंदगी देता है वह ही सुलाता और जगाता है, वह ही बनाता और बिगाड़ता है और हर अच्छी व बुरी तक़दीर उसी की ओर से है, तो यह यक़ीन हमें सैकड़ों झूठे सत्ताधारियों से भयमुक्त कर देता है और जब हम केवल उसी की पूजा करने का प्रण लेते हंै तो यह संकल्प हमें हज़ारों वस्तुओं को पूजने से छुटकारा देता है इस सूरत में हमको पैदा करने वाले, मारने वाले या अन्न देने वाले अलग खुदाओं की अलग-अलग पूजा की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि वह केवल एक ही है।
इंसान अपने जीवन में अन्न, पानी, हवा और रोशनी आदि का ऐसा मोहताज है कि इनकी कल्पना के बग़ैर मनुष्य का जीवन सम्भव नहीं परन्तु हमें इन सब वस्तुओं की पूजा की आवश्यकता नहीं, क्यों कि यह सब उसी एक ईश्वर की पैदा की हुई हंै जिसने इस सारे अद्भुत ब्रह्माण्ड की रचना की है। इसके बावजूद जो लोग प्रकृति और जड़ पदार्थ की पूजा करते है उनकी मिसाल उस बीमार जैसी है जो डाक्टर को छोड़कर दवा को धन्यवाद दे।
कलिमे का दूसरा अंग मुहम्मद सा0 को ईश्वर का अंतिम दूत मानना है। जब हम मुहम्मद सा0 को ईश्वर के अंतिम दूत के तौर पर स्वीकार कर लेते हैं तो ऐसी स्थिति में सारे संसार के विभिन्न क्षेत्रों में आने वाले और संसार की विभिन्न भाषाओं में ईश्वर का संदेश देने वाले लाखों ईशदूतों में हमारी आस्था स्थापित हो जाती है और हमें उन सभी ईशदूतों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

दूसरा नमाज़
ः- हर मनुष्य चाहे वह कहीं भी और किसी भी स्थिति मे हो रात और दिन में पाँच बार ईश्वर के सामने एक विशेष क्रिया कलाप जिसमें केवल चन्द मिनट लगते हैं, यह जान और समझ कर करना है कि ईश्वर उसे देख रहा है और वह ईश्वर को। जब कोई मनुष्य रात दिन में पाँच बार ईश्वर के सामने इस यक़ीन के साथ खड़ा होता है कि मरने के बाद एक दिन उसे ईश्वर की अदालत में अपने हर अच्छे बुरे कार्य का हिसाब देना है जिसके बदले उसे या तो अनन्त तक के लिए स्वर्ग का आराम मिलेगा या नरक की यातनाएं, तो फिर वह अपने जीवन में अच्छे कार्य करता है और बुरों से बचता है, पाँच समय के अभ्यास से उसके के हृदय में ईश्वरीय सत्ता स्थापित हो जाती है, फिर वह चोरी नही करता, किसी का ना हक़ खून नही बहाता, किसी का हक़ नही मारता, किसी को बुरी नज़र से नही देखता, केवल इसलिए ही नही कि यह कार्य करने से उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ सकता है बल्कि इसलिए भी कि वह दुनियावी अदालत की नज़र से तो बच सकता है परन्तु उस ईश्वर की नज़र से नही बच सकता जो हर समय और हर जगह है। अब अगर वह एक अधिकारी है तो रिश्वत नही लेगा केवल इसलिए नही कि उसे अपने से ऊपर के आॅफिसर का भय है जिसकी वह पकड़ मंे भी आ सकता है और बच भी सकता है, बल्कि इसलिए कि उसे ईश्वर की पकड़ का यक़ीन है। अब अगर वह एक कर्मचारी है तो उपने कर्तव्य और समय का पालन अधिकारी के डर से नही बल्कि ईश्वरीय डर से करता है, अर्थात् कोई उसे देख रहा हो या न देख रहा है, वह बुराई से बचता है और अच्छे कार्य करता है क्योंकि वह जहाँ भी है ईश्वर उसे देख रहा है जो उसके द्वारा किए कार्यो का हिसाब लेगा।
और अगर कोई नमाज़ पढ़ने के बावजूद भी बुराइयों से नही रूकता तो समझिए कि वह नमाज़ नही पढ़ रहा है केवल औपचारिकता निभा रहा है। क़ुरआन में है
सच में नमाज़ बुराइयों और बे हयाई की बातों से रोकती है। सूरह अनकबूत आयत 45

तीसरा ज़कात:-
एक निर्धारित सीमा से अधिक धन रखने वाले व्यक्ति के लिए अनिवार्य है कि वह धन का चालीसवाँ हिस्सा निकालकर भूखों, गरीबों और ज़रूरत मंदों को दें। ताकि समाज में आर्थिक संतुलन बना रह सके।
चैथा:- रोज़ा - वर्ष के बारह महीनों में से एक विशेष महीने के रोज़े रखना।
दुनिया में कितने लोग ऐसे है जिन्हें दो वक्त का खाना नसीब नही होता, कितने लोग बिना शाम का खाना खाए सो जाते हंै। भूख और प्यास से ग्रस्त व्यक्ति पर क्या गुज़रती है इसका अहसास केवल उसे ही हो सकता है, जिसे कभी भूख और प्यास का अहसास हुआ हो, रोज़ा इसलिए अनिवार्य किया गया है कि भूख और प्यास के दर्द को समझकर इंसान एक ओर भूखों और गरीबों की मदद करे तो दूसरी ओर ईश्वर के उन उपहारों पर उसका शुक्र अदा करे। जो ईश्वर ने उसे उपलब्ध कराए हैं।
पाँचवाँ हज:-
अगर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद किसी व्यक्ति के पास इतना धन बचता है कि वह उस नगर की यात्रा कर सके, जिसमें ईश्वर के अंतिमदूत हज़रत मुहम्मद सा0 ने जन्म लिया था तो ऐसे व्यक्ति पर जीवन में एक बार उस नगर मक्का की यात्रा करना ज़रूरी है, ताकि वह उस स्थान को देख और जान सके जहाँ से ईश्वर ने इस संसार को अपना अंतिम संदेश सुनाया -
कु़रआन इस्लाम का मूल ग्रंथ है, कु़रआन के बाद हज़रत मुहम्मद सा0 के द्वारा कही गई उन बातों (हदीसों) का भी महत्व है, जिनकी वास्तविकता प्रमाणित हो -
आइये अब यह देखें के उक्त पाँच मौलिक सिद्धान्त हिन्दु धर्म से कितने दूर या कितने पास हैं।
1. पहला कलिमा: अर्थान ईश्वर को एक मानना और मुहम्मद साहब को उसका अन्तिम दूत ।
इसके पहले अंश को ब्रहमसूत्र के परिपेक्ष में देखें जिसमें कहा गया है - ईश्वर एक ही है, दूसरा नहीं है, नहीं है, ज़रा भी नहीं है।
ध्यान रहे के ब्रहमसूत्र को वेदों का सार कहा जाता है ।
इसके अतिरिक्त निम्न के मत्र भी देखें -
1. वह ईश्वर केवल एक और अकेला है अर्थव वेद 13-4-12
2. वह एक है हमें केवल उसी की वन्दना करनी चाहिए ।
ऋग्वेद 8-1-1
3. उसके सिवा किसी की प्रशंसा न करो ऋग्वेद 6-45-16
उक्त प्रकार की ओर भी बहुत सी मिसालें हैं ।
कलिमे का दुसरा भाग हज़रत मुहम्मद सल0 को ईश्वर का अन्तिम दूत मानना है। इस विषय पर कलकि अवतार और नराशंस के हवाले से विस्तृत चर्चा हो चुकी है ।
2. इस्लाम धर्म का दूसरा मूल सिद्धान्त ”नमाज़“ नमः+अज अर्थात अजन्मे ईश्वर को नमस्कार करना । उसकी विधी क्या हो इसका वर्णन ”शिव पुराण“ आदि में अनेक स्थानों पर किया गया है ।
यह अंश देखें -
शंभू देव को भक्ति भाव से विधि पूर्वक साष्टांग प्रणाम करें । तदन्तर शुद्ध बुद्धि वाला उपासक शास्त्रोक्त विधि से इष्टदेव की परिक्रमा करे।
“संक्षिप्त शिव पुराण“ विद्येश्रवर संहिता पृष्ठ 50, गीता प्रेस, गोरखपुर ।
साष्टांग सः+अष्ट+अंग अर्थात वह दंडवत जिसमें शरीर के आठ अंग पृथ्वी पर लगें। यह वही स्थिति है जो नमाज़ के मुख्य भाग (सजदा) में होती है, इसके अतिरिक्त किसी अन्य स्थिति में शरीर के आठ अंग पृथ्वी को स्पर्श नहीं करते ।
3. ज़कात: - ज़कात एक प्रकार का दान है जिसकी सीमा निर्धारित है, दान का हिन्दु धर्म में क्या महत्व है इसको सब जानते हैं । इस्लाम ने केवल उस की सीमा निर्धारित करके मालदरों के लिए उसे अनिवार्य किया है ।
4. रोज़ा:- यह व्रत का मूल रूप है अपितु यही असली व्रत है।
5. हज:- यह एक तीर्थ यात्रा है इसमें दो बिना सिले कपडे पहनकर नंगे पाँव और नंगे सिर ”काबा“ की परिक्रमा की जाती है और फिर सिर के बाल मुडवाए जाते हैं । हिन्दु धर्म में बिना सिले वस्त्र धारण करना, नंगे परों परिक्रमा करना और विशेष अवसरों पर सिर के बाल मुण्डवाने का क्या महत्व है बताने की ज़रूरत नहीं ।
इसलिए हमारा यह मानना है के इस्लाम धर्म कोई नया धर्म नहीं, बल्कि यह सनातन धम का ही मूल रूप है । जो आप की खोई हुई अमानत है, मैं आपकी इस अमानत को आपकी सेवा में प्रस्तुत करने का सौभाग्य प्राप्त करता हूं।
एक वर्ग को शायद यह अपनी संस्कृति और सभय्ता पर प्रहार लगे, और उसे अपनी संस्कृति लुप्त होती दिखाई दे।
परन्तु इसपर भी अवश्य विचार किया जाना चाहिए कि संस्कृति का यह बेजा लोभ कहीं मरनोप्रांत के अनन्त जीवन में हमको नरक की भयानक आग का ईंधन न बनादे । क्योंकि ईश्वर की अदालत में किसी देश की संस्कृति या सभय्ता की पूछ नहीं होगी, अपितु उसके द्वारा किए गए कर्मो की पूछ होगी, जहां तक संस्कृति की बात है ईश्वर के लिए हर देश बराबर है और हर देश की संस्कृति बराबर है क्योकिं सारे देश एक ही ईश्वर के हैं । बात संस्कृति की आई तो इस पर भी विचार करना उचित होगा कि हम कहीं धर्म को तो संस्कृति से नहीं जोड़ रहे हैं, क्योंकि हिन्दु धर्म और हिन्दुस्तानी संस्कृति दो अलग-अलग वस्तुएं हैं। जबकि प्रायः देखा जाता है कि बात हिन्दुस्तानी संस्कृति की होती है और प्रस्तुत किया जाता है हिन्दु धर्म को ।
संस्कृति स्वयं से बनती है और वह कभी लुप्त नहीं होती जबकि धर्म को स्थापित किया जाता है वह स्वंय से नहीं बनता । इसलिए जो लोग संस्कृति को लेकर भयभीत हैं उन्हें भय का अनुभव करने की कोई आवश्यकता नहीं क्याकिं भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया में लोहा मनवा चुकी है, सारी दुनिया में भारतीय अपनी अलग पहचान रखते हैं परन्तु वह संस्कृति किसी धर्म विशेष का नाम नहीं, धर्म संस्कृति से हट कर अलग चीज है जिसका वजूद सत्य है और इस सत्य की खोज करना हर बुद्धिमान व्यक्ति का कर्तव्य है, ताकि भविष्य में ईश्वर के सामने लज्जित न होना पडे ।
ईश्वर हमें सदबुद्धि दे ।


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लेखक:- डा. मौलवी मुहम्‍मद असलम क़ासमी (Right) साइबर मौलाना मुहम्‍मद उमर कैरानवी


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