अल्‍लाह का चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार # 5-7

कुरआन का अध्‍यण करें तो पता चलेगा कि सहीफों के अलावा आसमानी किताब केवल चार है, उनमें केवल कुरआन हमेशा वेसा ही रहेगा जैसा था,,,
कुरआन अल्‍लाह की भेजी आखरी किताब है। पहले नबी हजरत आदम थे । इसाई ,यहूदी धर्म भी अल्लाह की भेजी किताबों पर आरम्भ हुआ था। इन तिनों धर्मों का एक संयुक्‍त नाम इब्राहीमी धर्म Abrahamic religions  भी है,

. जैसे जैसे मानव सभ्य और सुसंस्कार और बुद्धिमान होता गया वैसे वैसे वह उसको हिदायत करता रहा,  कुरआन लगभ 23 साल में आखरी पेगम्‍बर मुहम्मद स. को याद कराया गया, अल्लाह ने कोई तैयार पुस्तक नहीं थमा दी। बल्कि थोडा-थोडा हिस्‍सा उनको फरिश्‍ते के द्वारा याद कराया जाता,, फिर वो अपने साथियों को याद करा देते,,, ऐसे हजारों हाफिज साथ साथ तैयार होते रहे,,,,,साथ-साथ रमजान में जितना कुरआन आ चुका होता उसे एक हाफिज सुनाता और बाकी सुनते,,,, मुहम्मद साहब ने आखरी रमजान में दो बार मुकम्‍मल कुरआन रमजान में सुनाया। यह याद करने और सुनाने का सिलसिला आज भी जारी है। इसी सीने या मस्तिष्क में याद रखे जाने के सबब भी इसमें छोटा सा मात्राओं में विभिन्नता जैसा परिवर्तन भी कभी ना होसका। मुहम्‍मद सल्‍ल़ के  थोडे समय पश्चात जब अरब में भी कागज का प्रचलन हुआ  तब उस लाखों के याद किए हुए को किताबी शकल दे दी गयी,,,उससे बहुत आसानी हुई,  दुनिया भर में भेजना आसान हुआ,, उस समय के दो कुरआन आज भी महफूज हैं,,,,आज इन्टरनेट में लगभग सभी बडी भाषाओं में अनुवादित और आधुनिक शक्‍लों यान‍ि पी़ डी एफ और फलेश में भी उपलब्ध है। लेकिन वो हिफज याद यानि कंठस्‍थ रखने का सिलसिला जारी है रहेगा,,,

Tarawih

Wikipedia:>>>
 Sunnah salat and Ramadan.

कुरआन ने अपनी असल हिदायत को पिछली हिदायतों और किताबों ही का एक नया संस्करण कहा है। तीन किताबों की किताबे इलाही-आसमानी किताब अर्थात उसके (अल्लाह) द्वारा भेजी गयी मानता है।
अल्लाह उन पुस्तकों के बारे में कहता हैः
अनुवादः-  Quran - 42:13

‘‘अल्लाह ने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया जिसकी ताकीद उसने नूह को की थी।" और वह (जीवन्त आदेश) जिसकी प्रकाशना हमने तुम्हारी ओर की है और वह जिसकी ताकीद हमने इबराहीम और मूसा और ईसा को की थी यह है कि "धर्म को क़ायम करो और उसके विषय में अलग-अलग न हो जाओ।" बहुदेववादियों को वह चीज़ बहुत अप्रिय है, जिसकी ओर तुम उन्हें बुलाते हो। अल्लाह जिसे चाहता है अपनी ओर छाँट लेता है और अपनी ओर का मार्ग उसी को दिखाता है जो उसकी ओर रुजू करता है


वह पुस्तक हैं तौरात, इन्जील और ज़बूर। तौरात (जीवस बुक)-मूसाMoses के नाम पर वजूद में आने वाला समुदाय ‘यहूदी’ है जिसने आजकल फिलिस्तीन के हिस्से पर कब्ज़ा करके इसराईल देश बसाया है जिसके बारे में अनेक कारणों से खुदा का कहना है कि यहूदी को कभी शांति नसीब नहीं होने देगा। इन्जील(बाइबल)-ईसा मसीह or यीशु मसीह la:Iesus Christus के ज़रिये ज़ाहिर होने वाला समुदाय ‘ईसाई‘ है। ‘जबूर-दाऊदDavid’ कोई स्थाई पुस्तक नहीं इसकी हैसियत बस तौरात के परिशिष्ट जैसी है। इसे यहूदी और ईसाई दोनों ही मानते हैं।
कुरआन और उसके लाने वाले का उल्लेख का एलान पिछली आसमानी किताबों में पहले ही से हो चुका था। यूहन्ना की इन्जील(बाइबल), अध्याय 16, आयतें 12-13 में यूं लिखा हैः
अनुवादः ‘मुझे तुमसे और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, मगर अब तुम उनको सहन नहीं कर सकते, लेकिन जब वह यानी सच्चाई की रूह आएगा, तो तुमको तमाम सच्चाई की राह दिखाएगा, इस लिए कि वह अपनी ओर से न कहेगा, लेकिन जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा और तुम्हें आगे की ख़बर देगा।

मौलाना रहमुतल्लाह कैरानवी ने गदर से कुछ पहले आगरा में मशहूर पादरी फंडर के सामने 10 बाइबिले दिखाकर पूछा था कि बताओ इनमें से कौन सी बाइबिल को तुम मानते हो हर एक में अलग कुछ लिखा है। भरे मजमे में उसे कबूल करना पडा था कि ज़रूरत के मुताबिक इसमें परिवर्तन किया गया है। डा. ज़ाकिर नायक भी सैंकडों परिवर्तन साबित कर चुके हैं।
आज जिन किताबों के आसमानी अर्थात ईशवाणी होने का दावा किया जाता है, उनमें बहुत सारे परिवर्तन कर दिये गये हैं। केवल कुरआन ही ऐसी आसमानी किताब है जिसमें कोई परिवर्तन ना किया जासका है ना किया जा सकता है।
कुरआन के बारे में खुली दावत है छानबीन करें। लगभग सभी भाषाओं में कुरआन का अनुवाद मिल जाता है। सबको चाहिए कि इसके औचित्य को जांचने और सच्चाई मालूम करने की कोशिश करे। बुद्धि‍जीवी किसी ऐसी चीज को नज़रन्दाज़ नहीं कर सकता, जो उसके शाश्वत राहत का सामान होने की सम्भावना रखती हो और छान-बीन के बाद शत-प्रतिशत विश्वास में निश्चित रूप से बदल सकती हो।

सोचिये क्या ऐसी वैज्ञानिक व बौधिक दलीलें किसी पुस्तक में मिलती हैं? जैसी कुरआन में हैं। नहीं मिलती तो मान लिजिये कि कुरआन ही निश्चित रूप से खुदाई कलाम अर्थात ईशवाणी है।

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इस्‍लाम की शब्‍दावली
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 (6)

जिन लोगों ने अल्लाह से हटकर अपने दूसरे संरक्षक बना लिए है उनकी मिसाल मकड़ी जैसी है, जिसने अपना एक घर बनाया, और यह सच है कि सब घरों से कमज़ोर घर, मकड़ी का घर ही होता है। क्या ही अच्छा होता कि वे जानते! (Quran 29:41)
The example of those who take allies other than Allah is like that of the spider who takes a home. And indeed, the weakest of homes is the home of the spider, if they only knew. (Quran 29:41)

उपरोक्‍त कुरआन की आयत में सबसे कमजोर मकडी का घर बताया गया है, आगे की साइंस को भी चैलेंज है कि किसी और का मकजोर घर सातिब करे
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जिन लोगों ने अल्लाह से हटकर अपने दूसरे संरक्षक बना लिए है उनकी मिसाल मकड़ी जैसी है, जिसने अपना एक घर बनाया, और यह सच है ...
Posted by Mohammad-umar Kairanvi on Friday, October 9, 2015



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1 comment:

Anonymous said...
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