दयानन्द जी ने क्या खोजा क्या पाया? Dr.-anwar-jamal-research


मानवता को महाविनाश से बचाने के उद्देश्य से ही यह पुस्तक लिखी गई है। जगह-जगह मिलने वाले दयानन्दी बंधुओं के बर्ताव ने भी इस पुस्तक की ज़रूरत का अहसास दिलाया और स्वयं स्वामी जी का आग्रह भी था-
``इस को देख दिखला के मेरे श्रम को सफल करें। और इसी प्रकार पक्षपात न करके सत्यार्थ का प्रकाश करके मुझे वा सब महाशयों का मुख्य कर्तव्य काम है।´´ (भूमिका, सत्यार्थ प्रकाश, पृष्‍ठ-5)
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मिल्लत उर्दू/हिन्दी एकेडमी
मौहल्ला सोत, रूड़की

In 2016
डा. अनवर जमाल की पुस्तक "स्वामी दयानंद जी ने क्या खोजा? क्या पाया?" परिवर्धित संस्करण इधर से डाउनलोड की जा सकती है --पुस्तक में108 प्रश्न नंबर ब्रेकिट में दिये गए हैं
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   भूमिका
इनसान का रास्ता नेकी और भलाई का रास्ता है। यह रास्ता सिर्फ़ उन्हीं को नसीब होता है जो धर्म और दर्शन (Philosophy) में अन्तर जानने की बुद्धि रखते हैं। धर्म ईश्वर द्वारा निर्धारित होता है जो मूलत: न कभी बदलता है और न ही कभी बदला जा सकता है, अलबत्ता उससे हटने वाला अपने विनाश को न्यौता दे बैठता है और जब यह हटना व्यक्तिगत न होकर सामूहिक हो तो फिर विनाश की व्यापकता भी बढ़ जाती है।
दर्शन इनसानी दिमाग़ की उपज होते हैं। समय के साथ ये बनते और बदलते रहते हैं। धर्म सत्य होता है जबकि दर्शन इनसान की कल्पना पर आधारित होते हैं। जैसे सत्य का विकल्प कल्पना नहीं होता है। ऐसे ही धर्म की जगह दर्शन कभी नहीं ले सकता। धर्म की जगह दर्शन को देना धर्म से सामूहिक रूप से हटना है जिसका परिणाम कभी शुभ नहीं हो सकता।
भारत एक धर्म प्रधान देश है। समय के साथ नये दर्शन पनपे और बहुत से विकार भी जन्मे। सुधारकों ने उन्हें सुधारने का प्रयास भी किया। लाखों गुरूओं के हज़ारों साल के प्रयास के बावज़ूद भारत की यह भूमि आज तक जुर्म, पाप और अन्याय से पवित्र न हो सकी। कारण, प्रत्येक सुधारक ने पिछले दर्शन की जगह अपने दर्शन को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया, धर्म को नहीं। स्वामी दयानन्द जी भी ऐसे ही एक सुधारक थे।
जिस भूमि के अन्न-जल से हमारी परवरिश हुई और जिस समाज ने हमपर उपकार किया उसका हित चाहना हमारा पहला कर्तव्य है। मानवता को महाविनाश से बचाने के उद्देश्य से ही यह पुस्तक लिखी गई है। जगह-जगह मिलने वाले दयानन्दी बंधुओं के बर्ताव ने भी इस पुस्तक की ज़रूरत का अहसास दिलाया और स्वयं स्वामी जी का आग्रह भी था-
``इस को देख दिखला के मेरे श्रम को सफल करें। और इसी प्रकार पक्षपात न करके सत्यार्थ का प्रकाश करके मुझे वा सब महाशयों का मुख्य कर्तव्य काम है।´´ (भूमिका, सत्यार्थ प्रकाश, पृष्‍ठ-5)
सो मैंने अपना कर्तव्य पूरा किया। अब ज़िम्मेदारी आप की है। आपका फै़सला बहुत अहम है। अपना शुभ-अशुभ अब स्वयं आपके हाथ है।
विनीत,
डॉ0 अनवर जमाल, बुलन्दशहर
ishvani@yahoo.in
दिनांक - बुद्धवार, 29 जुलाई 2009
श्रावण, अश्टमी द्वितीया, सं0 2066


मैं कौन हँ? और मुझे क्या करना चाहिये?
एक इनसान जब होश संभालता है तो बहुत से प्रश्न उसके मन को बेचैन करते हैं। जब वह इस सृष्टि पर नज़र डालता है और पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं, फ़सलों और मौसमों को, धरती की सुंदरता और अंतरिक्ष की विशालता को, सूर्य से लेकर परमाणु तक को, उनकी संरचना, संतुलन और उपयोगिता को देखता है तो सहज ही कुछ प्रश्न पैदा होते हैं कि यह सब कुछ खुद से है या इसका कोई बनाने वाला और चलाने वाला है? अगर यह सब कुछ खुद से ही है तो इतना संतुलन और नियमबद्धता, इतनी व्यवस्था और उपयोगिता इन बुद्धि और चेतना से खाली निर्जीव पदार्थो में आई कैसे? और अगर कैसे भी इत्तेफ़ाक़ से आ गई तो फिर निरन्तर बनी हुई कैसे है? और अगर ऐसा नहीं है बल्कि किसी `ज्ञानवान हस्ती´ ने इस सृष्टि की रचना की है तो उसने ऐसा किस उद्देश्य से किया है? उसने मनुष्‍य को क्यों पैदा किया? और वह उससे क्या चाहता है? वह कौन सा मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्‍य अपनी पैदाईश के उद्देश्य को पाने में सफल हो सकता है? आदि आदि।
इन सवालों का जवाब केवल ज्ञान द्वारा की संभव है। और ज्ञान के लिए ज्ञानी की, एक गुरू की ज़रूरत है। ज्ञान देने वाला एक गुरू वास्तव में ज़मीन और आसमान के सारे खज़ानों से भी बढ़कर है क्योंकि केवल उसी के द्वारा मुनश्य अपने जीवन का वास्तविक `लक्ष्य´ और उसे पाने का `मार्ग´ जान सकता है और अपने लक्ष्य को पाकर अपना जन्म सफल बना सकता है। इस तरह एक सच्चे और ज्ञानी गुरू की तलाश हरेक मनुश्य की बुनियादी और सबसे बड़ी ज़रूरत है। लेकिन जैसा कि इस दुनिया का क़ायदा है कि हर असली चीज़ की नक़ल भी यहाँ मौजूद है इसलिए जब कोई मनुश्य गुरू की खोज में निकलता है तो उसे ऐसे बहुत से नक़ली गुरु मिलते हैं जिन्हें खुली आँखों से नज़र आने वाली चीज़ों की भी सही जानकारी नहीं होती लेकिन ईश्वर और आत्मा जैसी हक़ीक़तों के बारे में अपने अनुमान को ज्ञान बताकर लोगों को भटका देते हैं।
ऐसे ही प्रश्नों के जवाब पाने के लिए बालक मूलशंकर ने अपना घर छोड़ा और एक ऐसे सच्चे योगी गुरू की खोज शुरू की जो उसे `सच्चे शिव´ के दर्शन करा सके। इसी खोज में वह `शुद्धचैतन्य´ और फिर `दयानन्द´ बन गये लेकिन उन्हें ऐसा कोई योगी गुरू नहीं मिल पाया जो उन्हें `सच्चे शिव´ के दर्शन करा देता। तब उन्होंने स्वामी बिरजानन्द जी से थोड़े समय वेदों को जानने-समझने का प्रयास किया। इस दौरान उन्होंने हिन्दू समाज में प्रत्येक स्तर पर व्याप्त पाखण्ड, भ्रष्‍टचार और अनाचार को खुद अपनी आंखों से देखा । तब उन्होंने अपनी सामर्थय भर इसके सुधार का बीड़ा उठाने का निश्चय किया। दयानन्द जी वास्तव में अपने निश्चय के पक्के और बड़े जीवट के स्वामी थे। उन्होंने अपने अध्ययन के मुताबिक अपना एक दृष्टिकोण बनाया और फिर उसी दृष्टिकोण के मुताबिक लोगों को उपदेश दिया और बहुत सा साहित्य रचा। यह साहित्य आज भी हमारे लिए उपलब्ध है ।

क्या दयानन्द जी का आचरण उनके दर्शन के अनुकूल था?
स्वामी जी की मान्यताएं सही हैं या गलत? और वह `संसार को मुक्ति´ दिलाने के अपने उद्देश्य में सफल रहे या असफल? और यह कि क्या वास्तव में उन्हें सत्य का बोध प्राप्त था? आदि बातें जानने के लिए स्वयं उनके आहवान पर उनके साहित्य का अध्ययन करना ज़रूरी है । सच्चाई जानने के लिए उनके जीवन को स्वयं उनकी ही मान्यताओं की कसौटी पर परख लेना काफ़ी है क्योंकि सच्चा ज्ञानी वही होता है जो न केवल दूसरों को उपदेश दे बल्कि स्वयं भी उस पर अमल करे ।
दयानन्द जी मानते थे कि अपराधी को क्षमा करना अपराध को बढ़ावा देना है -`क्या ईश्वर अपने भक्तों के पाप क्षमा करता है? इसके उत्तर में वे कहते हैं -
`नहीं। क्योंकि जो पाप क्षमा करे तो उसका न्याय नष्‍ट हो जाये और सब मनुश्य महापापी हो जायें। क्योंकि क्षमा की बात सुन ही के उनको पाप करने में निर्भयता और उत्साह हो जाये। जैसे राजा अपराधियों के अपराध क्षमा कर दे तो वे उत्साहपूर्वक अधिक-अधिक बड़े-बड़े पाप करें। क्योंकि राजा अपना अपराध क्षमा कर देगा और उनको भी भरोसा हो जाए कि राजा से हम हाथ जोड़ने आदि चेश्टा कर अपने अपराध छुड़ा लेंगे और जो अपराध नहीं करते वे भी अपराध करने से न डर कर पाप करने में प्रवृत्त हो जायेंगे। इसलिए सब कर्मों का फल यथावत देना ही ईश्वर का काम है क्षमा करना नहीं। (सत्यार्थप्रकाश, सप्तम., पृष्‍ठ 127)
`न्याय और दया का नाम मात्र ही भेद है क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है वही दया से...... क्योंकि जिसने जैसा जितना बुरा कर्म किया हो उसको उतना वैसा ही दण्ड देना चाहिये, उसी का नाम न्याय है। और जो अपराधी को दण्ड न दिया जाए तो दया का नाश हो जाए क्योंकि एक अपराधी डाकू को छोड़ देने से सहस्त्रों धर्मात्मा पुरूषों को दुख देना है। जब एक के छोड़ने में सहस्त्रों मुनश्यों को दुख प्राप्त होता है, वह दया किस प्रकार को सकती है? (सत्यार्थ प्रकाश, सप्तम0, पृष्‍ठ 118)
अब दयानन्दजी के उपरोक्त दर्शन के आधार पर स्वयं उनके आचरण को परख कर देखिये कि दया और न्याय का जो सिद्धान्त उन्होंने ईश्वर, राजा और धार्मिक जनों के लिए प्रस्तुत किया है स्वयं उस पर कितना चलते थे?
स्वामी जी को पता लग गया कि जगन्नाथ ने यह कार्य किया है। उन्होंने उससे कहा ---- ''जगन्नाथ, तुमने मुझे विष देकर अच्छा नहीं किया। मेरा वेदभाष्‍य कार्य अधूरा रह गया। संसार के हित को तुमने भारी हानि पहुँचाई है। हो सकता है, विधाता के विधान में यही हो । ये रूपए रख लो। तुम्हारे काम आएंगे। यहाँ से नेपाल चले जाओ क्योंकि यहाँ तुम पकड़े जाओगे। मेरे भक्त तुम्हें छोड़ेंगे नहीं''। (युगप्रवर्तक0, पृष्‍ठ 151)
दयानन्द जी द्वारा अपने अपराधी को क्षमा कर देने की यह पहली घटना नहीं है बल्कि अनगिनत मौकों पर उन्होंने अपने सताने वालों और हत्या का प्रयास करने वालों को क्षमा किया है।
`फरूखाबाद में आर्यसमाज के एक सभासद की कुछ दुष्‍टों ने पिटाई कर दी। लोगों ने स्कॉट महोदय से उसे दण्ड दिलाया । पर स्वामीजी को रूचिकर न लगा। उन्होंने स्कॉट महोदय तथा सभासदों से कहा - ''चोट पहुंचाने वाले को इस तरह दण्डित करना आपकी मर्यादा के खिलाफ है। महात्मा किसी को पीड़ा नहीं देते, अपितु दूसरों की पीड़ा हरते हैं।'' (युगप्रवर्तक0, पृष्‍ठ 130)
सम्वत् 1924 में भी स्वामीजी को एक ब्राह्मण ने पान में जहर खिला दिया था। कर्तव्यनिशष्‍ठ तहसीलदार सय्यद मुहम्मद ने अपराधी को गिरफ्तार करके स्वामी जी के आगे ला खड़ा किया तो वे बोले -
''तहसीलदार साहब, मैं आपके कर्तव्यनिश्ठा से अत्यन्त प्रभावित हूँ। लेकिन आप इसे छोड़ दें। कारण, मैं संसार को कैद कराने नहीं, अपितु मुक्त कराने आया हूँ। यदि दुष्‍ट अपनी दुष्‍टता नहीं छोड़ता, तो हम सन्यासी अपनी उदारता कैसे छोड़ सकते हैं।'' (युगप्रवर्तक महर्षि दयानन्द, पृष्‍ठ 49)
(1) इस प्रकार अपराधियों को क्षमा करना और दण्ड से छुड़वाना क्या स्वयं अपनी दार्शनिक मान्यता का खण्डन करना नहीं है?
(2) क्या स्कॉट महोदय व तहसीलदार आदि दुष्‍टों को दण्ड देने वालों से दुष्‍टों को छोड़ने की सिफारिश करना उनको राजधर्म के पालन करने से रोकना नहीं है। जिसकी वजह से दुष्‍टों का उत्साह बढ़ा होगा और वे अधिक पाप करने में प्रवृत्त हुए होंगे?
(3) क्या दयानन्द जी ने न्याय और दया को नष्‍ट नहीं कर दिया?
(4) क्या इस पाप कर्म की वृद्धि का बोझ दयानन्द जी पर नहीं जाएगा?
(5) क्या इस बात की संभावना नहीं है कि इसी प्रकार के आचरण को देखकर जगन्नाथ पाचक ने सोचा होगा कि अव्वल तो मैं पकड़ा नहीं जाऊंगा और यदि पकड़ा भी गया तो कौन सा स्वामी जी दण्ड दिलाते हैं, ''हाथ जोड़ने आदि चेष्‍टा'' करके बच जाऊंगा और स्वामी जी की क्षमा करने की इसी आदत ने उस हत्यारे का उत्साह बढ़ाया हो?
(6) दयानन्द जी ने अपनी दार्शनिक मान्यता के विपरीत जाकर अपने हत्यारे को क्यों क्षमा कर दिया?
(7) क्या अपने आचरण से उन्होंने अपने विचारों को निरर्थक और महत्वहीन सिद्ध नहीं कर दिया?
(8) `संसार के हित को भारी हानि पहुंचाने वाले´ दुष्‍ट हत्यारे को क्षमा करने का अधिकार तो स्वयं संसार को भी नहीं है बल्कि यह अधिकार तो दयानन्द जी ईश्वर के लिए भी स्वीकार नहीं करते। फिर स्वयं किस अधिकार से एक दुष्‍ट हत्यारे को क्षमा करके रूपये देकर उसे भाग जाने का मशविरा दिया?
(9) क्या एक दुष्‍ट हत्यारे को समाज में खुला छोड़कर उन्होंने एक अपराधी के उत्साह को नहीं बढ़ाया और पूरे समाज को खतरे में नहीं डाला?
उनके इस प्रकार के स्वकथन विरूद्ध आचरण से उनकी अन्य दार्शनिक मान्यताएं भी संदिग्‍ध हो जाती हैं।
`नामस्मरण इस प्रकार करना चाहिए-जैसे `न्यायकारी´ ईश्वर का एक नाम है। इस नाम से जो इसका अर्थ है कि जैसे पक्षपात रहित होकर परमात्मा सबका यथावत न्याय करता है वैसे उसको ग्रहण कर न्याययुक्त व्यवहार सर्वदा करना, अन्याय कभी न करना। इस प्रकार एक नाम से भी मनुष्‍य का कल्याण हो सकता है।´ (सत्यार्थप्रकाश, एकादश., पृष्‍ठ 210)
`इससे फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं वैसे अपने गुण, कर्म, स्वभाव अपने भी करना है। जैसे वह न्यायकारी है तो आप भी न्यायकारी होवे। और जो केवल भांड के समान परमेश्वर के गुणकीर्तन करता जाता और अपने चरित्र नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्थ है।´ (सत्यार्थप्रकाश, सप्तम., पृष्‍ठ 120)
(10) जब न्यायकारी ईश्वर दुष्‍टों को क्षमा न करके दण्ड देता है तो दयानन्दजी ने ईश्वर का गुण `न्यायकारी´ स्वयं क्यों ग्रहण नहीं किया?
(11) अगर ईश्वर के गुण कर्म स्वभाव के विपरीत चलते हुए उसकी स्तुति आदि करना दयानन्द जी की दृष्टि में भांड के समान व्यर्थ चेष्‍टा है तो क्या दयानन्द जी की स्तुति व उपासना आदि भी व्यर्थ और निष्‍फल ही थी?
(12) यदि दयानन्दजी परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव जैसे अपने गुण, कर्म, स्वभाव नहीं बना पाये थे तो क्या वह परमेश्वर को प्राप्त हो पाए होंगे जबकि उनके पास `सीढ़ी´ भी नहीं थी?
अः सीढ़ी टूटी हो तो परमेश्वर नहीं मिलता
माता, पिता, आचार्य, अतिथि और पुरुष के लिए पत्नी की अहमियत बताते हुए स्वामी जी कहते हैं- `ये पाँच मूर्तिमान् देव जिनके संग से मनुष्‍यदेह की उत्पित्त, पालन, सत्यशिक्षा, विद्या और सत्योपदेश को प्राप्ति होती है। ये ही परमेश्वर को प्राप्त होने की सीढ़ियाँ हैं।´ (सत्यार्थप्रकाश, एकादशसमुल्लास, पृष्‍ठ 216)
माता-पिता को छोड़कर तो वो खुद ही भागे थे। विवाह उन्होंने किया नहीं इसलिए पत्नी भी नहीं थी। वो खु़द दूसरों पर आश्रित थे और न ही कभी उन्होंने कुछ कमाया तो अतिथि सेवा का मौका भी उन्होंने खो दिया। सीढ़ी के चार पाएदान तो उन्होंने खुद अपने हाथों से ही तोड़ डाले। आचार्य की सेवा उन्होंने ज़रुर की, लेकिन कभी-कभी ऐसा कुछ कर जाते थे कि या तो आचार्य पाठशाला से उनका नाम ही काट देता था या जितना ज्यादा ज़ोर से हो सकता था उनके डण्डा जमा देता था, जिनके निशान उनके शारीर पर हमेशा के लिए छप जाते थे। इसी टूटी सीढ़ी के कारण उन्हें परमेश्वर तो मिला ही नहीं, कोई अच्छा शिष्‍य भी नहीं मिल पाया। वे स्वयं कहा करते थे-
मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ कि मुझे इस जन्म में सुयोग्य शिष्‍य नहीं मिलेगा। इसका प्रबल कारण यह भी है कि मैं तीव्र वैराग्यवश बाल्यकाल में माता पिता को छोड़कर सन्यासी बन गया था´। (युगप्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती, पृ. 121)
भारत को विश्वगुरु के महान पद से गिराने में ऐसे जिज्ञासु परन्तु अज्ञानी लोगों का बहुत बड़ा हाथ है। जो पहले तो अपनी सीढ़ी तोड़ बैठे और फिर जीवन भर खु़द भी भटकते रहे और दूसरों को भी भटकाते रहे। स्वामी जी जैसे लोगों के जीवन से शिक्षा लेकर लोगों को अपनी सीढ़ी की रक्षा करनी चाहिए और अपनी सीढ़ी तोड़ चुके लोगों को अपना गुरु भी नहीं बनाना चाहिए।
क्या दयानन्द जी की अविद्या रूपी गाँठ कट गई थी?
भिद्यते हृदयग्रिन्थरिद्दद्यन्ते सर्वसंशया: ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तिस्मनदृष्टि परा·वरे ।।1।।मुण्डक।।
जब इस जीव के हृदय की अविद्या रूपी गांठ कट जाती, सब संशय छिन्न होते और दुष्‍ट कर्म क्षय को प्राप्त होते हैं। तभी उस परमात्मा जो कि अपने आत्मा के भीतर और बाहर व्याप रहा है, उसमें निवास करता है। (सत्यार्थ प्रकाश, नवम0, पृश्ठ 171)
ईश्वर का सामीप्य पाने के लिए यहां तीन बातों पर बल दिया गया है-
(1) जीव के हृदय की अविद्या रूपी गांठ कट जाती है।
(2) सब संशय छिन्न होते हैं।
(3) सब दुष्‍ट कर्म क्षय को प्राप्त होते हैं।
(13) क्या हम कह सकते हैं कि दयानन्दजी ने दुष्‍टों को क्षमा करके और उन्हें तहसीलदार आदि अधिकारियों के दण्ड से छुड़वाकर दुष्‍टों का उत्साह वर्धन किया? यदि यह सही है तो दयानन्दजी में उपरोक्त तीसरे बिन्दु वाली विशेषता दृष्टि गोचर नहीं होती ।
(14) न ही उनके सब संशय छिन्न हो सके थे क्योंकि वह स्वयं ही तो एक सिद्धान्त निश्चित करते हैं और जब आर्य सभासद उसका पालन करते हैं तो स्वयं ही उन्हें दुष्‍टों को दण्ड न देने की बात कहते हैं। यह उनके संशयग्रस्त होने का स्पष्‍ट उदाहरण है या नहीं?
(15) क्या यह अविद्या की बात न कही जाएगी कि सारे जगत को एक आदमी उस बात का उपदेश करे जिस पर न तो स्वयं उस को विश्वास हो और न ही उस पर आचरण करे जैसे कि उपरोक्त दुष्‍टों को क्षमा न करने का उपदेश करना और स्वयं लगातार क्षमा करते रहना?
क्या दयानन्द जी वेदों का वास्तविक अर्थ जानते थे?
(16) यदि दयानन्द जी की अविद्या रूपी गांठ ही नहीं कट पायी थी और वह परमेश्वर के सामीप्य से वंचित ही रहकर चल बसे थे तो वह परमेश्वर की वाणी `वेद´ को भी सही ढंग से न समझ पाये होंगे? उदाहरणार्थ, दयानन्दजी एक वेदमन्त्र का अर्थ समझाते हुए कहते हैं-
`इसीलिए ईश्वर ने नक्षत्रलोकों के समीप चन्द्रमा को स्थापित किया।´ (ऋग्वेदादि0, पृष्‍ठ 107)
(17) परमेश्वर ने चन्द्रमा को पृथ्वी के पास और नक्षत्रलोकों से बहुत दूर स्थापित किया है, यह बात परमेश्वर भी जानता है और आधुनिक मनुष्‍य भी। फिर परमेश्वर वेद में ऐसी सत्यविरूद्ध बात क्यों कहेगा?
इससे यह सिद्ध होता है कि या तो वेद ईश्वरीय वचन नहीं है या फिर इस वेदमन्त्र का अर्थ कुछ और रहा होगा और स्वामीजी ने अपनी कल्पना के अनुसार इसका यह अर्थ निकाल लिया । इसकी पुष्टि एक दूसरे प्रमाण से भी होती है, जहाँ दयानन्दजी ने यह तक कल्पना कर डाली कि सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रादि सब पर मनुष्‍यदि गुज़र बसर कर रहे हैं और वहाँ भी वेदों का पठन-पाठन और यज्ञ हवन, सब कुछ किया जा रहा है और अपनी कल्पना की पुष्टि में ऋग्वेद (मं0 10, सू0 190) का प्रमाण भी दिया है-
`जब पृथिवी के समान सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र वसु हैं पश्चात उनमें इसी प्रकार प्रजा के होने में क्या सन्देह? और जैसे परमेश्वर का यह छोटा सा लोक मनुश्यादि सृष्टि से भरा हुआ है तो क्या ये सब लोक शून्‍य होंगे? (सत्यार्थ., अश्टम. पृ. 156)
(18) क्या यह मानना सही है कि ईश्वरोक्त वेद व सब विद्याओं को यथावत जानने वाले ऋषि द्वारा रचित साहित्य के अनुसार सूर्य व चन्द्रमा आदि पर मनुष्‍य आबाद हैं और वो घर-दुकान और खेत खलिहान में अपने-अपने काम धंधे अंजाम दे रहे हैं?
क्या परमेश्वर भी कभी असफल हो सकता है?
`परमेश्वर का कोई भी काम निष्‍प्रयोजन नहीं होता तो क्या इतने असंख्य लोकों में मनुष्‍यादि सृष्टि न हो तो सफल कभी हो सकता है? (सत्यार्थ0, अश्टम0 पृ0 156)
(19) स्वामी जी ने परमेश्वर की सफलता को सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्रों पर मनुष्‍यादि के निवास पर निर्भर समझा है। इन लोकों में अभी तक तो किसी मनुष्‍यादि प्रजा का पता नहीं चला, तो क्या परमेश्वर को असफल और निष्‍प्रयोजन काम करने वाला समझ लिया जाये? या यह माना जाए कि स्वामी जी इन सब लोकों की उत्पत्ति से परमेश्वर के वास्तविक प्रयोजन को नहीं समझ पाए?
अत: ज्ञात हुआ कि स्वामी जी ईश्वर, जीव और प्रकृति के बारे में सही जानकारी नहीं रखते थे। एक ‘शोधकर्ता को यह शोभा नहीं देता कि वह वेदों के वास्तविक मन्तव्य को जानने समझने के बजाए उनके भावार्थ के नाम पर अपनी कल्पनाएं गढ़कर लोगों को गुमराह करे ।
स्वामी जी की कल्पना और सौर मण्डल ''इसलिए एक भूमि के पास एक चन्द्र और अनेक चन्द्र अनेक भूमियों के मध्य में एक सूर्य रहता है।'' (सत्यार्थप्रकाश, पृश्ठ 156)
यह बात भी पूरी तरह ग़लत है। स्वामी जी ने सोच लिया कि जैसे पृथ्वी का केवल एक उपग्रह `चन्द्रमा´ है। इसी तरह अन्य ग्रहों का उपग्रह भी एक-एक ही होगा। The Wordsworth Encylopedia, 1995 के अनुसार ही मंगल के 2, नेप्च्यून के 8, बृहस्पति के 16 व शानि के 20 उपग्रह खोजे जा चुके थे। आधुनिक खोजों से इनकी संख्या में और भी इज़ाफा हो गया ।
सन् 2004 में अन्तरिक्षयान वायेजर ने दिखाया कि शानि के उपग्रह 31 से ज्यादा हैं। (द टाइम्स ऑफ इण्डिया, अंक 2-07-04, मुखपृष्‍ठ) इसके बाद की खोज से इनकी संख्या में और भी बढ़ोतरी हुई है। अंतरिक्ष अनुसंधानकर्ताओं ने ऐसे तारों का पता लगाया है जिनका कोई ग्रह या उपग्रह नहीं है।
‘PSR 1913+16 नामक प्रणाली में एक दूसरे की परिक्रमा करते हुए दो न्यूट्रॉन तारे हैं।´ (समय का संक्षिप्त इतिहास, पृष्‍ठ 96, ले. स्टीफेन हॉकिंग संस्करण 2004, प्रकाषक: राजकमल प्रकाशन प्रा. लि0, नई दिल्ली-2)
`खगोलविदों ने ऐसी कई प्रणालियों का पता लगाया है, जिनमें दो तारे एक दूसरे की परिक्रमा करते हैं। जैसे CYGNUS X-1सिग्नस एक्स-1´ (पुस्तक उपरोक्त, पृष्‍ठ 100)
(20) वेदों में विज्ञान सिद्ध करने के लिए स्वामी जी ने जो नीति अपनाई है उससे वेदों के प्रति संदेह और अविश्वास ही उत्पन्न होता है। क्या इससे खुद स्वामी जी का विश्वास भी ख़त्म नहीं हो जाता है?
आकाश में सर्दी-गर्मी होती है, सर्दी से परमाणु जम जाते हैं, भाप से मिलकर किरण बलवाली होती है ।
........ क्योंकि आकाश के जिस देश में सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी की छाया रोकती है, उस देश में शीत भी अधिक होती है। ...... फिर गर्मी के कम होने और शीतलता के अधिक होने से सब मूर्तिमान पदार्थो के परमाणु जम जाते हैं। उनको जमने से पुष्टि होती है और जब उनके बीच में सूर्य की तेजोरूप किरणें पड़ती हैं तो उनमें से भाप उठती है। उनके योग से किरण भी बलवाली होती है।´ (ऋग्वेदादिभाष्‍यभूमिका पृष्‍ठ 145 व 146)
(21) सर्दी-गर्मी धरती पर होती है आकाश में नहीं और वह भी पृथ्वी द्वारा सूर्य के प्रकाश को रोकने की वजह से नहीं बल्कि सूर्य की परिक्रमा करते हुए पृथ्वी जब सूर्य से दूर होती है तो सर्दी होती है और जब अपेक्षाकृत निकट होती है तो गर्मी होती है।
(22) और न ही सर्दी से परमाणु जमते हैं। जब स्वयं बर्फ के ही परमाणु जमे हुए नहीं होते तो अन्य पदार्थो के क्या जमेंगे? पता नहीं परमाणु के सम्बन्ध में स्वामी जी की कल्पना क्या है?
(23) भाप से मिलकर प्रकाश को भला क्या बल मिलेगा? यह वेदों का कथन है या स्वयं स्वामी जी की कल्पना?
सृष्टि संरचना का वैदिक सिद्धान्त
... सबसे सूक्ष्म टुकड़ा अर्थात जो काटा नहीं जाता उसका नाम परमाणु, साठ परमाणुओं से मिले हुए का नाम अणु, दो अणु का एक द्वयणुक जो स्थूल वायु है तीन द्वयणुक का अग्नि, चार द्वयणुक का जल, पांच द्वयणुक की पृथिवी अर्थात तीन द्वयणुक का त्रसरेणु और उसका दूना होने से पृथ्वी आदि दृश्य पदार्थ होते हैं। इसी प्रकार क्रम से मिलाकर भूगोलादि परमात्मा ने बनाये हैं। (सत्यार्थ प्रकाश, अश्टम. पृ.152)
पहले माना जाता था कि परमाणु अविभाज्य है परन्तु अब परमाणु को तोड़ना संभव है। स्वयं भारत की ही धरती पर कई `परमाणु रिएक्टर´ इसी सिद्वान्त के अनुसार ऊर्जा उत्पादन करते हैं। अत: यह सृष्टि नियम के प्रतिकूल कल्पना मात्र है। दरअस्ल यह कोई वैदिक सिद्धान्त नहीं है बल्कि एक दार्शनिक मत है।
आग, पानी, हवा और पृथ्वी की संरचना का वर्णन भी विज्ञान विरूद्ध है। उदाहरणार्थ चार द्वयणुक मिलने से नहीं बल्कि हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक अणु कुल 3 अणुओं के मिलने से जल बनता है। इसी तरह पृथ्वी भी पांच द्वयणुक से नहीं बनी है बल्कि कैल्शियम, कार्बन, मैग्नीज़ आदि बहुत से तत्वों से बनी है और हरेक तत्व की आण्विक संरचना अलग-अलग है। यही हाल वायु और अग्नि का भी है। यदि स्वामी जी के मत को मान लिया जाता तो देश की सारी उन्नति ठप्प हो जाती। उनके विचार आज प्रासंगिक नहीं रह गय हैं। समय ने उन्हें रद्द कर दिया है। जिन लोगों को म्लेच्छ कहकर हेय समझा गया, देश के वैज्ञानिकों ने उन्नति करने के लिए उन्हीं का अनुकरण किया। यदि प्रकृति के विषय में अभारतीयों का ज्ञान सत्य और श्रेष्‍ठ हो सकता है तो फिर ईश्वर और जीव के विषय में क्यों नहीं हो सकता? सत्य की प्राप्ति के लिए षाठवृत्ति, भेदभाव और अहंकार का त्याग ज़रूरी है। वैसे भी सब मनु की सन्तान हैं- `जनं मनुजातं´ (ऋग्वेद 1:45:1)
`वसुधैव कुटुम्बकम्´ अर्थात् धरती के सब मनुष्‍य एक परिवार हैं ।
मा भ्राता भ्रातारं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा ।
सम्यग्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ।।
`भाई, भाई से और बहन, बहन से द्वेष न करे। एक मन और गति वाले होकर मंगलमय बात करें।´(अथर्ववेद 3:30:3)
वैमनस्य और नफरत फैलाना छोड़कर सद्भावना प्रेम, शांति, एकता, ज्ञान और उन्नति का माहौल बनाना चाहिए। अन्य देशवासी भाई बहनों के पास भी ईश्वरीय ज्ञान हो सकता है। उनसे ज्ञान प्राप्त करने में संकोच नहीं करना चाहिए। यही सर्वहितकारी और मंगलमय बात है।
सूर्य किसी लोक या केन्द्र के चारों ओर नहीं घूमता
जो सविता अर्थात सूर्य ... अपनी परिधि में घूमता रहता है किन्तु किसी लोक के चारों ओर नहीं घूमता।
(यजुर्वेद, अ033:मं. 43/सत्यार्थ0, अष्‍टम. पृ. 155)
(24) यह बात भी सृष्टि नियम के विरूद्ध है। एक बच्चा भी आज यह जानता है कि सूर्य न केवल अपनी धुरी पर बल्कि किसी केन्द्र के चारों ओर भी पूरे सौर मण्डल सहित चक्कर लगा रहा है। तब सृष्टिकर्ता परमेश्वर अपनी वाणी वेद में असत्य बात क्यों कहेगा? देखिये - `सूर्य अपनी धुरी पर 27 दिन में एक चक्कर पूरा करता है।´
(हमारा भूमण्डल, कक्षा 6, भाग 1, पृष्‍ठ 9, बेसिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश, लेखक: अंजु गौतम आदि)
`तुम्हें यह जानकर बड़ा आश्चर्य होगा कि हमारा सूर्य बड़ी तेज़ी से चक्कर लगाते हुए लगभग 25 करोड़ वर्ष में अपनी आकाशगंगा की एक परिक्रमा पूरी करता है।´ (पुस्तक उपरोक्त, पृष्‍ठ 6)
(25) स्वामी जी ने सायण, उव्वट और महीधर आदि विद्वानों को अशोभनीय शाब्द कहे और उनके वेदभाश्य को भ्रष्‍ट बताया और केवल अपने द्वारा रचित वेदार्थ को ही ठीक बताया है। स्वामी जी वेद को ईश्वरोक्त मानते थे न कि ऋषियों की रचना। ईश्वरकृत ग्रन्थ कैसा होता हैर्षो? इस सम्बन्ध में स्वामीजी ने कुछ पहचान बताई है। क्या स्वामी जी द्वारा बताये गए लक्षण वेद में पाए जाते हैं?
ईश्वरीय ग्रन्थ में झूठ नहीं होता
जैसा ईश्वर पवित्र, सर्वविद्यावित, ‘शुद्धगुणकर्मस्वभाव, न्यायकारी, दयालु आदि गुण वाला है वैसे जिस पुस्तक में ईश्वर के गुण, कर्म स्वभाव के अनुकूल कथन हो, वह ईश्वरकृत, अन्य नहीं। और जिसमें सृष्टिक्रम प्रत्यक्षादि प्रमाण आप्तों के और पवित्रात्मा के व्यवहार से विरूद्ध कथन न हो वह ईश्वरोक्त। जैसा ईश्वर का निर्भ्रम ज्ञान वैसा जिस पुस्तक में भ्रान्तिरहित ज्ञान का प्रतिपादन हो, वह ईश्वरोक्त । (सत्यार्थप्रकाश, सप्तमसमल्लास, पृष्‍ठ 135)
(26) क्या वाकई वेदों में सृष्टिक्रम प्रत्यक्षादि प्रमाण के अनुकूल निर्भ्रम ज्ञान है? जो कसौटी खुद स्वामीजी ने निश्चित की है, क्या वेद उस पर पूरे उतरते हैं?
पेड़-पौधों और सब्जि़यों में जीव नहीं होता?
`....हरित ‘शाक के खाने में जीव का मारना उनको पीड़ा पहुंचनी क्योंकर मानते हो? भला जब तुमको पीड़ा प्राप्त होती प्रत्यक्ष नहीं दिखती और जो दिखती तो हमको दिखलाओ।´ (सत्यार्थप्रकाश, दशमसमुल्लास, पृष्‍ठ 313)
(27) आज पहली क्लास का बच्चा भी जानता है कि पेड़-पौधों पर अनगिनत सूक्ष्म जीवाणु वास करते हैं और खुद पेड़-पौधे भी Living things (जीवित वस्तुओं) में आते हैं। ऐसी विज्ञान विरूद्ध मान्यतओं को ज्ञान कहा जायेगा अथवा अज्ञान?
क्या `नियोग´ की व्यवस्था ईश्वर ने दी है?
हालाँकि उन्होंने लोगों को दुर्गुणों से दूर रहने की नसीहत करके समाज का कुछ भला किया है लेकिन विधवा औरत और विधुर मर्द को अपने जीवन साथी की मौत के बाद पुनर्विवाह करने से वेदों के आधार पर रोक दिया है और बिना दोबारा विवाह किये ही दोनों को `नियोग´ द्वारा सन्तान उत्पन्न करने की व्यवस्था दी है। इस सम्बंध में सत्यार्थप्रकाश के चतुर्थसमुल्लास में पृष्‍ठ संख्या 73 से 81 तक पूरे 9 पृष्‍ठों में वेदमन्त्रों सहित पूर्ण विवरण दिया गया है। स्वामीजी के अनुसार एक विधवा स्त्री बच्चे पैदा करने के लिए वेदानुसार दस पुरूषों के साथ `नियोग´ कर सकती है और ऐसे ही एक विधुर मर्द भी दस स्त्रियों के साथ `नियोग´ कर सकता है। बल्कि यदि पति बच्चा पैदा करने के लायक़ न हो तो पत्नि अपने पति की इजाज़त से उसके जीते जी भी अन्य पुरूष से `नियोग´ कर सकती है। स्वामी जी को इसमें कोई पाप नज़र नहीं आता।
(28) क्या वाक़ई ईश्वर ऐसी व्यवस्था देगा जिसे मानने के लिए खुद वेद प्रचारक ही तैयार नहीं हैं?
ऐसा लगता है कि या तो वेदों में क्षेपक हो गया है या फिर `नियोग´ की वैदिक व्यवस्था किसी विशेष काल के लिए थी, सदा के लिए नहीं थी । ईश्वर की ओर से सदा के लिए किसी अन्य व्यवस्था का भेजा जाना अभीष्ट था। कौन सी व्यवस्था? पुनर्विवाह की व्यवस्था।
जी हाँ, केवल पुनर्विवाह के द्वारा ही विधवा और विधुर दोनों की समस्या का सम्मानजनक हल संभव है। ईश्वर ने क़ुरआन में यही व्यवस्था दी है।
क्या कोई मूर्ख व्यक्ति चतुर और निपुण हो सकता है?
(29) इसी प्रकार हालाँकि स्वामी जी ने शूद्रों को भी थोड़ी बहुत राहत पहुंचाई है लेकिन फिर भी उन्हें अन्य वर्णों से नीच ही माना है। दयानन्द जी खुद भी `शूद्र´ और उसके कार्य को लेकर भ्रमित हैं। उदाहरणार्थ - सत्यार्थप्रकाश, पृष्‍ठ 50 पर `निर्बुद्धि और मूर्ख का नाम शूद्र´ बताते हैं और पृष्‍ठ 73 पर `शूद्र को सब सेवाओं में चतुर, पाक विद्या में निपुण´ भी बताते हैं। क्या कोई मूर्ख व्यक्ति, चतुर और निपुण हो सकता है? क्या बुद्धि और कला कौशल से युक्त होते ही उसका `वर्ण´ नहीं बदल जायेगा?
(30) क्या ऊंचनीच को मानते हुए भेदभाव रहित प्रेमपूर्ण, समरस और उन्नति के समान अवसर देने वाला समाज बना पाना संभव है?
बच्चों को शिक्षा देने में भेदभाव नहीं करना चाहिए
`ब्राह्मण तीनों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैष्‍य, क्षत्रिय क्षत्रिय और वैष्‍य तथा वैश्य एक वैश्य वर्ण को यज्ञोपवीत कराके पढ़ा सकता है और जो कुलीन शुभ लक्षण युक्त शूद्र हो तो उसको मन्त्रसंहिता छोड़के सब शास्त्र पढ़ावे, शूद्र पढे़ परन्तु उसका उपनयन न करे। (सत्यार्थप्रकाश, तृतीय0 पृष्‍ठ 31)
(31) अगर बचपन में ही ऊंचनीच की दीवारें खड़ी कर दी जायेंगी तो बड़े होकर तो ये दीवारें और भी ज्यादा ऊंची हो जायेंगी, फिर समाज उन्नति कैसे करेगा?
मनु के नाम पर भेदभाव मत फैलाओ
स्त्रियों की साक्षी स्त्री, द्विजों के द्विज, शूद्रों के शूद्र और अन्त्यजों के अन्त्यज साक्षी हों ।।2।। जितने बलात्कार काम चोरी, व्याभिचार, कठोर वचन, दण्डनिपातन रूप अपराध हैं उनमें साक्षी की परीक्षा न करे और आवश्यक भी समझे क्योंकि ये काम सब गुप्त होते हैं ।। 3।।(सत्यार्थ प्रकाश, शश्ठम, 110)
गवाह की सच्चाई को परखे बिना ही आरोपी व्यक्ति को मृत्युदण्ड आदि कठोर सज़ा देना सरासर अन्याय है बल्कि इस तरह तो मामूली सज़ा देना भी उचित नहीं है। न्यायकारी व्यक्ति के लिए यह उचित नहीं है कि वह लिंग-भेद या वर्ण-भेद से काम ले। हरेक को आज़ादी होनी चाहिए कि वह अपनी सच्चाई का गवाह जिस वर्ग से लाना चाहे, ले आये ।
इस तरह की बातें जब वेद और महर्षि मनु के नाम पर फैलायी जाती हैं तो समाज मे असन्तोष और आक्रोश पैदा होता है और लोग उनकी निन्दा करके धर्म से दूर हो जाते हैं। महर्षि मनु तो मानव जाति के पिता हैं। क्या कोई पिता अपने बच्चों में ऊँचनीच की बातें पैदा करके उनका अहित करता है? बल्कि बाप की स्नेहदृष्टि अपने बच्चों में सबसे ज्यादा उस पर होती है जो सबसे ज्यादा कमज़ोर होता है।
पवित्र क़ुरआन भी उन पर लगने वाले इस आरोप का खण्डन करता है। क़ुरआन में जलप्लावन वाले मनु का वर्णन `नूह´ के नाम से मिलता है। कुरआन बताता है कि आदरणीय नूह (उन पर शांति हो) पर श्रद्धा रखने वाले ही वे लोग थे जिन्हें तत्कालीन समाज में नीच और तुच्छ समझा जाता था। समाज के तथाकथित उँचे लोगों ने आदरणीय नूह (उन पर शांति हो) पर इसी बात को लेकर ऐतराज़ भी किया लेकिन उन्होंने समाज के दलितों - वंचितों को खुद से दूर नहीं किया। देखिये -
`इस पर उसकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, कहने लगे हमारी दृष्टि में तो तुम हमारे ही जैसे आदमी हो और हम देखते हैं कि बस कुछ लोग ही तुम्हारे अनुयायी हैं जो पहली दृष्टि में ही हमारे यहाँ के नीच हैं। हम अपने मु़क़ाबले में तुम में कोई बड़ाई नहीं देखते हैं बल्कि हम तो तुम्हें झूठा समझते हैं।´ (सूरा-ए-हूद, 27)
देखिए, पवित्र कुरआन का चमत्कार! पूरी धरती पर वह अकेली किताब है जो कहती है कि मनु ने जातिवाद नहीं फैलाया जबकि यह बात उनका कोई भी अनुयायी नहीं कहता। कोई नहीं कहता कि मनु ने सबको बराबरी का दर्जा दिया। जिनको तत्कालीन समाज ने नीच समझा, सत्य को अपना कर वही श्रेष्‍ठ बने, ईश्वर के दण्ड से बचे और बाद में मानव जाति के जनक भी मनु के साथ यही लोग हुए। जिस बात को कोई नहीं कहता, कोई नहीं जानता, उसकी चर्चा कुरआन मे कैसे है? और वह भी आज से लगभग 1430 वर्ष पहले।
क्या यह सोचने का विषय नहीं है कि पवित्र कुरआन की किसी भी सूरत का नाम महामना मुहम्मद (स.) के माँ- बाप, रिश्तेदारों और साथियों में से किसी के भी नाम पर नहीं है जबकि एक सूरत का नाम `नूह´ है?
पुरे कुरआन की हजारों आयतों में महामना मुहम्मद (स0) का नाम सिर्फ 4-5 बार आया है जबकि मनु का नाम `नूह´ लगभग 45 बार आया है। न तो मक्का में नूह के अनुयायी थे कि उनका नाम लेकर उनके मानने वालों से मदद पाना वांछित हो और न ही अरब के लोग बल्कि स्वयं महामना मुहम्मद (स0) ही कुरआन के अवतरण से पहले यह सब जानते थे। ईश्वर कहता है-
`ये परोक्ष की खबरें है जिनकी हम तुम्हारी ओर प्रकाशना कर रहे हैं। इससे पहले न तो तुम्हें इनकी खबर थी और न ही तुम्हारी क़ौम को।´ (सूरा-ए-हूद,49)
महर्षि मनु का विधान लोगों की स्मृति में था जिसे उनके बाद संकलित किया गया। संकलनकर्ता ने उसमें भृगु आदि दूसरों के विचार भी शामिल कर दिये। इस तरह `मनु स्मृति´ में मिलावट होकर उसकी शिक्षाएं बिगड़ गईं। आज कोई नहीं जानता कि उसमें किस काल में किस-किस ने किसके नाम से क्या बढ़ा दिया अथवा क्या कुछ घटा दिया? दूसरों के कर्म का जिम्मेदार मनु को ठहराना अपने पिता मनु के साथ ज़ुल्म करना है।
आज ज़मीन पर जितने लोग किसी ईश्वरीय ग्रन्थ में विश्वास का दावा करते हैं वो सभी लोग अपने नबियों और ऋषियों पर आस्था के बावजूद उन पर झूठे लांछन लगाते हैं, आदम से लेकर ईसा तक, हर एक ईशदूत पर। ईसा, मूसा, लूत, और मनु सबकी शिक्षाएं बिगाड़कर रख दीं। कुरआन बताता है कि ये सभी ईश्वर के दूत थे हरेक बुराई से पाक और मासूम थे और सबने मानव जाति को एक ही धर्म की शिक्षा दी।
`उस (ईश्वर) ने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया जिसका आदेश उसने नूह को दिया था।´ (पवित्र कुरआन, अश्शूरा, 13)
यदि वास्तव में कोई मनु का धर्म जानना चाहता है तो वह पवित्र कुरआन में उनका वृतान्त पढ़ ले और यदि वेद के गूढ़ अर्थों को समझना चाहता है तो उन्हें पवित्र कुरआन की स्पष्‍ट शिक्षाओं के आधार पर समझने का प्रयास करे। जो लोग अपने अहंकार के कारण पवित्र कुरआन की सत्यता को नहीं मानते वास्तव में वो वास्तविक वेदार्थ तक पहुंचने के एकमात्र प्रामाणिक साधन से स्वयं को वंचित करते हैं।
`बुद्धिहीन लोग ग्रन्थ देखते हुए नहीं देखते और सुनते हुए नहीं सुनते।´ (ऋग्वेद 10:71:4)
`और उनके पास आँखें हैं वे उनसे देखते नहीं और उनके पास कान हैं वे उनसे सुनते नहीं वे पशुओं की तरह हैं।´ (पवित्र कुरआन 7:179)
धरती का एकमात्र अजर अमर और अक्षय ग्रन्थ
पवित्र कुरआन अपनी सच्चाई का सबूत खुद ही है। हज़ारों साल में धरती के मनुष्‍यों ने करोड़ों किताबें लिखी हैं। जो समय गुज़रने के बाद या तो पूरी तरह मिट गईं या उनमें कुछ घटा-बढ़ा दिया गया है। आज भी जब कोई लेखक किसी विषय पर कोई किताब लिखता है तो उसके द्वितीय संस्करण में स्वयं ही फेरबदल करने पर मजबूर हो जाता है ।
सारी धरती पर मौजूद करोड़ों किताबों के बीच में पवित्र कुरआन ही एकमात्र ऐसी अक्षय और अजर अमर किताब है, जो आज भी उसी रूप में है जैसी कि वह बिल्कुल शुरू में थी उसका दूसरा एडीशन नहीं है। 1400 वर्ष से भी ज्यादा समय बीतने के बावजूद भी वह अपने मूल और शुद्ध रूप में सबको उपलब्ध है। उसमें न तो कुछ बढ़ाया जा सकता है और न ही घटाया जा सकता है। करोड़ों लोग उसे रोज़ाना पढ़ते हैं और लाखों लोगों ने उसे कण्ठस्थ कर रखा है। ऐसी अजर अमर किताब, एक अजर अमर ईश्वर की ओर से ही संभव है।
इसकी आयतों में मनुष्‍य के मन में उठने वाले सभी प्रश्नों और उसे पेश आने वाली सभी समस्याओं का हल तर्क और ज्ञान के आधार पर सरल रूप में पेश किया गया है। व्यक्ति और समाज को व्यक्तिगत और सामूहिक रूप में नैतिकता, अध्यात्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था, मनोविज्ञान और प्रत्येक क्षेत्र में साफ़ और सीधे निर्देश दिए गए हैं, जिन्हें नज़रअन्दाज करके उन्नति और कल्याण संभव ही नहीं है। धरती, मौसम और मनुष्‍य के जन्म के सम्बन्ध में जितनी बातें बताई गई हैं, आज आधुनिक विज्ञान ने उनकी सत्यता को स्वीकार किया है। अर्थव्यवस्था पर पवित्र कुरआन के नियम आज दुनिया को मार्ग दिखा रहे हैं। दुनिया के अर्थशास्त्री मान रहे हैं कि विश्व की अर्थव्यवस्था को मन्दी से उबारने के लिए एकमात्र उपाय कुरआन की ब्याज रहित अर्थव्यवस्था को अपनाना है
`यह अनुस्मरण (कुरआन) निश्चय ही हमने अवतरित किया है और हम स्वयं इसके रक्षक है।´ (सूरा अल-हिज्र,9)
क़ुरआन दयालु पालनहार की ओर से एक Reminder है, जो अपने से पूर्व अवतरित `ज्ञान´ की पुष्टि करता है। जिसका रक्षक ईश्वर है। कुरआन में प्राचीन ऋषियों-नबियों का चरित्र और उनका धर्म सुरक्षित है। इस प्रकार ईश्वर ने मानवता के लिए अपने धर्म की पुनर्स्‍थापना
भी की है और अपने धर्मप्रचारक ऋषियों पर लगने वाले झूठे आरोपों का निराकरण भी कर दिया है। इसी के साथ उसने अपनी दया से धर्मज्ञान भुला चुके राष्‍ट्रों को फिर से एक मौक़ा दिया है जिसके ज़रिये वो अपने-अपने ऋषियों के सिद्धान्त और व्यवहार को जान सकते हैं और उन्हें अपनाकर अपने जन्म का उद्देश्य पूरा कर सकते हैं। ऐसा महान और सुरक्षित ज्ञान, पवित्र कुरआन जब मनु को निर्दोष निष्‍पाप और समाज में बराबरी देने वाला बताता है तो क़ुरआन के कथन को स्वीकारने में हिचकिचाहट क्यों?
आवागमन कैसे संभव है?
इन्सान के लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि मरने के बाद जीवात्मा के साथ क्या होता है? यही बात इन्सान को बुरे कामों से बचकर नेक काम करने की प्रेरणा देती है। प्रत्येक को अपने ‘शुभ-अशुभ कर्मों का फल भोगना है लेकिन किस दशा में? वैदिक धर्म में स्वर्ग-नरक की मान्यता पाई जाती है। जिसका खण्डन करके बाद में आवगमन की कल्पना प्रचलित की गई। स्वामी जी ने स्वर्ग-नरक को अलंकार बताया और आवगमन की कल्पना का प्रचार किया। उन्होंने बताया कि मोक्ष प्राप्त आत्मा भी एक निश्चित अवधि तक मुक्ति-सुख भोगने के बाद जन्म लेती है और पापी मनुष्‍यों की आत्माएं भी कर्मानुसार अलग-अलग योनियों में जन्म लेती हैं।
आवागमन की कल्पना सिर्फ इस अटकल पर खड़ी है कि सब बच्चे बचपन में एक जैसे नहीं होते। कोई राजसी शासान से पलता है और कोई गरीबी, भूख और बीमारी का शिकार हो जाता है। ऐसा क्यों होता है? क्या ईश्वर अन्यायी है, जो बिना कारण ही किसी को आराम और किसी को कष्‍ट देता है? क्योंकि ईश्वर न्यायकारी है इसलिए इनके हालात में अन्तर का कारण भी इनके ही कर्मों को होना चाहिए और क्योंकि इनके वर्तमान जन्म में ऐसे कर्म दिखाई नहीं देते तो जरुर इस जन्म से पहले कोई जन्म रहा होगा। यह सिर्फ एक अटकल है हकीकत नहीं। एक मनुष्‍य जब कोई पाप या पुण्य का कर्म करता है तो उसके हरेक कर्म का प्रभाव अलग-अलग पड़ता है और उसके कर्म से प्रभावित होकर दूसरे बहुत से लोग भी पाप पुण्य करते हैं और फिर उनका प्रभाव भी दूसरों पर और भविष्‍य की नस्लों पर पड़ता है। यह सिलसिला प्रलय तक जारी रहेगा। इसलिये प्रलय से पहले किसी मनुष्‍य के कर्म के पूरे प्रभाव का आकलन संभव नहीं है। इसलिए किसी को प्रलय से पहले ही उसके कर्मों का बदला देना सम्भव नहीं है और यदि किसी को बदला दिया जाता है तो यह अन्याय कहलायेगा। फिर भी अगर मान लिया जाए कि एक पापी मनुष्‍य को उसके पापों की सज़ा भुगतने के लिए पशु-पक्षी आदि बना दिया जाता है तो जब उसकी सज़ा पूरी हो जायेगी तो उसे किस योनि में जन्म दिया जाएगा? क्योंकि मनुष्‍य योनि तो बड़े पुण्य के फलस्वरूप मिलती है। इसलिए मनुष्‍य योनि मे तो जन्म संभव नहीं है और पशु-पक्षी आदि की योनियों मे उसे भेजना भी न्यायोचित नहीं है क्योंकि अपने पापकर्मो की पूरी सज़ा वह भुगत चुका है।
(32) मोक्ष प्राप्त आत्मा के जन्म के विष्‍य में भी यही प्रश्न उठता है। एक निश्चित अवधि तक मुक्ति सुख भोगने के बाद मोक्ष प्राप्त आत्मा जन्म लेती है, लेकिन प्रश्न यह है कि किस योनि में लेती है?
(33) पाप तो उसने किया ही नहीं था और पुण्य का फल भी उसके पास अब शेष नहीं था। नियमानुसार ईश्वर उसे न तो पशु-पक्षी बना सकता है और न ही मनुष्‍य। क्या न्यायकारी परमेश्वर जीव को बिना किसी कर्म के पशु-पक्षी या मनुष्‍य की योनि में जन्म दे सकता है?
(34) यदि यह मान भी लिया जाये कि दोनों को नई शुरूआत मनुष्‍य योनि से कराई जाएगी तो फिर बचपन में जब वो भूख, प्यास और मौसम आदि के स्वाभाविक कष्‍ट झेलेंगे तो इन कष्‍टों के पीछे क्या कारण माना जाएगा, क्योंकि पाप तो दोनों के ही शून्य हैं।
इस तरह आवागमन की कल्पना से जिस समस्या का समाधान निकालने की कोशिश की गई। वह समस्या तो ज्यों की त्यों रही और मरने के बाद वास्तव में जो होता है, उससे अनजान रहने के कारण जीव को बहुत सा कष्‍ट उठाना पड़ता है।
आवागमन: अज्ञानी की मूल पहचान
`परलोक में स्वर्ग नरक है।´ यह सत्य है जिसे धार्मिक जन सदा से मानते आये हैं। आवागमन एक मिथ्या कल्पना है जिसे उपनिषद काल में दार्शनिकों ने अपने मन से गढ़ा था। `पुनर्जन्म´ का अर्थ है `दूसरी बार जन्म होना´ जोकि परलोक से सम्बन्धित है और सत्य है। जबकि आवागमन इसी दुनिया में बारम्बार जन्म लेने की वेदविरुद्ध और झूठी मान्यता का नाम है। इसके समर्थन में वेदों में कोई सूक्त अथवा अध्याय नहीं पाया जाता। धार्मिक और दार्शनिक, दोनों व्यक्तियों के बीच सच और झूठ का अन्तर स्पश्ट करने वाला यह प्रमुख लक्षण है।
किसी व्यक्ति को उसका जुर्म बताए बग़ैर और उसे अपनी सफाई का मौक़ा दिए बग़ैर सज़ा देना `प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त´ के खिलाफ़ है। ऐसा करना जु़ल्म है और ईश्वर ज़ालिम नहीं है। जो लोग ऐसा मानते हैं वो लोग अज्ञान के कारण ईश्वर पर आरोप लगाते हैं।
यह वेदों के साथ सरासर अन्याय है कि नाम तो वेदों का लिया जाता है लेकिन पेश दर्शन को किया जाता है। इस मामले में अद्वैतवादी सनातनी और त्रैतवादी आर्य दोनों समान हैं। दर्शन की ग़लतियां खुलने से लोगों का विश्वास धर्म से भी उठ जाता है। अत: यह रीति उचित नहीं है।
क्या मुक्ति संभव है?
यदि मुक्ति के लिए पूरे जीवन में पाप न करना अनिवार्य नियम है तो फिर किसी मनुष्‍य को मुक्ति मिलना संभव नहीं है। किसी और को तो मुक्ति क्या मिलेगी जबकि इस नियम की कल्पना करने वाले खुद स्वामी जी को ही मुक्ति मिलना संभव नहीं है हालांकि उनका दावा था कि मैं संसार को कैद कराने नहीं, कैद से छुड़ाने आया हूँ लेकिन जो खुद ही मुक्ति न पा सकता हो वह दूसरे को कैसे मुक्ति दिला सकता है? इससे पता चलता है कि उनके दावों में कोई सच्चाई नहीं थी।
(35) जब महर्षि के स्तर के आदमी को ही मुक्ति न मिल पाये तो क्या बेचारे साधारण जीवों को मुक्ति की उम्मीद करना व्यर्थ नहीं है?
लोगों को क्षमा और मुक्ति से निराश करने का परिणाम यह हुआ कि लोगों की दिलचस्पी दयानन्दी दर्शन में कम हो गई और आर्य समाज मन्दिर रविवार को भी सूने से रहने लगे। लोग इधर-उधर उम्मीद की किरण ढूंढने लगे। यहाँ तक कि खुद आर्य समाज के सभासदों की पित्नयाँ और बच्चे भी मूर्ति-पूजक, वेदान्ती और अन्य मत वाले हो गए।
अन्य धर्मग्रन्थों की समीक्षा की निरर्थक चेष्‍टा
(36) जिस ज्ञान को, वैदिक साहित्य को उन्होंने जीवन भर पठन पाठन में रखा और स्वयं को उसका विशेषज्ञ घोषित कर दिया, जब वो उसी को नहीं समझ पाए तो अन्य धर्मो के जिन ग्रन्थों की मूल भाषा का ज्ञान भी उन्हें नहीं था और जहाँ तहाँ से जैसे-तैसे अनुवाद देखकर जल्दबाज़ी में उनकी समीक्षा कर डाली तो क्या वह सारी समीक्षाएँ स्वयं ही व्यर्थ होकर निरस्त नहीं हो जातीं?
जो बात उन्होंने जैनियों आदि के साहित्य के विषय में कही है वह स्वयं उन पर भी सटीक बैठती है।
`इसलिये जैसे एक हण्डे में चुड़ते चावलों में से एक चावल की परीक्षा करने से कच्चे व पक्के हैं सब चावल विदित हो जाते हैं। ऐसे ही इस थोड़े से लेख से सज्जन लोग बहुत सी बातें समझ लेंगे। बुद्धिमानों के सामने बहुत लिखना आवश्यक नहीं।´ (सत्यार्थप्रकाष, द्वादश. पृष्‍ठ 319)
`जिनको विद्या नहीं होती वे पशु के समान यथा तथा बर्डाया करते हैं। जैसे सिन्नपात ज्वरयुक्त मनुष्‍य अण्ड बण्ड बकता है वैसे ही अविद्वानों के कहे वा लेख को व्यर्थ समझना चाहिये। (सत्यार्थप्रकाश, सप्तम. पृष्‍ठ 134)
`जो अविश्वासी, अपवित्रात्मा, अधर्मी मनुष्‍यों का लेख होता है उस पर विश्वास करना कल्याण की इच्छा करने वाले मनुष्‍य का काम नहीं।´ (सत्यार्थप्रकाश, त्रयोदशसमुल्लास, पृष्‍ठ 345)
ऋषि कौन होता है?
`अर्थ-ऋषि कैसे होते हैं?, जो धर्म को साक्षात करने वाले आप्त पुरूष होते हैं, जो सब विद्याओं को यथावत् जानते हैं।´ (ऋग्वेदादिभाश्यभूमिका, पृष्‍ठ 10)
ज्ञान किसे कहते हैं?
`यथार्थदर्शनं ज्ञानमिति´ जिसका जैसा गुण, कर्म, स्वभाव हो उस पदार्थ को वैसा ही जानकर मानना ही ज्ञान और विज्ञान कहलाता है और उससे उल्टा अज्ञान। (सत्यार्थ प्रकाश, सप्तम., पृष्‍ठ 125)
(37) क्या ईश्वर, जीव, प्रकृति, परमाणु, ब्रह्माण्ड, किरण, मौसम, वेद, मनुस्मृति, शूद्र, नियोग, न्याय, शिक्षा, आवागमन और सूर्यादि पर मुनष्‍यों के बसे होने की कल्पनाओं को सामने रखते हुए यह कहा जा सकता है कि स्वामीजी को सब विद्याओं का यथावत ज्ञान था?
(38) यदि उन्हें सब विद्याओं का यथावत ज्ञान नहीं था तो क्या उन्हें ऋषि बल्कि महर्षि कहना उचित है?
ऐसा नहीं है कि दयानन्दजी अपनी वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं थे। एक बार एक आदमी ने जब उन्हें ऋषि कहा तो उन्होंने उसे यह कहा था - वत्स, यदि मैं महर्षि कणाद, जैमिनी के समय में होता तो, मैं पंडित ही कहलाता। ऋषियों के अभाव में मुझे लोग महर्षि कहते हैं। (युगप्रवर्तक महर्षि, पृष्‍ठ, 128)
अ सत्य को स्वीकारना बड़े साहस का काम है
`मनुष्‍य का आत्मा सत्यासत्य का जानने वाला है अपने प्रयोजन की सिद्धि, हठ, दुराग्रह और अविद्यादि दोशों से सत्य को छोड़ असत्य में झुक जाता है।´ (सत्यार्थप्रकाश, भूमिका, पृष्‍ठ 2)
कृपया अपनी अन्तरात्मा की आवाज़ सुनें, अपनी आत्मा का हनन न करें अन्यथा ईश्वर की ओर से दण्डस्वरूप कठोर यातना भोगनी पड़ेगी । वेद आज्ञा स्पष्‍ट है- `स्वयं यजस्व स्वयं जुशस्व´ तू ही कर्म कर और तू ही उसका फल भोग। (यजुर्वेद 3:15)
`जो मनुष्‍य जीते हुए अपनी आत्मा का हनन करते हैं वे मरने के बाद अंधकारमय असुरों के लोक को जाते हैं।´ (यजुर्वेद 40:3)
सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का क्या करें?
`जो कोई इन मिथ्या ग्रन्थों से सत्य का ग्रहण करना चाहे तो मिथ्या भी उसके गले लिपट जावे। इसलिए `असत्यमिश्रं सत्यं दूरतस्याज्यमिति´ असत्य से युक्त ग्रन्थस्थ सत्य को भी वैसे छोड़ देना चाहिये जैसे विशयुक्त अन्न को। (सत्यार्थप्रकाश, तृतीय0 पृष्‍ठ 48) जिन किताबों में सच के साथ झूठ भी मिला होता था उन्हें स्वामी बिरजानन्द जी नदी में फिकवा दिया करते थे। स्वयं दयानन्द जी का आचरण भी यही था और इसी की शिक्षा उन्होंने अपने मानने वालों को दी है। अब यही हाल उनके साहित्य का है तो अपने मानने वालों के लिए उनका आदेश है कि
`थोड़ा सत्य तो है परन्तु इसके साथ बहुत सा असत्य भी है इससे `विशसम्पृक्तान्नवत् त्याज्या:´ जैसे अत्युत्तम अन्न विष से युक्त होने से छोड़ने योग्य होता है वैसे ये ग्रन्थ हैं।´ (सत्यार्थप्रकाश, तृतीय0 पृष्‍ठ 48)
(39) क्या वेदमतानुयायी अपने गुरू के पद्चिन्हों पर चलते हुए दयानन्दकृत साहित्य के साथ भी ऐसा करना पसन्द करेंगे अथवा नहीं?
स्वामी जी को सफलता नहीं मिली
स्वामी जी ने समाज में जो बुराई देखी, अपनी जान को खतरे में डालकर उसका विरोध किया और यह कहने का साहस किया कि हिन्दू समाज धर्म के नाम पर पाखण्ड, भ्रष्‍टाचार और नैतिक पतन का शिकार हो गया है। वह ईश्वर के वास्तविक स्वरूप और धर्म के मर्म से वंचित हो गया है। लेकिन अगर समग्र दृष्टि से देखा जाये तो दयानन्द जी अपने कथन और उद्देश्य को पूरा करने में सफल नहीं हो पाए क्योंकि उनको न तो कोई `योगी गुरु´ मिला और न ही उन्हें `सच्चे शिव´ के दर्शन हुए, जिसके लिए वो घर से निकले थे। वेदों को भी वो समझ नहीं पाए और संसार के क़ैदखाने से भी किसी को मुक्ति न दिला सके बल्कि खुद ही मुक्ति न पा सके। अपने समाज के पाखण्डियों से उन्होंने संघर्ष किया। जिसके नतीजे में उन्हें अपने प्राण गंवाने पड़े। उनका वेदभाष्‍य भी अधूरा ही रह गया। दूसरा जन्म लेकर उसे पूरा करने की बात उन्होंने कही लेकिन दूसरा जन्म भी वो यहां नहीं ले पाए क्योंकि आवागमन होता नहीं है। उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की लेकिन वह भी अपनी स्थापना के उद्देश्य से भटक गया है- `किन्तु हमारी शिरोमणि सभा अभी तक हठतावश मयासुर के मार्ग पर चल रही है।´ (उपक्रमणिका, ऋग्वेदादिभाश्यभूमिका, पृष्‍ठ 8)
सच्चे गुरु की खोज : वर्तमान समाज की ज़िम्मेदारी
यदि कोई आदमी वह सत्य पाना चाहता है जो उसे प्राप्त नहीं है तो पहले उसे वह सत्य स्वीकारना पड़ेगा जो उसे उपलब्ध है। और यह सत्य स्पष्‍ट है कि वेदों को न तो `निरूक्त´ के आधार पर समझा जा सकता है और न ही परम्परा के आधार पर। वो एक ऐसी पहेली हैं जिन्हें केवल वही सुलझा सकता है जिसने उन्हें रचा है। यदि वेद ईश्वरोक्त हैं तो भी कोई मनुष्‍य उनके रहस्य को अपनी बुद्धि की अटकल के बल पर नहीं सुलझा सकता और यदि वह ऋषियों की रचना हैं तो भी उन्हें सुलझाने के लिए एक ऋषि चाहिये अर्थात् एक ऐसा व्यक्ति जो सब विद्याओं को यथावत जानता हो। ऋषि चाहे वेद के दृष्‍टा हों अथवा सृष्‍टा लेकिन यह सत्य है कि वेदों का प्रचार ऋषियों ने ही किया है। आज यदि वेदों के मन्तव्य में कहीं उलझाव और अस्पष्‍टता है तो उसे सुलझाने के लिए कोई दार्शनिक नहीं बल्कि एक ऋषि चाहिए। एक ऋषि की, एक गुरू की ज़रूरत मानव मात्र को हमेशा से रही है और आज भी है।
वह कौन हो सकता है? यह तो बहरहाल खोज का विषय है लेकिन यह प्रमाणित हो चुका है कि स्वामी दयानन्द जी इस ज़रूरत को पूरा नहीं कर सकते। उनके जीवन के कटु अनुभवों और वेदार्थ को समझ पाने में उनकी और उनसे पूर्व के भाश्यकारों की नाकामी से पता चलता है कि भारत भूमि काफी समय से वास्तविक और पूर्ण ज्ञानी गुरू से रिक्त है। यह दुखद है, लेकिन सच यही है।
इसके बावजूद हमें यक़ीन है कि भारत जल्द ही अपना खोया हुआ धर्म, सत्य और गौरव प्राप्त कर लेगा क्योंकि भारतवासी स्वभाव से ही ज्ञानाकांक्षी हैं। ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में अब जाति, भाषा और राष्‍ट्र की बेबुनियाद दीवारें भी ढहती जा रही हैं। मशहूर चीनी कहावत है कि
`जब विद्यार्थी तैयार हो जाता है तो गुरू उपस्थित हो जाता है।´
जो ढूंढता है वह पाता है लेकिन ...
गुरू की खोज का अभियान जारी रखिये क्योंकि जो ढूंढता है वही पाता है। उन जगहों पर भी तलाश कीजिए जहाँ अभी तक तलाश न किया हो। हो सकता है कि ऋषि उस रूप में और उस परिधि में मिले जिसकी कल्पना भी न की हो। ऋषि उस भेष-भाषा, देश और वंश में मिले जिसे स्वीकारना निजी अहंकार और राष्‍ट्रीय गर्व पर चोट करता हो। बहरहाल ऋषि ही सच्चा गुरू हो सकता है। अब वो जैसे भी मिले और जहाँ भी मिले, `धर्म को साक्षात करना और सब विद्याओं का यथावत जानना´ उसका मूल लक्षण है। आप उसे इस लक्षण से पहचान जाएंगे।
`सब विद्याओं के यथावत जानने´ को अरबी में `इल्म अस्मा कुल्लहा´ कहते हैं और इसे पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब (सल्ल. अर्थात उनपर शान्ति हो) की विशेषता बताई गई है। देखिये, जानिये, सोचिये, समझिये और फिर फैसला कीजिए क्योंकि आपके फैसले से ही आपका भविष्‍य निर्धारित होता है। आपके विचार से ही आपके कर्म फूटते हैं और अपने कर्मों का फल भी आपको स्वयं ही भोगना है। आप सत्य की खोज और स्वीकार के मार्ग पर आगे बढ़कर अपना जीवन स्वर्ग बनाना चाहते हैं, मुक्ति, आनंद और ईश्वर पाना चाहते हैं या फिर घृणा, तिरस्कार और अपने अंहकार की ऊंची दीवार से ही सर टकराते रहना चाहते हैं? पानी वहीं मिलेगा जहाँ कि वास्तव में वह मौजूद है। मृगमरीचिका´ से किसी को आज तक पानी नसीब नहीं हुआ तो आपको कैसे मिल जाएगा?
ढूंडिये लेकिन वहाँ, जहाँ कि वह सचमुच है।
40 `... सत्य असत्य के ग्रहण व त्याग करने में सदा उद्यत रहने वाले आर्य क्या दूसरों को ही उपदेश देते रहेंगे? क्या वे स्वयं सत्य पक्ष को ग्रहण करने में हठवश संकोच ही करते रहेंगे? (ऋग्वेदादिभाश्यभूमिका, पृष्‍ठ 7)
इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए उपयोगी ग्रन्थ :
1. कु़रआन मजीद : एक परिचय
लेखक : मौलाना सदरुद्दीन इसलाही
मधुर संदेश संगम, म्-20 अबुल फ़ज्ल इन्कलेव
जामिया नगर, नई दिल्ली - 110025

2. आवागमनीय पुनर्जन्म
लेखक : डॉ0 मुहम्मद अहमद
मिलने का पता उपरोक्त

3. कितने दूर कितने पास
लेखक : सैय्यद अब्दुल्लाह तारिक
प्रकाशक : रौशनी पब्लिशिंग हाऊस
बाज़ार नसरुल्लाह खां, रामपुर (उ.प्र.)


4. नराशंस और अन्तिम ऋषि
लेखक : डॉ0 वेदप्रकाश उपाध्याय
प्रकाशक : जम्हूर बुक डिपो, निकट मुस्लिम फंड
देवबन्द (उ0प्र0) 247554

5. इस्लाम : आतंक या आदर्श?
लेखक : श्री स्वामी लक्ष्मी‘ शंकराचार्य जी
।- 1601, आवास विकास कालोनी, हंसपुरम, नौबस्ता, कानपुर-201021

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आर.एस.एस. के भूतपूर्व प्रचारक ‘‘बलराज मधोक’’’ के नाम एक पत्र book

भारतीय हिन्दुत्ववादी संगठन आर.एस.एस. के भूतपूर्व प्रचारक ‘‘बलराज मधोक’’ की पुस्तक ‘‘विश्‍वव्‍यापी मुस्लिम समस्याएं’’ पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ, पूरी किताब झूठ, बोहतान और मन घडन्त आरोपों पर आधारित है। मिसाल के तौर पर मधोक जी ने अपनी पुस्तक के पेज नं 15 पर कुछ इस्लामी इस्तलाहात मुजाहिद, शहीद व ‘गाजी’ की परिभाषा करते हुए अपनी ओर से ‘गाजी’ की मन घड़न्त ‘‘परिभाषा’’ इन शब्दों में की है -
‘‘जिस ने अपने हाथ से कम से कम एक काफिर को खत्म किया है, ऐसे मुसलमान को गाजी कहा जाता है।’’ - पृष्‍ठ न. 15
ख्याल रहे कि यह निराधार परिभाषा मधोक जी की है। इस्लाम या मुसलमान से इसका कोई सम्बन्ध नहीं ।
online book: "ek patr balraj madhok ke nam"
मधोक जी ने अपनी पुस्तक में अनेक स्थानों पर लिखा है कि जहाँ भी इस्लामी राज्य स्थापित हुआ वहाँ की गैर मुस्लिम जनता के सामने दो में से एक विकल्प चुनना अनिवार्य था, इस्लाम या मौत - पृष्‍ठ न. 16,22
अफसोस कि मधोक जी ने यह लिखते हुए इतना न सोचा कि भारत में कई शताब्दियों तक इस्लामी राज्य कायम रहा । परन्तु मधोक जी फिर भी बच गये, बल्कि दो में से एक विकल्प देने वाले अल्प संख्यक रह गये और मधोक जी ....
बलराज मधोक जी को इतिहास का कितना ज्ञान है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अपनी पुस्तक के पृष्‍ठ नं 34 पर लिखते हैं कि सोमनाथ के मन्दिर पर मुसलमान आकर्मणकारियों द्वारा बनाई गई मस्जिद को हटा कर सरदार पटेल ने पुनः मन्दिर बनवाया ।
सब जानते है कि सोमनाथ के मन्दिर पर कभी मस्जिद नहीं रही, परन्तु नफरत के पुजारी नफरत का करोबार करने के लिए इतिहास को बदलने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं।
मधोक जी कितने बड़े ज्ञानी हैं, और वह अपने समय के हालात से कितनी वाकफियत रखते हैं इस का अन्दाज़ा इस बात से कीजिए कि सन 2003 में वह अपनी उक्त पुस्तक में लिखते हैं कि इस समय संसार में छोटे बडे़ चालीस इस्लामी देश हैं - पृष्‍ठ 39
ज़ाहिर है कि या तो उन्हें गिनती नहीं आती या उनका भौगोलिक ज्ञान कमज़ोर है, अगर वह संसार का मानचित्र उठा कर इस्लामी देशों की गिनती करते तो यह संख्या उनकी बताई संख्या से दस /पन्द्रह अंक ऊपर जाती ।
जिस व्यक्ति के ज्ञान की यह स्थिति हो उसकी कृति को महत्व देना उस पर विचार व्यक्त करना अपना समय नष्‍ट करने के सिवा कुछ नहीं, परन्तु मधोक जी ने मुसलमानों के भारतीयकरण करने के सम्बन्ध में लिखा है -
‘‘उसके लिए एक रास्ता तो यह है कि इस्लाम का भूत उतार कर उन्हें पुनः अपने मूल हिन्दू परिवार में लौटने के लिए प्रेरित किया जाये।’’- पृष्‍ठ 49
इस प्रकार के आग्रह मधोक जैसे विचार रखने वाले कुछ अन्य लोगों की ओर से भी समय समय पर आते रहते हैं, आर.एस.एस. के ही एक अन्य प्रचारक हरिद्वार के डा. अनुप गौड ने अपने द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘‘क्या हिन्दुत्व का सूर्य डूब जायेगा’’ प्रकाशित 2006 में मुसलमानों का आहवान करते हुए लिखा है कि
‘‘ इस पुस्तक के माध्यम से मैं आहवान करता हूँ कि वह अपने स्वधर्म में लौट आयें ’’ पृश्ठ-78 ।
उक्त विद्वानगण के इस प्रकार के विचार, सोचने वाला दिमाग रखने वाले मनुष्‍य को मजबूर करते हैं कि मुस्लमानों को जिस धर्म में लौटाने के लिये उक्त विद्वानगण इतने बेताब दिखाई पड़ते हैं, उसको समझा जाए और इस्लाम का भूत उतार कर मधोक जी जिस धर्म का भूत चढ़ाना चाहते हैं इस्लाम से उसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाए। तो आइये इस परीपेक्ष में इस्लाम और हिन्दू धर्म का एक सरसरी तुलनात्मक अध्ययन करते हैं।
धर्मों का आधार पूजनीय ईश्‍वर होता है, इसी कारण जिन समाजों में ईश्‍वर की कल्पना नहीं, उन्हें नास्तिक कहा जाता है। इसलिए बेहतर होगा कि बात ‘पूजनीय ईश्‍वर’ से ही शुरू की जाय, यहाँ यह पुष्टि करना भी अनिवार्य है कि हमने ज्ञान का आधार धर्म ग्रन्थों को बनाया है, क्योंकि व्यक्ति विशेष, क्या कह रहा है इसका कोई महत्व नहीं, महत्व धर्म ग्रन्थों का होता है क्योंकि व्यक्ति विशेष की करनी, कथनी में अन्तर हो सकता है या वह बात कह कर बदल भी सकता है जबकि ग्रन्थ बदला नहीं करते ।
इस्लाम में पूजनीय केवल एक ईश्‍वर की ज़ात है, जो कि सर्वशक्तिमान है, सब का पालनहार और सब का स्वामी है, जिसका न कोई साझी है, नही कोई उस जैसा है, इस सम्बन्ध में जब हम हिन्दू धर्मग्रन्थों का अध्ययन करते हैं तो कहीं एक ईश्‍वर की बात मिलती है, कही तीन की, तो कहीं तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की और कहीं यह भी कि दुनिया की हर वस्तु ईश्‍वर है।
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डा. मुहम्‍मद असलम कासमी,
मौहल्ला सोत, रुड़की
Email: dr_aslam.qasmi@yahoo.in
मुख्‍य सलाहकारः
1. मौ0 साजिद कमाल (एम.ए.एल.एल.बी.)
2. हैदर ज़मा खाँ (एम.ए.एल.एल.बी.)
492, पश्चिमी अम्बर तालाब, रूड़की ।
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हिन्दू धर्म में ईश्‍वर के हवाले से जो यह विरोधाभास है आईये इसको पवित्र कुरआन के एक पैमाने से मापते हैं, कुरआन में है-
‘‘यह (अर्थात कुरआन) अगर ईश्‍वर के अतिरिक्त किसी अन्य की ओर से होता तो इसमें विरोधाभास बहुत होता’’, निसा-82
जैसा कि हिन्दू धर्म में है ।
जैसा कि ऊपर लिखा गया है कि हिन्दू धर्म में तीन खुदाओं का उल्लेख भी मिलता है और इसे हिन्दुओं का एक बड़ा तबक़ा मान्यता भी देता है अतः इस पर चर्चा करते हैं।
उपरोक्त तीन खुदा बृह्मा, विष्‍णु और महादेव हैं। बृह्मा पैदा करते हैं, विष्‍णु पालनहार हैं, और महादेव का कार्य मारना है, इन में से अधिकतर पूजा महादेव की होती है, वह भी उन के लिंग के रूप में, शिव पुराण में इस का विस्तार से वर्णन है। इसके अतिरिक्त इन तीनों के हवाले से शिव पुराणादि ग्रंथों में जो कुछ कहा गया है, उसे अंकित करने से कलम असमर्थ दिखाई पड़ता है, क्योंकि उसे पढ़ते हुए एक शरीफ व्यक्ति कानों पर हाथ रख लेता है। मधोक जी और अनूप जी स्वयं उक्तादि ग्रंथो का अध्ययन करलें और बृह्मा, विष्‍णु व महादेव के किरदारों की अपेक्षा पवित्र कुरआन की निम्न आयतों को भी देखें ।
1. कह दीजिए कि वह अल्लाह यक्ता है। वह बेनियाज (निः सपृह, निष्‍काम, लालसा रहित, निरपेक्ष व सर्वधार) हैं न वह किसी को जनता है न ही किसी से जना गया है, और उसके जैसा कोई नहीं है - सूरह इख्लास 1-4
2. वही अल्लाह है जिसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं, परोक्ष और प्रत्यक्ष को जानता है, वह बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है ।
वही अल्लाह है जिसके सिवा कोई पूज्य नहीं, वह बादशाद है। अत्यन्त पवित्र, सर्वथा सलामती, निश्चिन्तता प्रदान करने वाला, संरक्षक, प्रभुत्वशाली, प्रभावशाली (जोडने वाला) अपनी बड़ाई प्रकट करने वाला, महान और उच्च है उस साझेदारी से जो वे (अनजान लोग उसके बारे में) कहा करते हैं
वही अल्लाह है जो संरचना का प्रारूपक है, अस्तित्व प्रदान करने वाला, रूप देने वाला है, उसी के अच्छे अच्छे नाम हैं, जो कुछ भी आकाशों में एवं पृथ्वी में है उसी का गुणगान कर रहा है, और प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है । सूरह अल-हश्र, 22, 23, 24
अगर आपने महाभारत (वन पर्व) कार्तिक महातमं, पदम पुराण, व शिव पुराण में इन्द्र महादेव बृह्मा और विष्‍णु आदि का अध्ययन किया होगा तो यकीनन आप पवित्र कुरआन की आयतें पढ़कर यहीं कहेंगे कि
चे निसबत-ए-खा़क रा ब आसमान-ए-पाक
फिर आप कैसे इसलाम वादियों के सर से इस्लाम व कुरआन का भूत उतारकर उनके सर पर पुराणों आदि का भूत चढ़ापायेंगे यह आपके लिए विचारणीय है ।
जहाँ तक हिन्दू धर्म की बात है तो क्योंकि उसमें कोई ऐसी बात नहीं जो आकर्षण का कारण बन सके, इसलिए अधिकांश हिन्दुत्ववादी धर्म की बात कम और संस्कृति की अधिक करते हैं, और वह भोले भाले हिन्दू देशवासियों को इस हवाले से भड़काते हैं कि हमारी संस्कृति नष्‍ठ हो रही है, जबकि संस्कृति का धर्म से कोई लेना देना नहीं, संस्कृति का सम्बन्ध वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन एवं क्षेत्रीय तौर तरीकों से है जो हर क्षेत्र के अलग होते हैं, उदाहरण के तौर पर अरबों की संस्कृति भारतीयों से अलग है अतः अरब जिनकी अधिकतर आबादी मुस्लिम है इस के बावजूद कोई भारतीय मुसलमान अगर अरबों कें बीच जाकर रहने लगे तो वह वहां की संस्कृति में नहीं समा पाता और उसकी पहचान एक भारतीय के तौर पर ही रहती है और वहां पर धर्म, संस्कृति की खाइयों को पाट नहीं पाता, इसका मतलब यह है कि संस्कृति और धर्म दो अलग-अलग वस्तुए हैं। इन दोनों में एक फर्क यह भी है कि धर्म के नियम अटूट होते हैं। जो बदलते नहीं , जबकि संस्कृति गतिशील होती है। अपितु यह कहा जाए कि संस्कृति को गतिशील होना चाहिये क्योंकि जो संस्कृति गतिशील नहीं होती वह स्वंय अपनी मौत मर जाती है। ‘मधोक’ जैसे हिन्दू कौम परस्त चिन्तकों की समस्या यह है कि वह धर्म को संस्कृति की चादर मे लपेट कर अपने हिन्दुत्व के नारे को लुभावना बनाने का नाकाम प्रयास करते है।
हिन्दुत्व के झंडा वाहक संगठन आर.एस.एस. के एक चोटी के नेता जो अपने संगठन के मुस्लिम विंग (जिसे राष्ट्रवादी मुस्लिम विचार मंच कहा जाता है) की निगरानी करते हैं। मुसलमानों के बीच उनके कई भाषण सुनने का अवसर प्राप्त हुआ, वह अपने अधिकतर भाषणों में विषेश रूप से जो मुद्दा उठाते हैं वह यह है-
उनका मानना है कि माता तीन हैं एक जननी माता, एक धर्ती माता और एक गव माता, वह हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल0 की एक हदीस का हवाला देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार माँ के पैरों तले जन्नत है। ऐसे ही धर्ती माता भी स्‍वर्ग के समान है। अतः हमें उसकी वन्दना करने में कोई संकोच नही होना चाहिए, इसी प्रकार हमें गव माता का भी आदर और सम्मान करना चाहिये। क्योंकि हमें उस से दूध और मूत्र मिलता है। दूध हम पीते हैं तो उसके मूत्र से औषधियाँ बनायी जाती हैं।
ऐसे ही एक भाषण के बाद मैने भाषण करता से पूछ लिया कि आज आप जिस धर्ती माता की वन्दना करने को कह रहे हैं। आपकी आस्था के अनुसार कल मरनोपरान्त आप का पुनः जन्म अगर पाकिस्तान के तालिबान में हो गया तो आप हमारी इसी धर्ती के विरूद्व आतंकवादी घटनाओं में तो सम्मिलित न होंगे। अपने उत्तर मे उन्होंने मुझसे पलट कर प्रश्‍न किया कि अगर आप अमेरिका में पैदा हो गये तो? मेरा जवाब था कि मेरे धर्म के अनुसार, मैं अगर अपने देश में ही मरता हूं तो कल कयामत में यहीं से दोबारा उठाया जाऊंगा ।
प्रश्‍न यह है कि आप अपने धर्म या संस्कृति में इस्लाम से अधिक देश भक्ति तो पैदा कीजिये ।
मेरा दूसरा प्रश्‍न यह था कि गव माता के आदर व सम्मान का क्या यह मतलब है कि उसके मूत्र का सेवन किया जाये, उन्होंने कहा कि मैडिकली साइन्टीफिक शेध में यह बात सिद्ध हो गयी है कि उसका मूत्र कई बीमारियों में लाभकारी है। मैं ने कहा कि अगर मूत्र में ही लाभ तलाश करना है तो जन्नी माता जिस ने नौ महीने आप को अपनी कोख में रखकर पाला है इस बात की ज्यादा पात्र है कि उस के मूत्र के लाभ तलाश किये जायें। मगर अफसोस कि इन अन्याइयों ने कभी अपनी जन्मदाई माता के मूत्र पर साइन्टीफिक शोद्ध की आवशयकता न समझी, दूसरी ओर उन्हे गाय के मूत्र का साइन्टीफिक लाभ तो दिखाई दिया परन्तु मैडिकल साइन्स का यह निश्‍कर्ष नज़र न आया कि मूत्र में किसी भी जानदार के बदन की तमाम गन्दगियाँ सम्मिलित होती हैं। हर उचित मस्तिष्‍क का व्यक्ति पेशाब करने के बाद अपने हाथों को धोना चहता है और कभी किसी ने अपने पेशाब को टेस्ट न कराया कि शायद उसमे भी कुछ लाभकारी तत्व विराजमान हों।
मधोक जी अगर यही आपकी संस्कृति है और इस के बदले आप हमारे सर से इस्लाम का भूत उतारना चाहते हैं। तो यकीन जानये कि इस में आपको कामयाबी नहीं मिलेगी, क्योंकि कहाँ एक जानवर के मूत्र का सेवन और कहाँ मुहम्मद सल्ल. की हदीस के यह शब्द, कि पेशाब की छीटों से बचो क्योंकि आम तौर पर कब्र का अज़ाब उसी के कारण होता है।
हिन्दू धर्म के कुछ अन्य मूल सिद्धान्त
मधोक जी ने अपनी पुस्तक में पवित्र कुरआन की युद्ध सम्बन्धि मशहूर चैबीस आयतों पर जो कुछ टिप्पणी की है हमें उसके सम्बन्ध से कुछ नहीं कहना क्योंकि उनकी इन आपत्तियों का अनेक बार जवाब दिया जा चुका, स्वयं एक हिन्दू धर्माचार्य स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य ने ‘‘इस्लाम आतंकवाद या आदर्श’’ नामी किताब लिखकर उक्त आयतों पर आपत्तियों का भली भांति उत्तर दिया है (यह पुस्तक स्वयं स्वामी जी के निवास A 1601, आवास विकास कालोनी हंसपुरम, नोबस्ता कानपुर के पते से छापी गई है।) इस के अतिरिक्त हम ने अपनी पुस्तक ‘‘जिहाद या फसाद’’ में भी इसका उत्तर दिया है। अतः इस विषय को यही छोड़ते हुए हमें जो कुछ कहना है वह यह है कि मधोक जी ने अपनी पुस्तक मे कुरआन, इस्लाम ओर मुस्लमानों के सम्बन्ध में जो आपत्तिजनक और अपमान सूचक शब्दों का प्रयोग किया है वह तो उन्ही का हिस्सा है। मुस्लमानों को वह मुसलमान न लिखकर मुहम्मदी लिखते हैं। और हज़रत मुहम्मद सल्ल. के नाम के साथ साहब तक के शब्द का प्रयोग नहीं करते, यहाँ तक कि अपनी परम्परा और संस्कृति को त्यागते हुये हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. के नाम पर बहुवचन क्रियाओं का प्रयोग न करते हुये एक वचन क्रियाओं का प्रयोग करते हैं। उनका यह लब-व-लहजा तो उन्हें ही मुबारक हो परन्तु हम से ऐसी गलती ना हो पाए इस लिए हिन्दू धर्म की, मान्यताओं, ग्रन्थों एवं प्रवर्तकों को समझने के लिये हम अपनी ओर से कुछ न कहते हुए, केवल हिन्दू कलमकारों के लेखों के कुछ अंश प्रस्तुत करते हैं। इस स्थान पर वेदों से कुछ मंत्र भी आ गये हैं जिन्हें पढ़कर शायद मधोक जी की समझ में आ जाये कि कुरआन की आयत तो केवल अपने ऊपर हमला करने वाले का उचित उत्तर देनें की ही शिक्षा देता है। परन्तु वेद के मंत्र ..................... ?
हिन्दू धर्म के कुछ मूल सिद्धांन्त, शिक्षाऐं और प्रवर्तक हिन्दू लेखकों के कलम से-
...........................
धार्मिकता से नैतिकता की ओरः लेखक राकेश नाथ
प्रकाशितत पुस्तक ‘‘कहां है धर्म कहां है न्याय’’ पृष्‍ठ 207,8,9,10
विश्‍व बुक, दिल्ली,
धर्म ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर देवासुर संग्राम का उल्लेख आता है। देवता स्वर्ग में विलासी जीवन बिताते थे और असुरों को छलबल से पराभूत करने के शड्यंत्र रचते रहते थे। असुरों को दुष्चरित्र सिद्ध करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। जगह-जगह उनकी निंदा की गई, केवल निंदा करने वाले उदाहरणों पर ध्यान नहीं दें तो पता चलेगा कि देवताओं और असुरों के चित्रण में कोई मौलिक अंतर नहीं था देवता भी वह सब कुकर्म करते थे जिन का आरोप असुरों पर लगाया जाता है।
असुर देवताओं से अधिक परिश्रमी और जुझारू थे, इसलिए उन्हें सफलता भी मिलती थी देवताओं को कोई अधिक श्रम वाला काम करना होता तो धर्म ग्रन्थों से मिलने वाले विवरणों के अनुसार उन के लिए उन्हें असुरों का ही सहयोग लेना पड़ता था। समुद्रमंथन की घटना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। ‘‘भागवत’’ के आठवें स्कंध में आईं इस कथा के अनुसार इंद्र के प्रस्ताव पर असुरों ने देवताओं के साथ मिलकर समुद्रमंथन शुरू किया था । समुद्र में जब अमृत निकला तो विष्‍णु ने स्त्री का रूप धारण करके असुरों को मोहित किया और आपस में लड़ा दिया ।
स्त्री रूप धारी विष्‍णु ने चालाकी से असुरों को अमृत के भाग से वंचित कर दिया और सारा अमृत देवताओं को ही बांट दिया । यह कथा सच है या गलत, यह सोचना बेकार है, लेकिन कहानी यह तो बताती है कि भगवान और देवता किस तरह छल करते थे और अधिक परिश्रम करने वालों का हिस्सा भी हड़प जाते थे।
राजा बलि का लाभ उठाकर उस का पूरा राज्य हड़प लेने और देवताओं को दे देने की कथा भी भागवत में आती है । बलि स्वभाव से उदार और दानशील था । भागवत के अनुसार उसने तीनों लोकों में अपना राज्य स्थापित कर लिया था। विष्‍णु ने पहले तो उस से दान मांगा और वचन लिया कि जो भी मांगा जाएगा वह बलि दे देगा। वचन लेने के बाद विष्‍णु ने बलि का पूरा राज्य ही ले लिया और देवताओं को दे दिया । बलि असुरों का राजा था और भागवत में आए प्रसंग के अनुसार ही वह उदार था । उस की उदारता का अनुचित लाभ उठाना नैतिक है या अनैतिक?
‘‘भागवत’’ के एक और कथा प्रसंग में देवताओं द्वारा संकट के समय साथ देने वाले विश्‍वरूप की हत्या का उल्लेख आता है । छठे स्कंध में आई इस कथा के अनुसार इंद्र ने देवता त्वष्‍टा के पुत्र विश्‍वरूप से वैष्‍णवी विद्या सीखी और असुरों को जीत कर अपना राज्य वापस ले लिया। विश्‍वरूप की माता असुरकुल की थी।
एक यज्ञ में वह अपनी माता के वंश की भी आहुति देता है तो इन्द्र ने उस का सिर काट लिया इंद्र वहां विश्‍वरूप द्वारा किय गये उपकार को भूल गया और असुरों के नाम से इतना चिढ़ गया कि उपकार करने वाले की ही हत्या कर दी । उपकार करने वालों के साथ इस व्यवहार क्या नैतिक कहा जाएगा?
और स्वार्थीपने की हद देखिए कि देवता अपने एक शत्रु को मारने के लिए दघीचि के पास उन की हड्डियां मांगने पहँच गए। वृत्र नामक असुर का संहार करने के लिए जो आयुध चाहिए था वह हड्डियों से बन सकता था हड्डियां भी ऐसे व्यक्ति कि जो तपस्वी हो, देवताओं में ऐसा कोई तपस्वी था नहीं, सभी विलासी थे।
इसलिए वे दधीचि ऋषि के पास गए और उन से अपनी हड्डियां देने के लिए कहने लगे। जीवन रक्षा के लिए खून चढाने की जरूरत हो तो अति आत्मीय व्यक्ति से भी रक्तदान करने के लिए कहने में संकोच होता है। रक्तदान में यद्यपि मरने का डर नहीं रहता, लेकिन देवता जीवित व्यक्ति के पास उस की हड्डियां मांगने पहँच गये और मांग लाए, स्वार्थपरता की यह अति देवताओं के चरित्र में ही दिखाई देती है, जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं।
इस तरह के कथा प्रसंग अविश्‍वसणीय और अस्वाभाविक हैं, लेकिन ये इस बात के द्योतक तो हैं कि धर्म ग्रन्थों में किस प्रकार की नैतिकता सिखाई गई है। छलकपट करने, दूसरों की उदारता का अनुचित लाभ उठाने और स्वार्थ में अन्धे हो जाने वाले चरित्रों को आदर्श बना कर प्रस्तुत किया गया है। तो इस से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कथित धार्मिक युग के लोग कितने नैतिक रहे होंगे ----

देवताओं के साथ साथ भगवान के अवतार भी अनैतिक आचरण करते थे। कई स्थललों पर तो उन का आचरण अनैतिकता की हद से भी आगे अपराधपूर्ण लगता है। इस तरह के कृत्य यदि कोई आज करे तो कानून में उसे दंड देने की व्यवस्था है। भविष्‍यपुराण में उल्लेख आता है कि ब्रह्म्रा, विष्‍णु और महेश ने क्रमशः अपनी पुत्री, माता और बहन को पत्नी बना कर श्रेष्‍ठ पद प्राप्त किया ।
स्वकीयां च सुतां ब्रह्मा विश्णु देवो मातरम् !
भगिनीं भगवा´छंभु गृहीत्वा श्रेश्ठतामगात् !!
- प्रतिसर्ग खं. 4,18,27
अर्थात ब्रह्मा अपनी लड़की को, विष्‍णु देव अपनी माता को और शंभु अपनी बहन को ग्रहण कर के श्रेष्‍ठ पद को प्राप्‍त हुए ।
वेद में भी इस का उल्लेख हैः
पिता दुहितुर्गर्भंमाधात्
- अथर्व 9,10,12
अर्थात पिता ने बेटी में गर्भ धारण किया?
मातुर्दिधिषुमब्रवं स्वसुर्जारः
श्रृणोतु नः भातेंद्रस्य सखा मम.
- ऋग्वेद 6,55,5
अर्थात मैं मां के उपपति को कहता हूं. वह बहन का जार हमारी प्रार्थना को सुने, जो इंद्र का भ्राता है और मेरे मित्र है ।
‘‘भागवत’’ के तीसरे स्कंध में ब्रह्मा द्वारा पुत्री को चाहने का स्पष्‍ट उल्लेख आया है इस प्रसंग का अंश इस प्रकार हैः
वाचं दुहितरं तन्वीं स्वयंभूर्हरती मनः
अकामा चकमे क्षत्रः सकाम इति नः
श्रुतम् तमधरम्‍मे कृतमति विलोक्य पितरं सुताः
मरीचि मुख्या ऋषयो विश्रंभात्प्रत्यबोधयन् नैतत्पूर्वेः
कृतं त्पद्ये न करिष्‍यंति चापरे !
- 3,12,28,30
अर्थात काम से वशीभूत हो कर स्वंयभू ने वाक नाम पुत्री को चाहा, पिता की यह बुद्वि देख कर मरीचि आदि पुत्रों नें समझाया कि ऐसा कर्म न किसी ने किया है, न अब होगा न ही आगे करेंगे।
अथर्ववेद में तो पिता द्वारा पुत्री में गर्भस्थापित करने का उल्लेख है।
‘पिता दुहितुर्गर्भसमाधात्’
- 9,10,12,
अर्थात पिता ने पुत्री में गर्भ स्थापित किया.
धर्मग्रंथों में जिन पात्रों को आदर्श बताया गया है उन में कामुकता की पराकाष्‍ठा देखी जा सकती है। जहां भी सुंदर स्त्री दिखाई दी, उसे प्राप्त करने और भोगने के तानेबाने बुने जाने लगे. ब्रहा्रा के संबंध मे शिवपुराण में उल्लेख आता है कि पार्वती के विवाह में ब्रह्मा पुरोहित बने थे। उन्होंने पार्वती का पांव देखा और इस कदर कामातुर हो उठे कि कर्मकांड करातेकराते ही स्खलित हो गए।
भागवत में उल्लेख आता है कि शिव की रक्षा के लिए विष्‍णु ने मोहिनी रूप धारण किया तो शिव उसी रूप पर मुग्ध हो गए और उस के पीछे दीवाने होकर भागे।
भविष्‍यपुराण में आई एक कथा के अनुसार अत्रि ऋशि की पत्नी अनुपम सुंदरी थी। ब्रह्मा , विष्‍णु, महेश तीनों उस के पास गए। ब्रह्मा ने निर्लज्ज हो कर अनुसूया से रतिसुख मांगा और तीनों देवता अश्‍लील हरकतें करने लगे।
गौतम के वेश में इंद्र द्वारा अहल्या से व्यभिचार की कथा रामायण और ब्रहा वैवर्त पुराण में आती है। अनैतिकता की पराकाष्‍ठा देखिए कि इस का दंड बेचारी निर्दोष अहल्या को भोगना पड़ा था।
भागवत (9.14) और देवी भागवत में चंद्रमा द्वारा गुरू की पत्नी को अपने पास रखने की कथा आती है गुरू ने अपनी पत्नी बार-बार वापस मांगी तो भी चन्द्रमा ने उसे वापस नहीं लैटाया। लंबे अरसे तक साथ रहने के कारण चंद्रमा से तारा को एक पुत्र भी हुआ जो चन्द्रमा को ही दे दिया गया ।
देवताओं के गुरू बृहस्पति ने स्वयं अपने भाई की गर्भवती पत्नी से बलात्कार किया देवताओं ने ममता ( बृहस्पति की भावज ) को उस समय काफी बुराभला कहा जब उसने बृहस्पति की मनमानी का प्रतिरोध करना चाहा।
इन प्रसंगों के सही गलत होने का विवेचन करने की आवशयकता नहीं है। इन का उल्लेख इसी दृष्टि से किया जा रहा है धर्म ग्रन्थों में उल्लेखित पात्रों को किनं मानदडों पर आदर्श सिद्ध किया गया है । उन का समय दूसरों की पत्नी छीनने व व्यभिचार करने में बीतता था तो वे लोगों को नैतिकता का पाठ कब सिखाते थे और कैसे सिखाते थे ।
इंद्र का तो सारा समय ही स्त्रियों के साथ राग रंग में बीतता था वह जब असुरों से हार जाते तो ब्रह्मा, विष्‍णु, महेश की सहायता से षड्यंत्र रच कर अपना राज्य वापस प्राप्त करते और फिर उन्ही रागरंगों में रम जाते। अप्सराओं के नाच देखना, शराब पीना, और दूसरा कोई व्यक्ति अच्छे काम करता तो उस में विध्न पैदा करना यही इंद्र की जीवनचर्या थी । इस की पुष्ठि करने वाले ढेरों प्रसंग धर्मषास्त्रों में भरे पडे़ हैं।
महाभारत के तो हर अघ्याय में झूठ, बेईमानी और धूर्तता की ढेरों कहानियां हैं। धर्मराज युधिष्ठिर, जिन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जीवन में कभी पाप नही किया, जुआ खेल कर राजपाट हार गए और पत्नी को भी दाव पर लगा बैठे, युधिष्ठिर के इस कृत्य की द्रौपदी और धृतराष्‍ट के ही एक पुत्र विकर्ण ने भर्त्‍सना की थी। ‘‘महाभारत’’ की लड़ाई के लिए कोई एक घटना मूल कारण है तो वह युधिष्ठिर का जुआ खेलना और द्रौपदी को दांव पर लगाना है। इतने बड़े युद्व का कारण धार्मिक भले ही हो, पर नैतिक कहां रह जाता है ?
दूसरे धर्मावतार भीष्‍म ने एक राजकुमारी अंबा का अपहरण किया तथा न खुद उससे विवाह किया और न ही दूसरी जगह होने दिया । अंबा को इस संताप के कारण आत्महत्या करनी पड़ी ।
कुंती के चारों पुत्र कर्ण, युघिष्ठिर , भीम और अर्जुन परपुरूषों से उत्पन्न हुए थे । कर्ण तो विवाह से पहले ही जन्म ले चुका था.
स्वयंवर में द्रौपदी ने अर्जुन के गले में वरमाला डाली थी। किन्तु पांचों भाइयों ने उसके साथ संयुक्त विवाह का निश्‍चय किया। पांचाल नरेश ने इसका विरोध किया तो युधिष्ठिर ने ही जिद की और अपनी बात मनवाई ।
संपूर्ण धर्म वाड्.मय इस तरह की विसंगतियों से भरा हुआ है इसे कथित धार्मिक युग का प्रतिबिंब भी कह सकते हैं और धर्म का आदर्श भी कह सकते हैं । जिनमें नैतिक गुणों का कोई महत्व नहीं है ।
इन प्रसंगों से यही सिद्व होता है कि अनैतिकता को तब धर्मगुरूओं की स्वीकृति मिली हुई थी। दानदक्षिणा, पूजापाठ, कर्मकांड, यज्ञ, हवन आदि धार्मिक क्रियाकृत्य करते हुए कैसा भी आचरण किया जाता तो वह सभ्य था । जरूरी इतना भर था कि ब्राह्मणों के स्वार्थ पुरे किये जाते रहें-
नैतिक कौन?
असुर देवताओं और धार्मिक लोगों की तुलना में अधिक नैतिक थे । वे देवताओं से युद्ध जरूर लड़ते थे, लेकिन युद्ध में उन्होंने बेईमानी प्रायः नहीं की । देवताओं की स्त्रियों को भी उन्होंने परेशान नहीं किया अपमान का बदला लेने के लिए रावण सीता का हरण कर के ले तो गया था, पर उस ने सीता को लंका में बड़े ही आदर से रखा था ।
राम ने शूर्पनखा के प्रणय निवेदन को ठुकराया, वहाँ तक तो ठीक है, लेकिन उसे लक्ष्मण के पास प्रणय प्रस्ताव ले कर जाने और बाद में नाककान काट लेने का भद्दा मजाक और दुव्र्यवहार करने का क्या औचित्य था? रावण यदि इसी स्तर पर प्रतिशोध लेना चाहता तो सीता की शील रक्षा असंभव थी । इस स्थिति में कौन ज्यादा नैतिक था - राम या रावण ? -
‘‘कहाँ है धर्म कहाँ है न्याय’’, पृष्‍ठ 207,8,9,10, लेखकः राकेष नाथ
सरिता और हिन्दू समाजः रमाकान्त दूबे के लेख से, प्रकाशित सरिता-मुक्ता प्रिंट 1 ता 12, विश्‍व बुक दिल्ली ।
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उदाहरण के लिए आप अपने धर्मग्रन्थों को शुरू से देखते जाएं, सब से पहले तो ‘ऋग्वेद’ ही हमारा परम ग्रन्थ है। लेकिन इस में आर्य जाति द्वारा भारत के मूल निवासियों (दास, दस्यु आदि) के जातीय संहार का जैसा वर्णन किया गया है, तथा आर्यो के परम इष्‍टदेव (इंद्र) का जैसा चरित्र चित्रण हुआ है, क्या वह सब आज के युग में किसी सभ्य व समुन्नत राष्‍ट्र के आदर्श बन सकते हैं?
आर्यों कि हिंसावृत्ति तथा उन के परम देव इंद्र के कारनामों का यह लेखा जोखा देखिएः
‘‘हमारे चारों ओर दस्यु जाति है, यह यज्ञ नही करती, कुछ मानती नहीं, यह अन्यव्रत व अमानुष है, हे शत्रुहंता इंद्र, तुम इस का वध करने वाले हो, दास का भेदन करो’’ (ऋ-10-22, 8)
‘‘इंद्र, तुम यज्ञाभिलाषी हो, जो तुम्हारी निंदा करता है उस का धन अपहृत कर के तुम प्रसन्न होते हो, प्रचुरधन इंद्र, तुम हमें (अपनी) दोनों जाघों के बीच छिपाओ, शत्रुओं को मारो, अस्त्र से दास को मार डालो’’ (ऋ-8-59, 10)
‘‘हे इन्द्र, तुम ने पचास हजार काले लोगों को मारा’’ (ऋ-4-16, 13)
‘‘इंद्र, तुम समस्त अनार्यो को समाप्त करो....’’ (1-113, 5)
‘‘तुम ने पृथ्वी को दास की शय्या बना दिया है’’(ऋ-1-174, 7)
‘‘रक्षाशून्य दुर्गम स्थान से जाने वाले व्यक्ति को चोर मार डालता है, उसी तरह इंद्र ने बहुसहस्त्र सेनाओं का वध किया है’’ (4-28,3)
‘‘इंद्र ने असुरों (अनार्यो) के धन पर तुरन्त उसी तरह अधिकार कर लिया, जिस तरह सोए हुए मनुष्‍ के धन पर अधिकार जमाया जाता है’’ (ऋ-1-53- 1)
‘‘इंद्र और अग्नि, तुम लोगों ने एक ही बार की चेष्‍टा से दासों के 90 नगरों को एक साथ कंपित किया था’’ (1-130, 7)
(इंद्र कहते है) ‘‘मैं ने सोमपान में मस्त हो कर शंबर (दास राजा) के 99 नगरो को एक काल में ही ध्वस्त किया था’’ (4-26, 3)
(इंद्र कहते है) ‘‘मेरे लिए इंद्राणी कं द्वारा प्रेरित्र याज्ञिक लोग 15-20 सांड या बैल पकाते हैं उन्हे खा कर मैं मोटा होता हूं, मेरी दोनों कुक्षियों को याज्ञिक लोग सोम से भरते हैं’’ (10-86, 14)
ये सब हमें क्या सीख देते हैं? यही कि जो लोग हमारी जाति के न हों, अथवा हमारे धर्म को ना मानते हों, उन का हमें संहार कर देना चहिए, हमें दूसरे देशों पर आक्रमण करना चाहिए और अगर वहां के लोग नतमस्तक हो कर हमारी सत्ता स्वीकार न करें तो हमें उनके नगरों की ईंट से ईंट बजा देनी चाहिए, और उन की स्त्रियों के पेट फाड़ डालने चाहिए, ताकि उन की जाति का नामनिशान ही मिट जाए
क्या आप इस बात को पसंद करेगें कि यदि हमें अपेक्षित शक्ति हो तो हमे आज भी इन्ही आदर्शों का पालन करना चहिए? हम जिस देश में जाएं, वहाँ के लोगों का धन हमें हड़प लेना चाहिए? हमें अपने एक-एक आराध्य देव को खुश करने के लिए दर्जनों सांड या बैल मार कर पकाने चाहिएं और नशा करने के लिए भंग (सोम) के कईकई घडे़ भर कर रखने चाहिएं?
वेदों मे क्या है?
‘ऋग्वेद’ में सिर्फ यही कुछ नहीं है, वहाँ एक-एक यज्ञ में सैकड़ों घोड़ों, गाय, बैलों, भेड-बकरियों व अन्य जानवरों की बलि चढ़ाने का विधान है यहाँ तक कि नरबलि का संकेत भी मौजूद है (देखिए ऋ. 10-91,14,15 व 1-24, 13-15) क्या आप के विचार में हमें यह सब करना चाहिए? और यदि हम करें अथवा कर सकें तो हम आज के युग में ‘‘साधारण मनुष्‍य कहलाने के भी अधिकारी रह जाएंगे?, चरित्रवान व नैतिकता सम्पन्न होने की तो बात ही क्या?
चलिए, वेदों को छोड़िए, उन की तो आज उतनी मान्यता भी नहीं रही, न उन में बताए गये विधिविधानों के अनुसार आचरण करने की आज कुछ अधिक गुंजाइश ही है, बाद के दर्शनशास्‍त्रों और ग्रन्थों को ही ले लीजिए, जिन के द्वारा स्थापित प्रायः सभी मापदंड व आदर्श आज के हिंदू समाज के भी आदर्श बने हुए है ? ये ही सब शास्त्र हमें क्या पाठ पढ़ाते हैं? और हमें हमारे निजी व पारिवारिक तथा सामाजिक व राष्‍ट्री जीवन में किस प्रकार के आचरण का उपदेश देते हैं?
उपनिशदों की अलग अलग दार्षनिक दुकानों में हमें वेदों का हर देवता और कुछ नए देवता, बारीबारी से परमात्मा बनते दिखाई देते हैं हर देवता अपने को श्रेष्‍ठ बताकर शेष्‍ा सब देवताओं को अपने से समाविष्‍ठ घोषित करता है ।
रामायण को ही लीजिए राजा दशरथ तीन विवाह करते हैं पर पुत्र उतपन्न नहीं कर पाते, इसलिए श्रृंगी ऋशि को पुत्रोष्टि यज्ञ के लिए बुलाया जाता है, यज्ञ के लिए पुराने और बूढे पंडितों की क्या कमी थी जो इस नवयुवक को बुलाया गया, लेकिन यह ‘‘यज्ञ’’ हवन न होकर नियोग द्वारा दशरथ की रानियों को गृभवति करना था । जो दशरथ करने में असमर्थ थे ।
फिर सीता के माता पिता का कोई ठोर ठिकाना नहीं मिलता कहा जाता है कि वे राजा जनक को खेतों में पड़ी मिली थी - जैसे आजकल अवैध बच्चे सड़कों पर पड़े मिल जाते हैं
अब महाभारत को ही लिजिए, इस में ऐसे-ऐसे महापुरूषों का चरित्रचित्रण है कि कहते हैं सम्राट अकबर ने जब अपने दरबारी विद्वान को इस का फारसी अनुवाद करने को कहा और कुछ दिनों के बाद पूछा कि उस ने इस ग्रन्थ में क्या पाया तो विद्वान को विवष होकर कहना पडा कि ‘‘जहाँपनाह, वैसे तो सब ठीक है मगर इस ग्रन्थ में उल्लेखित एक भी व्यक्ति हलालजादा (वैध संतान) नहीं है। सब के सब ऐसे ही पैदा हो गए हैं।’’
उस विद्वान की यह उक्ति काफी हद तब सही थी, क्योंकि महाभारत के अधिकतर पात्रों के जन्म लेने में या तो ‘नियोग प्रथा’ का खुला हाथ था अथवा स्वच्छंद व्यभिचार व बलात्कार का ।
धृतराष्‍ट्र , पांडु और विदुर तीनों भाई विचित्रवीर्य की स्त्री से व्यासजी द्वारा पैदा होते हैं। अंधे धृतराष्‍ट्र के सौ पुत्रों का जन्म भी प्राकृतिक नहीं है, बल्कि वे सब रानी गांधारी के पेट से एक पिंड के रूप में ऐसे ही निकल पड़ते हैं। फिर पांडु के पांच पुत्र -युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव पांच अन्य व्यक्तियों के नाम से पैदा होते हैं । कुन्ती का पुत्र कर्ण बलात्कार की यादगार है। यही बात कई महापुरूषों पर भी लागू होती है। जो इस धार्मिक महाकाव्य में अपनी भूमिकाएं अदा करते हैं जैसे द्रोणाचार्य के बारे में कहा गया है कि वह एक दोने से पैदा हुए । जिस में किसी का वीर्य पड़ा हुआ था ।
सरिता-मुक्ता प्रिंट 1 ता 12,
लेखकः रमाकान्त दूबे , विश्‍व बुक दिल्ली ।
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हमारे आदर्शहीन आदर्श
डा0 राकेष नाथ के लेख से प्रकाशित बुक ‘‘कितने खरे हमारे आदर्श’’ पृष्‍ठ 16,17,18, विश्‍व बुक दिल्ली ।
मर्यादा पुरूषोत्‍तम कहलाने वाले राम को जब यह पता चला कि उनके राज्य में एक शूद्र शंबूक तपस्या कर रहा है, तो उन्होंने उस का सिर काट डाला, श्रेष्‍ठ धनुर्धर अर्जुन को जब पता चला कि एकलव्य नामक शूद्र उन्ही की तरह धनुर्विद्या में कुशल हो गया है तो उन्होंने गुरू से कहकर गुरू दक्षिणा के नाम पर उस का अंगूठा ही कटवाकर उसे सदा के लिऐ इस विद्या के उपयोग से वंचित कर दिया
सब से दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह रही कि हमारे आदर्श दूसरे देशों के आदर्शों की तुलना में चारित्रिक विसंगतियों के अधिक शिकार रहे। राम ने एक शूद्र शबरी को गले लगाया तो दूसरे शूद्र (शंबूक) का वध कर दिया, एक तरफ अपनी पत्नी को पवित्र भी माना तो दूसरी ओर उसकी अग्निपरीक्षा लेकर भी उसे गर्भावस्था में वनवास दिया।
काम का मर्दन करने वाले शिव विष्‍णु के मोहिनी रूप के पीछे कामासक्त हो कर पागल की तरह ऐसे भागे कि मार्ग में ही उनका वीर्य स्खलित हो गया, विष्‍णु ने जालंधर को मारने के बहाने उस की सतीसाधवी पत्नी के साथ छल कर के कुकर्म किया, ब्रह्मा जी की नीयत अपनी लड़की सरस्वती के प्रति भी साफ नहीं थी, श्री कृष्‍ण की रसलीलाओं ने हिंदूधर्म का जो नुकसान किया वह सर्वविदित है ही ।
यही हाल हमारे अन्य देवीदेवताओं व ऋषिमुनियों का रहा । इंद्र ने अपनी गुरूपत्नी अहिल्या के साथ, चंद्र ने देवगुरू बृहस्पति की पत्नी तारा के साथ, सूर्य ने कुमारी कुन्ती के साथ, पराशर ने धीवर कन्या सरस्वती के साथ, विश्‍वामित्र ने मेनका के साथ, भारद्वाज ने घृताची के साथ, तथा विशिष्‍ठ ने यक्षमाला के साथ जो अपने अनैतिक व्यवहार का प्रदर्शन किया वह किसी भी स्थिति में गर्व करने की बात नहीं है।
स्त्रियों में यद्यपि सीता और सावित्री को आदर्श माना गया है। और हिन्दू शास्त्रों में जिन पंचकन्याओं की महिमा गाने व स्मरण करने का विधान है वे हैं अहल्या, मंदोदरी, तारा, कुन्ती व द्रौपदी, संयोग से ये सभी एक से अधिक पतियों वाली थीं, समझ में नही आता कि हिंदू धर्म में आदर्शों का ऐसा स्वरूप क्यों रहा अगर ये इतिहासिक थे तो हम ने चारित्रिक विसंगतियों वाले आदर्श क्यों चुने? और अगर पोराणिक थे तो ऐसी विकृत चरित्रों की कल्पना क्यों की और उन को समाज पर क्यो थोपा? ऐसे आदर्शों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ सकता था, यह कहने की आवश्‍यकता नहीं ।
ये ही चारित्रिक विसंगतियां हमें विरासत में ज्यों की त्यों मिली। जब तक हम आध्यात्मिक व धार्मिक उपलब्घि में रहे तब तक हम आचरण से हीन रहे ।
‘‘कितने खरे हमारे आदर्श’’ पृष्‍ठ 16,17,18
लेखक: डा0 राकेष नाथ, विश्‍व बुक दिल्ली ।
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कुछ और अंश देखें
श्री कृष्‍ण ने अपनी सारी सेना तो कौरवों को दी और स्वयं निहत्थे पांडवों की ओर रहे ताकि जो जीते, उनका आभारी रहे । जिस देश समाज व धर्म में महान व आदर्श पुरूष भी अपने भाई से छल, कपट व कूटनीति द्वारा विजयी हों, वहां साधारण व्यक्ति के सदाचार की क्या आवश्‍यकता है? (सरिता मुक्ता (1) पृष्‍ठ 7
हमारे यहाँ धर्म शास्त्रों में विधान है कि वेद का एक शब्द भी शुद्र (और स्त्री और वैश्‍य) के कान में पड़ जाए तो उस के कान में गरम सीसा भर दिया जाए, इस के अतिरिकत हमारे सारे ग्रंथ संस्कृत में हैं और इस तथाकथित देवभाषा संस्कृत को (अंग्रेजों के आने से पहले) सिवाए कुछ ब्राह्मणों के किसी को भी पढ़ने का अधिकार तक ही नही था। - उक्त पृष्‍ठ नं0 8
हमारे पुराणों में ऐसी ऐसी बातें भरी पड़ी हैं कि किसी सभ्य समाज में बैठ कर उन्हें पढ़ना तक संभव नही है। लेकिन हिदू समाज न सिर्फ इन अनहोनी और ऊटपटांग बातों पर विष्वास करता है, बल्कि बड़ी श्रद्धा के साथ इन्हें भगवान की लीला मान कर आज के वैज्ञानिक आविष्‍कारों को उन के आगे तुच्छ हेय बताता है -उक्त पृष्‍ठ 14
हमारी स्मत्रियों गृह सूत्रों व धर्मशास्त्रों में वर्ण व्यवस्था की जैसी व्याख्या की गई है, क्या आज के युग में भी हम उसी के अनुसार आचरण करें ? क्या आज भी यदि वेद का एक शब्द किसी शुद्र के कान में पड़ जाये तो हम पिघला हुआ सीसा उसके कानों के भर दें ? क्या आज भी किसी कला में निपुण होनें वाल शुद्र का अंगूठा काट लिया जाए जैसा के द्रोण ने एकलव्वय के साथ किया था । अथवा तपस्या करने वाले शुद्र की गर्दन ही उडा दी जाए?, जैसा की स्वयं भगवान राम ने किया था । -उक्त पृष्‍ठ 14
लैला मजनू और शीरीं फरहाद की प्रेम कहानियां पश्चिम एशिया में भी हैं लेकिन वहां मजनू या फरहाद को देवता या परमात्मा नहीं बनाया गया । ये गौरव सिर्फ भारत को प्राप्त है कि यहां के अविवाहित आशिक माशूक (कृष्‍ण-राधा) परमात्मा हैं और राधे कृष्‍ण कह-कह कर बड़े बड़े वैरागी भी उनकी माला जपते हैं ।
हमारे देश में ऐसे मन्दिर भी हैं जहां (काम शास्त्र के) चैरासी आसन मूर्तियों के रूप में दिखाये गये हैं स्त्री पुरूष के विशेष चिन्हों (गुप्तांगों) को संभोग की अवस्था में मूर्ति मंत कर शिवालियों में विराजमान करके पूजा जाना यहां का परम धर्म है, फिर मिट्ट ट्टी मिटटी पत्थर की मूर्तियां (शिव लिंग व योनियां आदि) ही अश्‍लील नहीं है, दिगम्बर जैनियों के नग्न मुनि तो जीवित अश्‍लीलता है। वे शहरों में नंगे घूमते हैं । घरों में जाकर स्त्रीयों के हाथ से भोजन लेते हैं और खड़े खडे़ भोजन लेते हैं ताकि जीवित अश्‍लीलता एक क्षण को भी नज़रों से ओझल न हो सके। (उक्त पृष्‍ठ 13 )
यह थोथे हमारे आदर्श और सिद्धान्त
डा0 राकेष नाथ के लेख से
प्रकाशित बुक ‘‘कितने खरे हमारे आदर्ष ’’ पृष्‍ठ 8,9,10
ब्राह्मण महिमा
मानवता की दृष्टि से मानव मात्र एक समान है, उन में कोई ऊंचनीच नहीं है और कम से कम जन्म से तो कोई ऊंच या नीच नहीं माना जाना चाहिए। अच्छे और बुरे कर्मो के लिहाज़ से हम चाहें तो उन में विभेद कर सकते हैं, परन्तु न्याय की दृष्टि में तो सभी एक होने चाहिएं (यही इस्लामी सिद्धान्त भी है) लेकिन मनु महाराज अपनी स्मृति का प्रारम्भ करते हुए लिखते है-
भूतानां प्राणिनः श्रेष्‍ठाः प्राणिनां बुद्धिजीवनः
बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्‍ठा नरेषु ब्राहाणाः समृताः
- अध्याय 1, श्‍लोक 96 ।
(जीवों में प्राणधारी, प्राणधारियों में बुद्धिमान, बुद्धिमानों में मनुष्‍य एंव मनुष्‍यों में ब्राह्मण सर्वश्रेष्‍ठ कहे गये है )
सर्व स्वं ब्राह्मणस्येदं यत्कि‍चिज्‍जगतो गतम्
श्रेष्‍ठ्येनाभिजनेनेदं सर्व वै ब्राह्मणोर्हति
(पृथ्वी पर जो कुछ धन है वह सब ब्रह्मण का है । उत्पत्ति के कारण श्रेष्‍ठ होने से यह सब ब्राह्मण के ही योग्य है)
उपर्युक्त श्‍लोकों से स्पष्‍ट प्रकट होता है कि हमारे न्यायमूर्ति मनु महाराज ने मनुष्‍यों में एक वर्ग को सर्वश्रेष्‍ठ घोशित कर के सब कुछ उसे भोग करने की खुली छूट दे दी है। केवल इतने से ही उन्हे संतोष नहीं हो गया, ऊंच, नीच, घृणा की यह खाई और अधिक गहरी होती चली जाए, इस के लिए उन्होंने विधान किया:
मांगल्यं ब्राह्मणस्य स्यात्क्षत्रियस्य बलान्वितम्
वैष्यस्य धनसंयुक्तं, शूद्रस्य तु जुगुप्सितम् -अध्यया 2, ष्लोक 31
(ब्राह्मण का नाम मंगलयुक्त, क्षत्रिय का बलयुक्त, वैष्‍य का धनयुक्त एंव शूद्र का निंदायुक्त होना चहिए)
तात्पर्य यह कि शूद्र को पगपग पर भान होता रहे कि वह नीच है और जीवन में वह कभी उन्नति न कर सके, ताकि द्विजों के लिऐ सेवकों कि कमी ना हो जाए, और फिर यह सेवक कहीं शरीरिक दृष्टि से भी इतने स्वस्थ ना हो जाएं कि वे द्विजों की प्रतिस्पर्धा करें, अतः उन के लिए जहां एक ओर उच्छिष्‍ट भोजन आदि की व्यवस्था की गई, वहां दूसरी ओर ब्राह्मण के लिए याज्ञवल्क्य महाराज ने व्यवस्था कीः
ब्राह्मणः काममश्‍नीयाच्छाद्धे व्रतमपीडयनू
- याज्ञवल्क्यस्मृति, ब्रह्मचारी प्रकरण, श्‍लोक 32.
(ब्रह्मण श्राद्ध में चाहे कितना खाएं, उन का व्रत नहीं बिगड़ता) मनुस्मृति का भी निम्न उद्धरण देखने योग्य हैः
जातिमात्रोपजीवी वा कामं स्याद्ब्राह्मणब्रुवं
धर्मप्रवक्ता नृपतेर्नतु षूद्रः कंथचन, ---- अध्याय 8, श्‍लोक 20,
(केवल जाति में जीविका करने वाला कर्मरहित ब्राह्मण भी राजा की ओर से धर्मवक्ता हो सकता है परन्तु शूद्र नहीं हो सकता)
विद्वत्ता एवं योग्यता में भी मनु महाराज जाति को उच्च स्थान देते हैं, इतना ही नहीं जो संसार में किसी भी धर्म में उचित नहीं माना जाता सकता, उस असत्य भाषण को भी मनु महाराज धर्म का संरक्षण प्रदान करते हैः
कामिहेषु विवाहेषु गवां भक्ष्ये तथेंधने
ब्राह्मणाभयुपत्तौ च शपथे नास्ति पातकम् अध्याय 8, श्‍लोक 112,
( स्त्री संभोग, विवाह, गौओं के भक्ष्य, होम के ईंधन और ब्राह्मण की रक्षा करने में वृथा शपथ खाने से भी पाप नहीं होता)
ब्राह्मण न हुआ, कोई ऐसा पुरूष हो गया कि जिस के मर जाने से सृष्टि में भूकंप आ जाएगा और फिर साथ ही स्त्री संभोग में भी झूठ बोलने से पाप नहीं होता! फिर तो संसार के सारे न्यायालय एवं कानून व्यर्थ ही समझे जाने चाहिएं ।
वही दोष करने पर शुद्र के लिए कठोर से कठोर दंड विधान है. और ब्रह्मण के लिए कोई दंड नहीं । मनुस्मृति के अनुसार ‘‘कठोर वचन कहने का अपराध करने पर द्विजातियों को कुछ क्षण का दंड काफी है, परंन्तु शूद्र को जिहवोच्छेदन अथवा जलती हुई दस अंगुल की शलाका मुख में डालना तथा मुख, कान में तपा हुआ तेल डालने का विधान किया गया है’’ ( अध्याय 8, श्‍लोक 267 से 272)
मजेदार बात यह है कि दंड केवल तभी है जब कठोर वचन ब्राह्मण या क्षत्रिय के प्रति कहे गये हों यदि वैश्‍य को गाली दी जाए तो कुछ दंड ही काफी है और भी देखिए-
‘‘शूद्र यदि द्विजाति को मारे तो उस के हाथ, लात मारे तो पैर, यदि आसन पर बैठना चाहे तो चूतड़, ब्राह्मण पर थूके तो होठ, पेशाब करे तो लिंग और यदि अधोवायु करे तो गुदे की जगह कटवा दें ’’ अध्याय 8, ष्लोक 277 से 283)
‘‘शूद्र यादि रक्षित या अरक्षित जाति की स्त्री से भोग करे तो उसकी मूत्रेंद्रिय कटवा दे अथवा प्राणदंड दे, परन्तु अन्य जातियों के लिए धन दडं ही काफी है और ब्राह्मण के लिए सिर का मुंडन ही काफी है’’ (अध्याय 8, श्‍लोक 374 से 379)
इतना ही नही-
न जातु ब्राह्मणं हन्यात्सर्वपापेष्‍वपि स्थितम्
राष्‍ट्रादेनं बहिः कुर्यात्समग्रधनमक्षतम् (8, 380)
न ब्राह्मणवधाद्भूयानधर्मो विद्यते भुवि
तस्मादस्य वधं राजा मनसापि न चिन्तयेत् ( 8, 381 )
( सब पापों से लिप्त होने पर भी ब्राह्मण का वध कदापि न करें, उसे धन सहित अक्षत शरीर से राज्य से निकाल दे, ब्राह्मणवध के समान दूसरा कोई पाप पृथ्वी पर नही है, इसलिए राजा मन में भी ब्राह्मणवध का विचार न करे)
द्वितीय विधाननिर्माता याज्ञलव्क्य मुनि तो और भी आगे बढ़ जाते है।:
पादशौचं द्विजोच्छिष्‍टमार्ज्‍जनं गोप्रदानवत्
( श्‍लोक 9, दानधर्मप्रकरण)
( द्विजों के पांव एवं जूठन धोना गोदान के समान है)
अस्वन्नमकथं चैव प्रायष्चित्तैरदूषितम्
अग्ने: सकाशाद्विप्राग्नौ हुतं श्रेष्‍ठमिहोच्यते - श्‍लोक 16,राजधर्म प्रकरण
( अग्नि में यज्ञ करने की अपेक्षा ब्राह्मणरूपी अग्नि में हवन करना अधिक श्रेष्‍ठ है )
इस प्रकार इन स्मृतिकारों ने वेद द्वारा गाया हुआ अग्निहोत्र का सारा गुणगान ब्राह्मण के ऊपर न्यौछावर कर के वेदों और कर्मकांड को ही धता बता दी है ।
नारी निंदा
शूद्र की तरह नारी भी सदैव पुरूष की भोग्या गिनी जाती रही है । इसी लिए विवाह आदि के सम्बन्ध मे जहां एक ओर उसे विधवा हो जाने पर दूसरे विवाह तक की आज्ञा नहीं है, वहीं दूसरी ओर पुरूषों को कई-कई विवाहों का आदेश किया गया है वैसे ऊँच-नीच की उस खाई को यहाँ भी नहीं पाटा जाताः
शूद्रैव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विशः स्मृते
ते च स्वा चैव राज्ञश्‍य ताश्‍ख्च स्वा चाग्रजन्मनः - मनुस्मृति: अध्याय 3, श्‍लोक 13.
(शूद्र की स्त्री एक शूद्रा ही हो, वैश्‍य की स्त्री वैश्‍या एंव शूद्रा, क्षत्रिय की शूद्रा, वैश्‍य एवं क्षत्राणी तथा ब्राह्मण की ब्राह्मणी, क्षत्राणी वैश्‍य एवं शूद्रा कही गई हैं।)
तिस्रो वर्णानुपूर्वेण द्वे तथैका यथाक्रमम्
ब्राह्मणक्षत्रियविशां भार्या स्याच्छूद्रजन्मनः
- याज्ञवल्क्य स्मृति विवाह प्रकरण, श्‍लोक 59.
(वर्णानुक्रम में ब्राह्मण 3, क्षत्रिय 2 एंव वैश्‍य 1 स्त्री रख सकता है परन्तु शूद्र अपने ही वर्ण मे विवाह कर सकता है।)
एक ओर द्विजों के लिए यज्ञ, नियम और संयम की कठोरता है, तो दूसरी ओर स्वच्छंद भोगविलास की राह पर भी प्रशस्त कर दी गई है, ‘गरीब की जोरू सब की भाभी’ कहावत यहां पूर्णतः चरितार्थ होती है, स्त्री के लिए जहां एक ओर पतिव्रत ही जीवन कहा गया है। तथा छल से ठगी गई अहल्या एंव पतिव्रता सीता को बिना कारण वन में छोड देने के उदाहरण हैं, वहां दूसरी ओर याज्ञवल्क्य ऋषि विधान करते हैं
दत्तामपि हरेत्पूवां ज्यायांश्‍चेद्वर आव्रजेत्
- विवाह प्रकरण, श्‍लोक 65,
(पहले वर से अच्छा वर मिले तो दी हुई कन्या का भी हरण कर लें)
मनु महाराज की दृष्टि में तो नारी के सतीत्व एंव पवित्रता का मूल्य है वंशवृद्धि के लिए सन्तानप्राप्ति मात्र, इन के लिए वह नारी का सतीत्व बलिदान करने का आदेश देते हुए कहते हैं
देवराद्वा सपिंडाद्वा स्त्रिया सम्यड्नियुक्तया
प्रजेप्सिताधिगन्तव्या संतानस्य परिक्षये
विधवायां नियुक्तस्तु धृताक्तो वाग्यतो निशि
एकमुत्पादयेत्पुत्रं न द्धितीयं कथंचन ।
- अध्याय 9, ष्लोक 59-60.
( निज स्वामी से सन्तान न होने पर स्त्री पति की आज्ञा से अपने देवर अथवा अन्य सपिंड पुरूष से इच्छित पुत्र लाभ कर सकती है, रात्रि के समय चुपचाप गुरू के द्वारा नियुक्त पुरूष अपने शरीर में घी लगाकर विधवा से एक पुत्र उत्पन्न कर सकता है, परन्तु दूसरा पुत्र कदापि नहीं)
सोचने की बात है कि यदि एक बार उफनती नदी का बांध टूट जाए तो क्या वह प्रयास करने पर भी पुनः ठीक हो सकता है? विधवा नारी, जो पता नही कितने प्रयास से अपने यौवन एवं इच्छाओं को दबाय बैठी हो, एक बार पुरूष से संभोग होने पर किस प्रकार अपने को संयत कर सकती है ? दूसरे यदि एक बार मे गर्भाधान न हो तो क्या करे? अब यह विचाराधीन प्रश्‍न है कि वर्तमान हिंदू कोड बिल की तलाक एंव पुनर्विवाह धारा इस से भी गई बीती है?
श्राद्ध व्यवस्था
अपने को अहिंसक तथा गौपूजक कहने वाले इन विधायकों की श्राद्धव्यवस्था पर भी एक दृष्टि डाल लेना अनुचित न होगाः ‘‘मनुष्‍यों के पितर, तिल, चावल, जौ से एक मास, मछली से दो मास,हरिण के मांस से तीन मास, मेंढे के मांस से चार मास, पक्षियों के मांस से पांच मास, बकरी के मांस से छः मास, चित्रमृग के मांस से सात मास, काले मृग के मांस से आठ मास, पाठीन मछली तथा रूरू हरिण के मांस से नौ मास, सूअर और भैंसे के मांस से दस मास, कछुए और खरगोश के मांस से ग्यारह मास, तथा वार्ध्रीणस के मांस से बारह वर्ष तक तृप्त होते हैं। (मनु स्मृति अध्याय 3, श्‍लोक 267 से 271 तक.)
इसी विषय मे याज्ञवल्क्य स्मृति आदेश देती है ‘‘हविष्‍यान्न से महीने भर, पायस से एक वर्ष, मछली, हरिण, भेडा, पक्षी, बकरा, चित्रमृग, काला मृग, साबर, शूकर, और खरगोश के मांस से श्राद्ध करने से पितर लोग क्रमशः एकएक महीना अधिक तृप्त होते हैं गैडा, महाशलक, लाल बकरे का मांस, बूढें सफेद बकरे का मांस इन से अनंत काल तक पितरों को तृप्ति मिलती है। (श्राद्धप्रकरण, श्‍लोक 58 से 61 तक)
इतना ही नही, मनु महाराज ने तो भोज्याभोज्य का विचार करते हुए भक्ष्य पशुपक्षियों एवं मछलियों के नाम तक गिना डाले हैं। मजेदार बात यह है की अभक्ष्य पशुओं मे वह गाय को नहीं गिनाते । (अध्याय 5, श्‍लोक 11 से 22)
उन्होंने स्पष्‍ट कर दिया है कि यज्ञ के लिए मांसभक्षण अनुचित नहीं, साथ ही उन्होंने उसे मंत्रों से पवित्र कर लेने का आदेश भी कर दिया है। वह तो ब्रह्मचारी को भी दुपट्टे के स्थान पर काले मृग, रूरू मृग एवं बकरे का चर्म प्रयोग करने का आदेश देते हैं । (अध्याय 2, श्‍लोक 41)
ये हैं वे कुछ सिद्धान्त जिन पर हिंदू धर्म की यह अट्टालिका खड़ी की गई है। हम स्पष्‍ट देखते हैं कि ये सिद्धान्त पक्षपात और अन्याय से परिपूर्ण हैं और यहि कारण है कि समय समय पर इन का विरोध होता रहा है विशिष्‍ठ एंव विश्‍वामित्र का युद्ध, परशुराम एवं क्षत्रियों की लड़ाईयां, शंबूक का वध, बुद्ध एंव महावीर का मतप्रचार आदि इन सिद्धान्तों के विरूद्ध खुले विद्रोह कहे जा सकते हैं।
तथाकथित भगवान के अवतार
हम ने सिद्धान्तों पर एक दृष्टि डाली, अब हम उन आदेशों को भी देखें जिन के उदाहरण पग पग पर दिए जाते हैं। सर्वप्रथम भगवान के जो अवतार गिनाए जाते हैं उन में एक भी ऐसा नहीं जिसे हम छल रहित कह सकें, नारी रूप धारण कर राक्षस एवं देवताओं के सम्मिलित प्रयास द्वारा तैयार किया गया अमृत केवल देवताओं को पिला देना, वामन रूप धारण कर बलि को छलना आदि को ही यदि हम अपना आदर्श आज मानने लगें, तो मत्स्यन्याय के सिवा संसार में कुछ भी शेष ना रह जाएगा।
और ये सब छल जिन देवताओं को शक्तिशाली बनाने के लिए किये गये उन के चरित्र पर जब हम दृष्टि डालते हैं तो हमें लगता है कि उन कायर और चरित्रहीन देवताओं से तो परिश्रमी राक्षस हजार गुना अच्छे थे। जितने भी युद्ध देवताओं और राक्षसों के बीच हुए, सब में इन देवताओं ने पीठ ही दिखाई कोई भी तो ऐसा युद्ध नहीं जिस में देवता छल से न जीते हों ।
देवताओं के राजा इन्द्र ने अहल्या का सतीत्व नष्‍ट किया तथा उसके बाद भी राजा बना रहा जब कि सामाजिक दंड अहल्या को ही भोगना पड़ा, मेनका आदि वेश्‍याओं के द्धारा तपस्वियों का तप भंग करना तो इन्द्र का एक साधारण सा कार्य था ।
इंद्र के अलावा ब्रह्मा का कामातुर होकर अपनी लड़की सरस्वती के पीछे भागना, चन्द्रमा द्वारा गुरू की पत्नी का हरण, शिव का सती की लाश कंधे पर डाल कर पागलों की तरह घूमते फिरना आदि उदाहरण हमें यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं यदि राक्षस लोग भी ईमानदारी का आदर्श अपने सामने ना रखकर छल से काम लेते तो क्या इतिहास इसी प्रकार लिखा गया होता ?
राम और कृष्‍ण के बारे में तो इतना अधिक बार लिखा जा चुका है कि यहां उसे दोहराना ठीक ना होगा फिर भी इतना लिख देना आवश्‍यक है कि ‘रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन ना जाई’ का आदर्श कैकयी के सामने रखने वाले महाराज दशरथ ने कैकेयी के विवाह के समय उसके पिता को दिया यह वचन कि कैकेयी का पुत्र ही राजा होगा, स्वयं ही तोड़ दिया, इतना ही नहीं उन्होंने राम को भी उकसाया कि वह पिता के वचन का ध्यान ना करें बल्कि आयोध्या में ही रहें।
महाभारतकालीन आदर्षों में हम भीष्‍म को बड़ा ऊंचा स्थान देते हैं परन्तु क्या अपने नपुंसक भाईयों के लिए अंबा आदि नारियों का हरण तथा उसके पश्‍चात एक बहन का जीवन बरबाद कर देना एवं शेष दो बहनों का जबरदस्ती व्यास से नियोग कराना ही आदर्श है? यदि भीष्‍म चाहते तो महाभारत का संग्राम रूक सकता था, परन्तु बैठे बिठाए जुआ एवं द्रौपदी की बेइज़्ज़ती का तमाशा देखना ही उनका आदर्श था, द्रोणाचार्य का अकेले अभिमन्यु को घेरकर मार डालना, कृष्‍ण द्वारा कर्ण को मरवाना एवं दुर्योधन की जांघ तुड़वाना कौन सा आदर्श कहा जाएगा?
राजा शांनतनु का मत्स्यगंधा से विवाह करना एवं दुष्‍यंत का शकुंतला को धोखा देना ही क्या आदर्श है? एक ओर हम कुन्ती एवं द्रौपदी को आदर्श नारी मानते हैं तो आज किसी अविवाहित लड़की के सन्तान हो जाती है तो क्यों समाज उसे स्वीकार नहीं करता? यदि नारी किसी परिस्थिति से मजबूर होकर दूसरा विवाह कर लेती है तो क्यों नहीं उसे द्रौपदी के समकक्ष मान लिया जाता?
‘‘कितने खरे हमारे आदर्श ’’ पृष्‍ठ 8,9,10
लेखकः डा0 राकेश नाथ
विश्‍व बुक दिल्ली
यह थी एक झलक उसकी जो हिन्दुत्व का स्रोत है। जिस की आख्या भी हिन्दू लेखकों के कलम से प्रस्तुत की गई है, इस के हवाले से हम ‘‘बलराज मधोक’’ जी से कहना चाहेंगे कि अगर यह ही हिन्दुत्व है तो हमारा तो इसे दूर से ही सलाम है, स्वयं आप भी इस पर खुले आम अमल नहीं कर सकते यह केवल पुराने समय की बात थी, जो समय के साथ इतिहास का हिस्सा बन चुकी, अब जो चलने वाली व्यवस्था है वह केवल और केवल इस्लामी व्यवस्था है। स्वंय आप उसी व्यवस्था में जी रहे हैं। उदाहरण के बतोर भारतीय कानून की नजर मे ब्राह्मण और शूद्र एक समान हैं आज विधवा को सति नहीं किया जा सकता, या तो उस की दूसरी शादी कर दी जाए वरन राज्य उसे विधवा पेंशन दे । नियोग से बच्चा पैदा नहीं किया जा सकता (यह राज्य की दृष्टि मे चाहे अपराध न हो अपितु समाज की दृष्टि में अवश्‍य अपराध है) ऐसे ही शिक्षा केवल ब्राह्मण के लिए नहीं है बल्कि सब के लिए है ।अब कोई शम्बूक (शूद्र) शिक्षा प्राप्ति और जप-तप करने के कारण मारा नहीं जा सकता, भूर्ण हत्या पर, प्रतिबन्ध जन्म से पहले लिंग पता करने पर प्रतिबन्ध, दहेज लेने देने पर प्रतिबन्ध, यह सब इस्लामी कानून हैं । खास बात यह भी है कि इन में से अधिक तर हिन्दू धर्म के विपरीत हैं, इन चीजों के विपरीत हिन्दू धर्म में स्पष्‍ट आदेश है, जैसा कि वर्ण व्यवस्था, सती या नियोग आदि, और हिदू धर्म के पर्वतक उसका नमूना पेश करते हैं, दहेज को ही लीजिए, चाहे उसका स्पष्‍ट आदेश न हो परन्तु मर्यादा पुरूषोत्तम राम के विवाह में देखये, राजा जनक ने उन्हें किस कदर भारी संख्या मे दहेज दिया था ।
यह एक नमूना था उन आदेशों/आदर्शों का जिनका सम्बन्ध कानून से है, इस के अतिरिक्त कुछ बातें वह है जिन का सम्बन्ध नैतिकता से है, इस्लाम क्यों कि मुकम्मल निजाम-ए-हयात (जीवन जीने कि सम्पूर्ण पद्धति) है अतः इस्लाम ने नैतिकता के आधार पर भी बहुत से नियम पेश किये हैं। उदाहरण के तौर पर एक मशहूर हदीस है कि अगर तुम कहीं जुल्म (अन्याय) होता देखो और तुम उसे रोकने की शक्ति रखते हो तो शक्ति का प्रदर्शन करके उसे रोक दो । और अगर अपने अन्दर उसे रोकने की शक्ति नहीं पाते बल्कि ज़ुबान से अन्याय को अन्याय कह सकते हो। तो जुबान से जुल्म को जुल्म कहो इस समय तुम्हारा चुप रहना पाप है। और अगर इतनी भी शक्ति नहीं है तो दिल से बुराई को बुराई समझो, और उससे अलग हो जाओ, यह ईमान का आखिरी दर्जा है अर्थात किसी भी स्थिति में अन्याय का समर्थन जायज़ नहीं है।
इसकी तुलना महाभारत के युद्ध में भगवान श्री कृष्‍ण के किरदार से किजिए, जिस युद्ध में वह अर्जुन के सार्थी बनकर उन्हें अधर्म के विरूद्ध युद्ध करने के उपदेश दे रहे थे उसी युद्ध में उन्होंने अपनी सम्पूर्ण सैनिक शक्ति दूसरे पक्ष को दे रखी थी ।
एक दूसरा उदाहरण देखिये, राजा दशरथ ने अपनी एक पत्नी को दिये गये दो वचनों के कारण अपने पुत्र श्री राम को घर से निकाल दिया था, ऐसी स्थिति में इस्लामी कानून यह है कि वह वचन जिस में किसी की हकतलफी होती है वह सिरे से खारीज है उस पर अमल नहीं किया जाएगा यहां तक कि अगर कोई भूल-चूक में भी किसी ऐसे कार्य के करने की कसम खा बैठे तो इस्लामी नियम के अनुसार वह कार्य नहीं किया जाएगा साथ ही कसम के झूठा होने के कारण कसम का कफ्फारा (एक प्रकार का दंड ) देना अनिवार्य होगा । ख्याल रहे कि भारतीय कानून भी कुछ ऐसा ही है, यही कारण है कि अगर कोई अपने बेटे को इसलिए घर से निकाल दे कि उस ने किसी को यह वचन दिया था तो उसका वचन जाए भाड़ में, भारतीय न्यायालय और सरकार उसे ऐसा करने की अनुमति नही दे सकती ।
अतः श्री बलराज मधोक जी से निवेदन है कि इस्लामी व्यवस्था का अधिकांश हिस्सा समय चक्र के आहनी पंजे ने बलपूर्वक आप से मनवा दिया है अब आप ज़िद छोडें, और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए निष्‍पक्ष होकर इस्लामी व्यवस्था के बाकी बचे हिस्से का अघ्ययन करें
अब जो कुछ बचा है वह कुछ अधिक नहीं, अपितु बहुत मामूली सा है और वह क्या है, उसे पवित्र कुरआन कि भाषा में मुलाहिज़ा फरमाइये
‘‘हे ईशवरीय ग्रन्थ रखने वालों आओ एक ऐसी बात की ओर जिसे हमारे और तुम्हारे बीच समान मान्यता हासिल है वह यह कि हम एक ईश्‍वर के अतिरिक्त किसी अन्य को न पूजें और ना ही उसके साथ किसी को सा़झी ठहराएं और न परस्पर हममें से कोई एक दूसरे को एक ईश्‍वर से हटकर पालनहार बनाये ’’। (सूरत आल-ए-इमरान 64)
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